 |
| भंडारा शहर की मेन रोड |
भंडारा शहर उन दिनों इतना
छोटा था कि लोग टहलने निकलते थे और कुछ देर बाद पता चलता थे कि लो शहर तो कबका
ख़त्म हो चुका है और वे शहर की सीमा से
बाहर आ गए हैं ।
इतने छोटे शहर की ख़बरें अखबार में तो छपती नहीं थीं न यहाँ के स्थानीय समाचार
रेडियो पर आते थे ।
फिर भी लोगों का मन तो होता ही था कि जानें शहर में क्या चल रहा है । उनके लिए
, शहर में किसने नई दुकान डाली है, किस
लोकल नेता ने जनता को क्या झूठा आश्वासन दिया है से लेकर किस के घर में चोरी हुई
है, कौन किसकी लड़की को भगा ले गया है और किस की बीबी ने अपने शराबी पति से तंग आकर
उसे ‘सोड़चिठ्ठी’ दे दी है, तक सभी ख़बरें महत्वपूर्ण थीं ।
 |
| गांधी चौक सदा गुलज़ार |
शहर की ताज़ा ख़बरें जानने के
लिए गाँधी चौक के किसी टी स्टाल पर हाफ़ चाय पीते हुए खड़े होना ही पर्याप्त था । पान की
दुकान वाला भी पान के साथ ऐसी चटपटी ख़बरें लपेट कर देता था जिन्हें आप काफी देर तक
चुघल सकते थे ।
किसी सेलून में दाढ़ी बनवाते हुए ‘किसी से न कहना’ के अंदाज़ में सभी खबरें आपको मिल
जाती थीं ।
इनमे कुछ ऐसी भी ख़बरें होती थीं जिन्हें अख़बार में छपने का सौभाग्य कभी प्राप्त हो
ही नहीं सकता था ।
इसके बावजूद जिन्हें देश दुनिया की ख़बरें जानना होता था वे नागपुर से निकलने वाले
अख़बार मंगाते थे ।
ख़बरें हर आदमी के पास होती थी । अदा ज़ाफरी साहब ने ऐसे ही शहर के लोगों के लिए लिखा होगा
..
हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना
 |
| महाल रोड पर एक प्रेस |
लेकिन इन सबके बावजूद शहर
में कुछ ऐसे सजग पत्रकार थे जो अपनी कम पूंजी में ही सही साप्ताहिक अख़बार निकालते
थे । ऐसे ही
एक पत्रकार थे हमारे मोहल्ले के अनंत रघुनाथराव पंडितराव । पंडितराव जी ने अकबर इलाहाबादी का
शेर सुन रखा था “खींचों न कमानों को न तलवार निकालो , जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार
निकालो ।“ हालाँकि कोई
तोप उनके मुकाबिल नहीं थी और रोज़ अख़बार निकलने लायक संसाधन भी उनके पास नहीं थे इसलिए वे
सप्ताह में एक बार सोमवार को अख़बार निकालते थे । उनके अख़बार का नाम था ‘लोकवाणी’ और इसकी कीमत
थी मात्र दस पैसे ।
 |
| पुराने समय की ट्रेडल प्रिंटिंग मशीन |
पंडित राव जी एक झोला लटकाए साइकिल पर घूमते हुए हफ़्ते भर
तक शहर की ख़बरें इकठ्ठा करते थे । उनके यहाँ एक कम्पोज़र था जो अलग अलग अक्षरों के
लोहे से बने गुटकों को जिन्हें टाइप कहते थे एक लोहे की फ्रेम के भीतर सेट करता था
। फिर पूरा पन्ना तैयार हो जाने के बाद उसे कस देता था ताकि छपाई के समय वे गिरे
नहीं । फिर उसे वह ट्रेडल प्रिंटिंग मशीन पर चढ़ाता था और रोलर पर स्याही डालता था ।
इतवार की शाम से ही धड़ धड़ की आवाज़ के साथ वह मशीन चलने लगती थी और थोड़ी देर में ही
सत्रह बाई ग्यारह इंच के टैबलायड साइज़ के
चार पेज छप जाते थे । सोमवार की सुबह
पंडितराव जी खुद अख़बार बाँटने निकलते थे । दूर मोहल्लों में बांटने के लिए उन्होंने एक हॉकर भी रखा
था ।
 |
| पुराने समय का डायल वाला टेलीफोन |
पंडित राव जी की पहचान एक बुद्धिजीवी के रूप में तो थी ही
लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि उनके यहाँ टेलीफोन था ৷ उस समय जिसके घर में टेलीफोन होता
था वह बड़ा आदमी कहलाता था । हम लोग इस मायने में खुशनसीब थे कि हमारे मोहल्ले में दो
टेलीफोन थे ৷
एक पंडितराव के यहाँ और एक एड्वोकेट शंगर्पवार के यहाँ । अनेक लोगों ने उनके घर के
टेलीफोन नंबर अपने रिश्तेदारों को दे रखे थे जो अक्सर पंडित राव जी के टेलीफोन की घंटी बजाया करते
थे ৷
 |
| हेमिंग्वे का उपन्यास |
अर्नेस्ट हेमिंग्वे के
उपन्यास “ फॉर हूम द बेल टॉल्स “ के शीर्षक की तरह पंडितराव जी को भी पता नहीं
होता था कि घंटी किसके लिए बज रही है ৷ इन पी पी नंबरों पर जब किसी का कोई रिश्तेदार फोन करता और
पंडित राव जी से कहता “ कृपया फलां फलां को बुला दीजिये” पंडितराव जी जैसे सज्जन
व्यक्ति पैदल ही नंगे पाँव उस व्यक्ति को बुलाने दौड़ जाते थे और “तुमचा फोन “ कह कर लौट आते ।
वे कितने भी व्यस्त हों उन्होंने पड़ोस के लोगों को बुलाने में कभी कोई कोताही नहीं
की ।
 |
| पास पड़ोस का फोन |
उन दिनों पड़ोस के ऐसे बड़े
आदमी का टेलीफोन नंबर पी पी नंबर कहलाता था ৷ हम लोग पी पी नंबर का अर्थ नहीं जानते थे ৷ जिससे पूछो वह अलग अलग मतलब बताता
था, कोई कहता पी पी यानि पर्सनल फोन तो कोई कहता पर्टिकुलर फोन ৷ हम लोगों
ने सहूलियत के लिए इसका नाम रखा था ‘पास पड़ोस का फोन’ ৷ बाद में ज्ञात हुआ कि इसका
वास्तविक अर्थ था पर्टिकुलर पर्सन अर्थात किसी विशिष्ट व्यक्ति के लिए आनेवाला फोन
या उसके घर का नंबर ৷
 |
| ट्रंक काल टेलीफोन एक्सचेंज में बुक होते थे |
लोग इमरजेंसी में जैसे किसी की मृत्यु आदि की सूचना देने के
लिए इन्ही लोगों के घर से ट्रंक काल बुक करते थे और यह लोग इतने अच्छे कि कभी उसके
पैसे भी नहीं लेते थे जबकि उन दिनों फोन का बिल बहुत ज़्यादा आता था । पास पड़ोस के
फोन का उपयोग करने का यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक शहर में एस टी डी पी सी ओ
नहीं खुल गए अथवा लोगों के घरों में फोन
नहीं लग गए । वह समय कब का बीत चुका है । अब तो हर जेब में मोबाइल है और पंडितराव
जैसे परोपकारी लोग दुनिया से जा चुके हैं ৷
 |
| पहले यहाँ हुआ करता था पंडितराव जी का घर |
एक ज़माना बीत गया यह सब
घटित हुए ৷
तबसे लेकर अब तक जाने कितना पानी भंडारा की वैनगंगा नदी में बह चुका होगा ৷भंडारा की
गलियों से लेकर सडकों तक की सूरत बदल गई है ৷ पुराने मकान अब भी साँस ले रहे
हैं लेकिन उनका वैभव अब ऊँची ऊँची इमारतों के आगे फीका पड़ रहा है ৷ लोग भी
अब पंडितराव जी और शंगर्पवार जी जैसे कहाँ शेष हैं ৷ अब तो लगता है सब आपाधापी में हैं ৷ हर कोई दौड़ रहा है, जैसे उन्हें
कहीं जाने की कोई जल्दी हो । दौड़ सब रहे हैं लेकिन कोई कहीं पहुँच नहीं रहा है ৷ वे ऐसे दिन थे जब पड़ोस में रहने वालों को आपके
रिश्तेदारों के नाम भी मालूम रहते थे । अब रिश्तेदार तो दूर बगल में कौन रहता है
यह भी पता नहीं होता ৷
 |
| लोकवाणी चौक |
लेकिन अभी भी समय बीत कर रीत नहीं गया है ৷ लोग विकास की अंधी दौड़ में दौड़ अवश्य रहे हैं लेकिन
वे अभी चुके नहीं हैं ৷ फिर कोई कितना भी होशियार
हो, दौड़ जीतने की जल्दी में हो ,दौड़ते हुए
एक न एक बार पीछे मुड़कर देखता ज़रूर है ৷ हम आप भी अपने
दिन प्रतिदिन के जीवन में बीते दिनों की धूल पर अपने पिछले कदमों के निशान ज़रूर
देखते हैं ताकि हम बेहतर जान सकें कि हमें अगला कदम कौनसा रखना है ৷
अभी भंडारा की
इन गलियों में मुझे ऐसे बहुत से निशान दिखाई दे रहे हैं ৷ इनमे कुछ निशान तो ऐसे हैं जिन्हें देखकर आप चौंक जायेंगे ৷ ध्यान से देखिये आपको इन गलियों में बाबासाहेब
आम्बेडकर के पाँव के निशान भी दिखाई देंगे , उन दिनों के जब उन्होंने भंडारा सीट
से लोकसभा चुनाव लड़ने के दौरान यहाँ डेरा डाला था ৷
अख़बार पर आज बहुत सी बातें हुई बशीर महताब का एक शेर जो मुझे बहुत अच्छा लगता
है वह भी पढ़ लीजिये...
मुझ को अख़बार सी लगती हैं तुम्हारी बातें
हर रोज़ नया फ़ितना बयाँ करती हैं ।
शरद कोकास
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें