10 जून 2026

107 .वो खेल वो साथी वो झूले



चलते चलते जब हम ज़िंदगी में बहुत दूर तक आ जाते हैं कभी न कभी पीछे मुड़कर अवश्य देखते हैं ৷ घटित एवं अघटित के द्वंद्व में व्यक्ति,स्थान,और घटनाओं के परिणाम हमारे मानस में उद्वेलन उत्पन्न करते हैं ৷ स्मृतियों का परावर्तन सबसे अधिक हमें मोहल्ले के और पास पड़ोस के उन मित्रों का स्मरण कराता है जिनके साथ हम बचपन में खेलते थे, लड़ते झगड़ते थे, छीना झपटी करते थे, कभी रूठ जाते थे कभी मान जाते थे ৷ 


यह एक सूत्र वाक्य है कि मनुष्य अपने जीवन में सम्बन्धियों का, मित्रों का,व्यवसाय और उससे जुड़े लोगों का चयन तो कर सकता है लेकिन अपने निकटतम पड़ोसियों का चयन नहीं कर सकता ৷ हमारे पड़ोस में कौन रहने आने वाला है या हम किसके पड़ोस में रहने वाले हैं यह कोई नहीं जानता ৷ यह बात हम अपने बचपन से महसूस कर सकते हैं ৷ इसलिए बचपन के सबसे पहले दोस्त अपने मोहल्ले के दोस्त ही होते हैं । यह वे दोस्त होते हैं जो न तो हमारे साथ पढ़ते हैं न ही हमारे हम उम्र होते हैं फिर भी वे हमारे खेल कूद और बातचीत के साथी होते हैं । 


घर की बगल में रहने वाले पांडुरंग ठाकरे के बच्चों में अशोक मुझसे बड़ा था , अरुण लगभग हमउम्र और मनोहर छोटा ৷ घर के सामने उरकुडा माहुले रहते थे जिनका बेटा रामकिशन मेरा हमउम्र था और राधाकिशन मुझसे छोटा ৷ भंडारा में उस समय हमारे पड़ोसियों में सबसे सामने श्री शिवराम ठाकरे रहा करते थे ৷ वे कचहरी में सदर नाजिर थे । उनके बूढ़े माता - पिता भी उनके साथ रहा करते थे । उनके पिता भोजराम जी को हम लोग बाबाजी कहा करते थे । उनके समवयस्क उन्हे महाजन कहते थे । 


शिवराम काका के पाँच बच्चे हैं सबसे बड़ा बाबा यानि यशवंत, फिर सुरेखा, बंडू, छोटू और नाना । उनका बड़ा बेटा बाबा बहुत ज़िद्दी था । उस समय जब वह पाँचवी या छठवीं में पढ़ता था ৷ उसका पढ़ने में बिलकुल मन नहीं लगता था । शिवराम काका उसे इस बात के लिये बहुत डाँटते थे । एक दिन जब वे दफ्तर से आये बाबा घर में नहीं था । इस बात पर उन्हें इतना गुस्सा आया कि उन्होंने माचिस की तीली से उसका पाँव जला दिया “लो, अब जाओ घर से बाहर ।“ 


यशवंत बेचारा बहुत रोया  । दूसरे दिन वह घर में ही बैठा रहा । बाबूजी ने तब उसका पक्ष लिया, उसे प्रेम से समझाया उसके पाँव में दवा लगाईं और उसे अपनी साइकल पर बैठाकर अपने साथ कॉलेज ले गये । उसके बाद वह पढ़ने लिखने में बहुत कुछ ठीक हो गया । बाद में उसे जिला कार्यालय  में नौकरी भी मिल गई । लेकिन मुझे याद है बाबूजी ने उस समय शिवराम काका को भी इस बात के लिए डांट लगाई थी ৷ यह वह समय था जब पड़ोसियों में भी काका,मौसी,मामा, छोटे भाई, बड़े भाई जैसे रिश्ते होते थे और इन प्रेम संबंधों के वशीभूत होकर घर के लोगों की तरह वे एक दूसरे के जीवन में इस तरह हस्तक्षेप कर सकते थे ৷


हमारी गली से निकलते ही बाईं ओर डाकरे का बाड़ा था जिसमें मेरा मित्र अनिल झाड़े रहता था । मैं शरद और अनिल पक्के दोस्त थे । लेकिन जब मैं हाई स्कूल में पहुँचा तब अनिल के पिता का भी तबादला हो गया और वे लोग भी चले गये । शरद और प्रमोद तो पहले ही चले गए थे ৷ इस तरह मैं अकेला हो गया । शरद और अनिल के अलावा, हलमारे के घर के सामने रहने वाला चन्द्रकांत कलकोटवार भी मेरा मित्र था । वे लोग भी पाँच छह भाई बहन थे । चन्द्रकांत से छोटी एक बहन थी जिसका  नाम माधुरी था । नागपुर से एक बार कंचन भैया आये थे तब हम लोग दिन भर उनके यहाँ रेसटीप खेला करते थे । वे लोग भी अधिक दिनों तक भंडारा में नहीं रहे । इस तरह मैं फिर अकेला हो गया । हमारे पड़ोसी कभी भी बदल सकते हैं इस बात का अनुभव मुझे बचपन में ही हो गया था ৷ 


इसके बावजूद पड़ोस में कुछ ऐसे मित्र थे जो स्थायी रूप से वहाँ रहते थे लेकिन उनमे अधिकांश काफ़ी गरीब घरों से थे ৷ मैं उनके साथ बचपन में खेला अवश्य करता था लेकिन वर्ग के जीवन स्तर के कारण एक दूरी सी बनी हुई थी । यद्यपि हमारी मित्रता के घरों में सुख सुविधा और अभाव सगे भाई बहन की तरह रहा करते थे जहाँ ग्लानि अथवा अहंकार के लिए कोई स्थान न था ৷


शरद भोयर के घर के सामने एक रिटायर्ड स्कूल शिक्षक तिवारी जी रहा करते थे जिनके छह बेटे थे और एक बेटी थी । उनका दूसरे नम्बर का  बेटा अशोक मुझसे कुछ बड़ा था ৷ उससे मैं अक्सर गपशप किया करता और वह मुझे मोहल्ले के लोगों की अजीब अजीब बातें बताया करता ৷ बाद में उसे शराब की लत लग गई थी जिसका प्रतिफल उसे अल्पायु के रूप में प्राप्त हुआ । उससे छोटा नरेश उर्फ गुल्लू अब भी मेरा मित्र है ,वह शरद,प्रमोद,केशव मामा आदि के साथ हमारी क्रिकेट टीम में शामिल था ।


इसके अलावा कुछ बड़े भाई और बड़ी बहन जैसे मित्र भी थे जिनके साथ हम बचपन के बचपन में ही खेलते थे फिर वे हमें अपने साथ नहीं खिलाते थे ৷ ऐसी ही हमारी एक मित्र लीला ताई थी जो लघोरी या पिट्टू और रेस टीप  जैसे खेलों में हमारी टीम लीडर थी ৷ रंगोली  बनाना मैंने लीला से ही सीखा ৷ 


घर से निकलकर सहकार नगर जाने वाले रास्ते के पहले रिंग रोड पर सुशील माहुले से मेरी दोस्ती हुई यद्यपि यह दोस्ती स्कूल के दिनों में केवल पहचान तक सीमित थी, जो वक्त गुजरने के बाद मेरे कॉलेज के दिनों में परवान चढी ৷ सुशील के साथ बिताये उन दिनों में सुधीर परघने भी था जो उम्र में हम लोगों से काफी बड़ा था ৷ लेकिन वे सब बाद की बातें हैं जिनका घटित होना अभी शेष था ৷ 


सुशील और सुधीर के साथ बिताये उन दिनों में होली के रंग हैं , मधुर मुनक्का की गोली है, बड़े बड़े मटकों में लगे स्पीकरों से आती जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की गाई ग़ज़लें हैं और चाबीवाला एक पुराना ग्रामोफ़ोन जिस पर लाख के रिकॉर्ड बजाये जाते थे .. तुम्हारी अंजुमन से उठके दीवाने कहाँ जाते जो वाबस्ता हुए तुझसे वो अफ़साने कहाँ जाते ৷ 


बहुत सारे दोस्त जब पड़ोस से चले गए तो मैंने किताबों से दोस्ती कर ली ৷ हाईस्कूल में जाने के बाद तो अक्सर मेरी शामें डिस्ट्रिक्ट लायब्रेरी में बीतने लगीं । शाम को स्कूल से आने के बाद खाना खाकर मैं लायब्रेरी चला जाया करता । मैंने वहाँ की मेम्बरशिप ले ली थी और अपनी पसन्द की किताबें ले आया करता था । उस समय श्री केदार वहाँ ग्रंथपाल थे और फिर उनके बाद सुधाकर जोशी आये । यहाँ हिन्दी साहित्य की पुस्तकें नहीं के बराबर थीं लेकिन मराठी साहित्य विपुल मात्रा में उपलब्ध था यहाँ मैंने वि.स.खांडेकर,पु.ल.देशपांडे,शिवाजी सावंत ,साने गुरूजी. प्रह्लाद केशव अत्रे ,रणजीत देसाई जैसे लेखकों को खूब पढ़ा ৷ 


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