उस ज़माने में जब पैसे बहुत मेहनत और ईमानदारी से कमाए जाते थे, बड़े अक्सर बच्चों से कहते “जानते हो पैसे पेड़ पर नहीं उगते ৷’ फिर बच्चे जीवन भर इस जानकारी को अवचेतन में लिए लिए पैसे कमाने के साथ साथ बचाने के असफल प्रयास में लगे रहते ৷ यद्यपि सत्ता एवं पूंजीपतियों के गठजोड़ की वज़ह से शोषण उन दिनों भी कम नहीं था और निरक्षरता इतनी अधिक कि मनुष्य अपने शोषण और बदहाली के कारणों को ठीक से जान भी नहीं पाता था ৷
मैं भी एक मामूली से शिक्षक का बेटा था और वरिष्ठ पीढ़ी के उपदेशों को ग्रहण करने का संस्कार मुझे जन्म घूँटी में मिला था ৷ पेड़ और पैसे संबंधी यह सूत्र वाक्य जाने कैसे मेरे मन में अपने भौतिक अर्थ में स्थापित हो गया৷ मुझे अक्सर सपने में दिखाई देता कि आँगन में जाम के पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर मैंने दस पैसे का सिक्का बो दिया है, फिर कुछ दिनों बाद वह बड़ा होकर एक विशाल पेड़ बन गया है और उसमे अलग अलग शाखाओं पर पांच पैसे, दस पैसे, चवन्नी और अठन्नी उग आये हैं ৷
यह सपना इतनी बार आता था कि एक दिन बैतूल में जीनियस से दिखाई देने वाले एक बड़े भैया से मैंने अपने इस सपने का बखान कर दिया ৷ उन्होंने ऐनक संभालते हुए कहा “ऐसा कैसे हो सकता है ?” फिर वह गंभीरता से कुछ देर तक सोचते रहे ৷ मुझे लगा वह कहेंगे “पेड़ पर कभी पैसे नहीं उग सकते ৷” लेकिन उन्होंने प्रकट में कहा “तुमने दस पैसे बोये थे, उस पर पाँच पैसे, चवन्नी या अठन्नी के सिक्के कैसे उग सकते हैं ?उस पर तो दस पैसे ही उगने चाहिए ৷” मैंने पहली बार महसूस किया कि जीनियस वास्तव में ऐसे ही होते हैं ৷
उस साल छुट्टियों में बैतूल में मैंने जब मदनमोहन ताउजी को अपने इस सपने के बारे में बताया उन्होंने कहा “सच तो है, पैसे पेड़ पर नहीं उगते लेकिन गुल्लक में तो जमा होते हैं ৷” फिर उन्होंने मेरे लिए लकड़ी की एक गुल्लक बना दी ৷ यह गुल्लक एक आयताकार बॉक्स था जिसमे नीचे से प्लाईवुड की एक तख्ती लगी थी और ऊपर से पैसे डालने के लिए एक छेद था ৷ भंडारा लौटकर उसमे पैसे जमा करना जैसे मेरा रोज़ का शगल हो गया ৷ जेबखर्च से बचाए और माँ,बाबूजी,बुआ,मौसी,चाची,बड़ी माँ आदि से प्राप्त पैसों से कुछ ही महीनों में यह पेटी आधे के लगभग भर गई ৷
एक दिन मैंने सिक्का डालने के लिये जैसे ही गुल्लक निकाली वह मुझे कुछ हल्की सी लगी । मैंने उसे हिलाकर देखा तो महसूस किया वह लगभग खाली है ৷ उसमे से सारे पैसे गायब हो चुके थे । मैंने तुरंत माँ को यह बात बताई । माँ ने कहा “हो न हो यह काम प्रभा का ही है क्योंकि वह रोज़ हमारे घर आया करती है और जिस अलमारी में वह गुल्लक रखी है उसके पास बिछे पलंग पर बैठकर किताब पढ़ा करती है ।“
बात तुरंत मकान मालकिन नानी तक पहुंचाई गई ৷ नानी बड़ी सयानी थीं ৷ उन्होंने अगली सुबह पड़ोस के चार- पाँच बच्चों को बुलाया, उनमें प्रभा भी थी । सभी बच्चों को उन्होंने भुने हुए चने खाने के लिये दिये और खाने के बाद उनसे कहा कि “मैंने यह चने मंतर फूँककर दिये हैं ৷ जिस बच्चे ने भी गुल्लक से पैसे चुराये होंगे रात भर में उसका पेट फूल जाएगा और वह मर जायेगा ।“
वह लड़की यह सुनकर घबरा गई और रोने लगी ৷बस फिर नानी के पुचकारते ही उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया । उसने बताया कि वह गुल्लक के नीचे लगे प्लायवुड को पेंचकस से उचका लेती थी और उस गैप से पैसे निकाल लेती थी । उसने नौ रुपये तो तुरंत लाकर दे दिये । माँ ने धीरे से यह बात प्रभा की माँ को बता दी । वे यह बात सुनकर बहुत शर्मिन्दा हुईं । उन्होंने माँ से पूछा कि “उस गुल्लक में कितने रुपये थे ।“ माँ ने अन्दाज़ से कहा “ पच्चीस रुपये ৷ “ बाद में वे पैसे भी उन्होंने लाकर दे दिये ৷
प्रभा बहुत अच्छी लड़की थी और मुझे भी बहुत अच्छी लगती थी ৷ लेकिन फिर वह कभी हमारे घर नहीं आई ৷ वह मुझसे नज़रें नहीं मिलाती थी और सड़क पर मुझे देखकर वह अपना रास्ता बदल लेती थी ৷ कुछ समय बाद उसके पिता का तबादला कहीं और हो गया और वे मोहल्ला छोड़कर चले गए ৷ मुझे इस बात का हमेशा अफ़सोस रहा कि उसे मैं आत्मग्लानि से बाहर नहीं निकाल पाया ৷
अपराध कबूलवाने का नानी द्वारा अपनाया गया यह तरीका भी मुझे उचित नहीं लगा था इसलिए कि मैं जानता था ऐसा कोई मंतर नहीं होता जिससे किसी का कुछ बिगाड़ा जा सके ৷ बड़े होने के बाद जब मैंने अंधश्रद्धा निर्मूलन क्षेत्र में कार्य प्रारम्भ किया तो महसूस किया कि बच्चे अपने बचपन से प्राप्त ऐसे अवैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर जीवन भर जीते हैं ৷ बड़े इस बात को कभी महसूस नहीं करते कि उन्होंने बच्चों के जीवन में जो अंधविश्वास बोए हैं उनसे उनका कितना अहित हुआ है ৷

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें