10 जून 2026

108 स्कूल की बेंचें जिनसे दोस्ती की गवाह हैं











टन टन बजती हुई स्कूल की घंटी, य..य..यस सर, यस मैडम की दबी दबी सी या तेज़ आवाज़, सहेली के कान में फुसफुसाकर कहना “देख तो, वो लड़का कैसे देख रहा है ৷“ स्कूल से बाहर कदम रखते ही लड़कों का जोर से चिल्लाना “ अरे..कल नहीं आना है रे , कल छुट्टी है ৷“ “यार, ये सर बड़े ख़राब हैं इत्ता सारा होम वर्क दे दिया “ ए, तू कल घर आएगा क्या मेरे, मस्ती करेंगे ?” “नई, पापा डांटते हैं ,घर में बहुत काम है ..৷” “वो ना सर्किट है, बड़ा एटिकेट दिखाता है ৷“ “छी... गंदी बात ৷“ ए कित्ता सुन्दर रिबन और ये लव इन टोकियो ..कहाँ से ली रे तूने ?”



कभी कभी अपने अकेलेपन में, मन के अँधेरे गहरे कुएँ से यह सब आवाजें सुनाई आती सी लगती हैं ৷ ऐसा लगता है जैसे घर्र घर्र करते किसी पुराने प्रोजेक्टर पर कोई पुरानी ब्लैक एंड वाइट फिल्म चल रही हो ৷ अवचेतन के पर्दे पर धुंधले धुंधले से दृश्यों के बीच, स्कूल के दिनों के यह चिर परिचित संवाद सुनाई देते हैं और स्मृति की चमक में कौंध जाते हैं बचपन की स्कूल लाइफ के जाने कितने चेहरे ৷



प्रायमरी स्कूल का वह पहला दिन जैनेन्द्र भगत और जितेन्द्र भगत इन दो जुड़वाँ भाइयों से दोस्ती का दिन था । दोनों का घर मेरे घर के पास ही था । पहले ही दिन मैंने इस तथ्य को आत्मसात कर लिया कि जैनेन्द्र जितेन्द्र से पाँच मिनट पहले इस दुनिया में आया है इसलिये वह उम्र में बड़ा है, हालाँकि उस वक़्त मुझे यह बिलकुल नहीं पता था कि बच्चे दुनिया में कैसे आते हैं। हमारे समय में इसका अधिकृत उत्तर था “बच्चे भगवान के घर से आते हैं ।“ भगवान के घर का पता पूछने पर हमेशा ऊपर की ओर इशारा कर दिया जाता था ।



पहले ही दिन स्कूल से लौटते हुए मैंने उन्हें अपना घर दिखा दिया था । उन्होंने कहा कि वे लोग शाम को मुझे लेने आएंगे और अपने घर ले चलेंगे । उनके घर के सामने एक मराठी प्राथमिक शाला थी जिससे लगे मैदान के अंत में एक कच्ची नाली थी जो कीचड़ से लबालब भरी थी । हम लोग मैदान में कुलाटी मारने का खेल खेल रहे थे । मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि मैदान में घास की सीमा कहाँ तक है । एक, दो, तीन, चार के बाद यह अंतिम कुलाटी और मैं सीधा नाली के भीतर ৷



मेरा वह कीचड़ावतार देखकर सब लोगों ने मेरी हँसी उड़ानी शुरू कर दी । प्रारंभिक घबराहट के पीछे पीछे शर्म भी चली आई, लेकिन मेरे चेहरे पर कीचड़ का मेकअप इतना गहरा था कि वह किसी को दिखाई नहीं दी ৷ घर पहुँचने के बाद माँ ने कई कई बाल्टी पानी मुझ पर डाला और रगड़ रगड़ कर मुझे नहलाया ৷ उस रगड़ में चांटे भी शामिल थे जिनका मुझे पता ही नहीं चला ৷ अपने स्कूल के पहले दिन की यह घटना अवचेतन के खाते में दर्ज कर मैं खा पीकर मज़े से सो गया ।



बरसों बाद जब स्लम डॉग मिलेनियर नामक एक फिल्म आई जिसकी प्रारम्भिक रीलों में ऐसा ही एक दृश्य मुझे दिखाई दिया तब अचानक मुझे याद आया .. ऐसा ही तो मेरे साथ भी घटित हो चुका है बचपन में ৷ मनोविश्लेषण चिकित्सा पद्धति में सिगमंड फ्रायड ने इसे फ्री असोसिएशन कहा है अर्थात मुक्त संयोजन, जब हमें अचानक किसी पाठ से,किसी दृश्य से, किसी गंध या किसी ध्वनि से बीते दिनों की याद आ जाती है जैसे कि मेरे यह एपिसोड्स पढ़कर आपको इन दिनों अपना बचपन याद आता है ৷



खैर, अब वह इतनी छोटी सी घटना थी कि उससे मैं क्या सबक लेता, सो मैं भी वह बात भूल गया৷ लेकिन इतना सबक मुझे मिल गया कि यदि हम अपनी सीमाओं का ध्यान नहीं रखेंगे तो लुढ़ककर कीचड़ में गिर जाने से हमें कोई नहीं बचा सकेगा । यह सबक जीवन भर मुझे झूठ,फरेब,धोखे,बेईमानी और अनैतिकता के दलदल में गिरने से बचाता रहा ।



अब आगे बढ़ते हैं ৷ पहली क्लास जैसे पढ़े लिखों की दुनिया में प्रवेश का प्रवेश द्वार होता है लेकिन मैं तो ढाई साल की उम्र से ही बालक मंदिर में टॉप करके आया था इसलिए बाबूजी ने पहली और दूसरी की परीक्षा एक साथ दिलवा दी और मैं सीधे पहली से छलांग लगाकर तीसरी कक्षा में आ गया ৷ इस तरह मैं जैनेन्द्र जितेन्द्र से एक साल आगे हो गया लेकिन मेरी उनसे दोस्ती ज़रा भी कम नहीं हुई आख़िर वे मेरी स्कूल लाइफ के पहले मित्र थे । यह दोस्ती आज भी जारी है ৷



कुछ दिनों बाद जैनेन्द्र जितेन्द्र दोनों दूसरे मोहल्ले में जाकर रहने लगे थे । मैं कभी कभी उनके यहाँ जाया करता था । मैंने जीवन में पहली बार कूलर उन्हीं के यहाँ देखा था । दरअसल वह कूलर की तरह ही तीन तरफ खस की टट्टी से घिरा हुआ टिन की चादर से बना का एक ढांचा होता था जिसके भीतर टेबल फैन रख दिया जाता था । ऊपर टीन से बनी एक टंकी होती थी जिसमें छेद होते थे ৷ पानी छेदों से निकल कर खस की टट्टियों को गीला करता हुआ नीचे वाली टंकी में जमा हो जाता था । जब नीचे की टंकी भर जाती तो उसे खाली कर ऊपर की टंकी में डाल दिया जाता । यह वर्तमान कूलर का आदिम रूप था ।



जैनेन्द्र जितेन्द्र अपनी माँ को बाई कहकर बुलाया करते थे । माँ के लिए यह संबोधन मनमोहन ताउजी के बच्चे भी अपनी माँ के लिए करते थे ৷ महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में स्त्री के लिए यह शब्द बहुत सम्मानजनक माना जाता है ৷ जैनेन्द्र जितेन्द्र से बड़े एक भाई थे जिन्हे हम लोग बाबा कहते थे । वे भी स्कूल में हम लोगों से सीनियर थे और एक बार स्कूल के स्नेह सम्मेलन में उन्होंने फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में शिवजी का स्वांग धरा था । जैनेन्द्र जितेन्द्र से छोटे पप्पू यानि योगेश फिर संतोष और मुकेश थे ৷



हम तीनों दोस्तों के बीच मज़ेदार बात यह थी कि जैनेन्द्र जितेन्द्र की सूरत इतनी मिलती थी कि कोई पहचान ही नहीं पाता था कि कौन जितेन्द्र है और कौन जैनेन्द्र ৷ एक अकेला मैं था जो ठीक ठीक उन्हें पहचान लेता था ৷ आगे के बरसों में जब दिलीप कुमार की राम और श्याम, हेमामालिनी की सीता और गीता जैसी फिल्मे आईं उन्हें देखकर लोगों ने कहा “ऐसा भी कहीं होता है क्या, एक जैसी सूरत के दो लोग ?” तब मैं उन्हें जैनेन्द्र जितेन्द्र का किस्सा सुनाता ৷



लीजिये आज के एपिसोड के साथ जैनेन्द्र जितेन्द्र की ताज़ा तस्वीर दे रहा हूँ, एक नीली टी शर्ट में है एक सफ़ेद टी शर्ट में, कौन जैनेन्द्र है और कौन जितेन्द्र ? आप में से जो सही सही जवाब देगा, उसके साथ मेरी ज़िंदगी भर की दोस्ती फ्री ৷



( आकाशवाणी - दोस्ती तो फ्री ही होती है पगले, जिस दोस्ती में पैसा हो या स्वार्थ हो,मतलब हो उसे दोस्ती नहीं कहते )



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