| दादा हलमारे के घर के सामने की सीमेंट की बेंच |
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| सारवे का बाड़ा 2017 की तस्वीर |
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| छोटी बहन सीमा और माया के साथ एक तस्वीर |
मैट्रिक के बाद जब मैं उच्च शिक्षा ग्रहण करने हेतु भोपाल गया तो मेरे जाने के दो साल बाद माया भी वहाँ पढ़ने आ गई थी । बाबूजी के आग्रह पर बोपचे काका ने अपनी बिटिया को रीजनल कॉलेज में पढ़ने भेजा था ৷ माया पढ़ने में काफी होशियार थी ৷ बी एस सी ऑनर्स बी एड की अपनी पढाई पूर्ण करने के बाद उसने भंडारा में ही शिक्षक की नौकरी ज्वाइन कर ली और डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन ऑफिसर के पद तक पहुँची ৷ बचपन से हम लोगों के बीच का भाई बहन का यह रिश्ता अब अपने अपने परिवार के विस्तार के साथ और प्रगाढ़ हो गया है ৷ उसका विवाह भी भंडारा के जे एम पटेल कॉलेज के व्याख्याता मदन लाल जी देशमुख के साथ हुआ इस तरह भंडारा उनका स्थायी निवास हो गया ।
| हम लोगों का नाट्य स्थल दुर्गा मंदिर 2012 |
छाया और माया हम बच्चों के दिन प्रतिदिन के उधमबाजी वाले खेलों में तो शामिल नहीं थीं लेकिन वे हमारी सांस्कृतिक टीम की सक्रिय सदस्य थीं । क्वांर के माह में आनेवाले शारदीय नवरात्र की हमारे यहाँ धूम मचती थी । एक माह पूर्व ही मोहल्ले की बालपुरी नव दुर्गा उत्सव समिति के सदस्य सक्रिय हो जाते थे । यह ग़रीब लोगों की समिति थी, चंदा भी बहुत कम होता था इसलिए ऑर्केस्ट्रा , फिल्म , मिमिक्री जैसे कार्यक्रम नहीं होते थे लेकिन हम बच्चों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर प्रदान करने हेतु दो दिनों का सांस्कृतिक कार्यक्रम अवश्य रखा जाता था । छाया, माया, मेरी बहन सीमा, शंगर्पवार जी की बिटिया शुभा और प्रमोद भोयर सहित हम बच्चों की सांस्कृतिक टीम डांस, नाटक, गीत, कविता जैसे कार्यक्रमों की रिहर्सल में जुट जाती ।
वैसे तो हम लोगों ने बहुत से नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रम किये लेकिन एक नाटक मुझे विशेष रूप से याद है इसका नाम था ‘वरवंट्याची खीर’ अर्थात ‘सिलबट्टे की खीर’ । मराठी में पाटा यानि सिल और वरवंटा का अर्थ बट्टा होता है । एक तरह से इसे ‘बट्टे की खीर’ भी कह सकते हैं इस नाटक में मैंने मुसाफिर की और माया ने माई की भूमिका का निर्वाह किया था । इस नाटक का कथानक बड़ा मज़ेदार था ।
एक मुसफ़िर भटकता हुआ एक एक गाँव में पहुँच जाता है । उन दिनों यात्री पैदल ही यात्राये करते थे । शाम होती है तो वह रात बिताने के लिए कोई ठिकाना ढूँढता है । संयोग से उसे गाँव की सीमा पर ही एक बुढ़िया का घर दिखाई देता है । बुढिया उसे रात बिताने के लिए अपनी झोपडी में आसरा दे देती है ।
बुढिया तो भोजन कर चुकी होती है लेकिन आतिथेय के नाते उससे पूछती है “तुम कुछ नहीं खाओगे ?“ मुसाफ़िर रुखा सा जवाब देता है “मैं किसी के यहाँ का कुछ नहीं खाता । आपने मुझे सहारा दिया इतना काफी है । “ लेकिन वृद्धा का मन नहीं मानता । वह ज़ोर देती है तो मुसाफिर कहता है “ अच्छा माई ऐसा करो चूल्हे पर एक बर्तन में पानी उबलने रख दो ।“
फिर वह थैले में से एक बट्टा निकालता है और वृद्धा से कहता है “इसे भी पानी में डाल दो । “ बुढिया पूछती है “ इससे क्या होगा ? यह तो पत्थर है । “ वह कहता है “माई, इसे ऐसा वैसा पत्थर न समझो यह चमत्कारी पत्थर है, इसीसे खीर बनेगी ।“
बहुत देर तक पानी उबलने के बाद भी जब कुछ नहीं होता तो वृद्धा चिंतित हो जाती है । वह कहती है “बेटा, इसमें तो कुछ नहीं हो रहा है ।“ वह कहता है “माई लगता है कहीं कुछ गड़बड़ हो गई है । ऐसा करो इसमें थोड़ा दूध डाल दो ।“ वृद्धा दूध डाल देती है । उसके बाद भी कुछ नहीं होता तो कहता है “माई कुछ तो गड़बड़ अवश्य है इसका जादू काम नहीं कर रहा है, ऐसा करो थोड़ा चावल डाल दो ।“ फिर वह कुछ देर बाद वह माई को फुसलाकर चीनी, काजू, किशमिश भी डलवा लेता है । खीर पक जाने के बाद वह बर्तन से बट्टा निकाल लेता है और उसे धो पोछ कर थैले में रख देता है । फिर चटखारे लेते हुए ख़ुद खीर खाता है और माई से कहता है “ माई तुम भी चखो , देखो इस चमत्कारी बट्टे की खीर कितनी स्वादिष्ट बनी है ।“
कभी कभी लगता है हम देशवासियों की हालत उस सीधी सादी बुढिया जैसी हो गई है और हमारे पालनहार उस चालाक मुसाफिर जैसे हो गए हैं । सारे के सारे योजनाओं का सिल और बट्टा लिए घूम रहे हैं और हमारे दिए गए टैक्स के पैसों से, हमारे श्रम से अर्जित धन और खेतों में उपजाए धान्य की वज़ह से बनी सुख सुविधाओं की खीर का उपभोग कर रहे हैं । हम उनकी इस चालाकी को उनका चमत्कार समझ कर ही प्रसन्न हैं।
शरद कोकास

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