दिन भर स्कूल ड्रेस पहनने के उन दिनों में सबसे अधिक मज़ा घर में होने वाली शादियों में आता है इसलिए कि दो तीन दिन ही सही स्कूल ड्रेस से मुक्ति मिल जाती है ৷आईने में खुद को देखो तो लगता ही नहीं अपन आठवीं के छात्र है लडकियाँ तो मानो अपनी उम्र से बहुत परिपक्व दिखने लगती हैं ৷
उस साल गर्मी के दिनों में हमारे बैतूल के घर में दो शादियाँ हुईं ৷ यह दोनों शादियाँ बाबूजी की दो चचेरी बहनों की थीं यानी एक हमारी उषा बुआ चंदनलाल दादाजी की बेटी और एक सरोज बुआ यानी कुंदनलाल दादाजी की बेटी ৷ एक बारात मुंबई से आई थी और एक बिलासपुर से ৷
उन दिनों शामियाने का उतना चलन नहीं था इसलिए घर के सामने ही बल्लियों से मंडप बनाया गया और उस पर तिरपाल बिछाकर ऊपर से जामुन की टहनियां डाल दी गईं ৷ चारों और लकड़ी के सुन्दर पटियों से बाउंड्री बनाई गई तथा ऊपर की ओर एक लाइन में रंगीन बल्ब लटकाए गए ৷ गेट की सजावट रंगीन पर्दों और पतली पतली कांच की रंगीन नलियों वाली झालरों से की गई ৷
उन दिनों एक दिन वाली शादी शादी जैसी नहीं लगती थी ৷ एक सप्ताह पहले से मेहमान आना शुरू हो जाते और तीन दिन पूर्व से मांगलिक कार्यक्रम ৷ पहले दिन मंडप, फिर मांगर माटी, फिर सिलपोनी ৷ सिलपोनी नामक यह कार्यक्रम बड़ा मजेदार होता था ৷ मंडप में वरीयता क्रम में घर के सब वरिष्ठ लोग जोड़े से सिल पर उड़द की दाल पीसते हैं । जिसका नंबर अंत में आता है उसे अपनी पत्नी के साथ सिल बट्टा और पीसी हुई दाल लेकर भीतर चूल्हे तक जाना होता है ৷ चूल्हे पर एक कढ़ाई चढ़ी होती है ৷ फिर उस दाल से बड़े बनाये जाते हैं । हम बच्चों के लिये एक के बाद एक वरीयता क्रम के अनुसार अपने दादा, दादी, चाचा, चाचियों और माता पिता को दाल पीसते देखना मनोरंजक कार्यक्रम की तरह होता था ।
मांगर माटी या खनमट्टी में घर की स्त्रियाँ पास के खेत या तालाब से मिट्टी खोदकर लाती हैं ৷ मंडप में खम्भे के पास सुन्दर कलश सजाये जाते हैं तथा देवताओं का आव्हान किया जाता है ৷ पंडित जी देवताओं के अलावा आंधी, तूफ़ान,भूकंप,बाढ़ जैसी विघ्नकारी शक्तियों को भी आमंत्रित करते है तथा उन्हें मटके में बंद कर उन्हें मिट्टी से पैक कर देते हैं ताकि ऐन विवाह के समय वे डिस्टर्ब न करें ৷
पहली बार जब मैंने पंडित जी को ऐसा करते देखा तो आदतन मैंने उनसे पूछा “पंडित जी, मान लीजिये आंधी तूफ़ान को भीतर अच्छा नहीं लगा और वे मटके का ढक्कन खोलकर बाहर आ गए तो ?” पंडित जी ने मुस्कुराते हुए कहा .. “भाई, हम दक्षिणा किस बात की लेते हैं ? हमें जितनी दक्षिणा दोगे उसके अनुसार हम सुरक्षा व्यवस्था करेंगे ৷” सच कहूँ तो धर्म और अर्थ का गणित मुझे उसी दिन समझ में आ गया था ৷ उस दिन के बाद से मुझे पंडितों से ऐसे टेढ़े मेढ़े सवाल करने में बहुत आनंद आने लगा ৷
इस मांगलिक कार्यक्रम में मुझे एक बात बहुत अच्छी लगी৷ पंडित जी हमारे दादाजी से पूछ पूछ कर सभी पुरखों के नाम ले रहे थे और उन्हें भी इस वैवाहिक कार्यक्रम में आमंत्रित कर रहे थे ৷ उस समय पहली बार मेरे मन में यह विचार आया कि अपने इन सभी पुरखों के नाम कहीं न कहीं लिख कर रख लेने चाहिये । कुछ बड़े होने के बाद मैंने सुन्दरलाल दादा जी से पूछ पूछ कर सभी पूर्वजों के नाम दर्ज कर लिये और नौ पीढ़ियों का एक चार्ट बनाया जिसे मैंने बाद में अपनी पुस्तक “ कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ “में प्रकाशित किया ।
इस विवाह में शामिल होने के लिए भंडारा से हम लोगों के साथ मेरे ममेरे भाई आनंद शर्मा भी बैतूल गए थे उन्हें हम लाल दादा कहते थे ৷ लाल दा उस समय खरगपुर आई आई टी में पढ़ रहे थे । वे छुट्टियों में मुम्बई जाते समय अक्सर भंडारा ठहर जाया करते थे । उन्नीस सौ सतत्तर में लाल दा खरगपुर से बी टेक करने के बाद एम टेक और पी एच डी करने के लिए अमेरिका चले गए और फिर वहीं सेटल हो गए ৷

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