10 जून 2026

104 .वह समय स्कूल लाइफ का बुधवार था



टीन के बड़े से दरवाज़े की आवाज़ सुनकर चौंक जाने वाला घर का बड़ा सा वह आँगन,अपनी ज़मीन पर  कमरे बनाए जाने के पक्ष में बिलकुल नहीं था ৷ लेकिन मकान मालकिन नानी को पैसों की ज़रूरत थी सो उन्होंने आँगन की मर्ज़ी पूछे बगैर आंगन के एक ओर जहाँ पेड़ पौधे और एक पुराना सा छप्पर था, छोटे छोटे तीन कमरे निकाल ही दिये ৷ आंगन बेचारा क्या करता ,अपना जिस्म और अपना दिल छोटा करके रह गया ৷


मुर्गी के दड़बेनुमा इन कमरों में किराये से रहने के लिए जो पहले किरायेदार आये उनका नाम था मिस्टर पावड़े ৷ वे किसी सरकारी विभाग में  क्लर्क थे ৷ बड़ी प्यारी सी छोटी छोटी दो बच्चियाँ थीं उनकी जिनके नाम थे चित्रा और मेघा । पावड़े काका को गाने का शौक था ৷ साथ ही एक कला और उनके पास थी, वे मुँह से विभिन्न वाद्ययंत्रों की आवाज़ निकालने में माहिर थे ৷ वे अक्सर फिल्म ‘नवरंग’ का एक गीत गाया करते...” तू छुपी है कहाँ, मैं तड़पता यहाँ, तेरे बिन फ़ीका फ़ीका है, दिल का जहाँ, तू छुपी है कहाँ .. “ कमाल की बात यह कि इस  गीत में जो शहनाई की आवाज़ है उसे वे मुँह से हू ब हू निकालते थे.... पीं पीं पीं पीं... पीं ईं ईं ..ईं अ .. पीं पीं पीं पीं.... ईं ईं ..ईं ৷  


इधर ढोला स्कूल के उस कमरे से हमें मुक्ति मिल गई थी जिसकी छत हर बारिश में, रोने धोने वाली फिल्म को देखते हुए टपकने वाले आँसुओं की तरह टपकती थी ৷ हम लोग सातवीं पास करके आठवीं कक्षा में आ गए थे ৷ यह कमरा ग्राउंड फ्लोर पर था और बड़े हाल से लगा हुआ था ৷  


सातवीं आठवीं के दिन स्टूडेंट लाइफ के सबसे सुहाने दिन होते हैं । हम प्राइमरी लेवल की अपरिपक्वता से उबर चुके होते हैं और हायर सेकंडरी लेवल की गंभीरता काफी दूर होती है ৷ सप्ताह के दिनों से यदि तुलना की जाए तो यह समय मुझे बुधवार की तरह लगता है न सप्ताह प्रारंभ होने का टेंशन न ख़त्म होने की चिंता ৷


यह वे दिन थे जब मुझे पढ़ाई के अलावा अन्य कामों में भी बहुत मज़ा आता था । पावड़े काका से मेरी खूब जमती थी ৷ वैसे भी गानेवाले लोग मुझे अच्छे लगते हैं ৷ मैंने पावड़े काका को गणेशोत्सव के किस्से सुनाये तो उन्होंने कहा “इस साल हम लोग घर में गणेशजी की स्थापना करेंगे ৷” मैंने भी अपनी रुचि दिखाई और  थोड़ी डींग हांकते हुए कहा कि “इस बार सजावट मैं करूंगा ।“ मैंने कहीं देखा था कि डिब्बों पर एक बोरा बिछाकर उस पर काली मिट्टी डाल देते हैं और उसपर राई छिड़क देते हैं ৷ कुछ दिनों में राई के पौधे ऊग जाते हैं  और वह एक पहाड़ की तरह दिखाई देता है । ऐसा ही कुछ प्लान मेरा भी था ৷


गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले मैं पास के जोगीतालाव मैदान गया और वहाँ से खुदाई कर एक घमेला काली मिट्टी ले आया ৷ मैंने रसोई के कुछ छोटे बड़े डिब्बे खाली किये और उन पर बोरा बिछाकर उस पर मिट्टी घोलकर डाल दी ৷ लेकिन मिटटी का घोल शायद ज़रूरत से ज्यादा पतला हो गया था इस वज़ह से वह मिट्टी बोरे  पर ठहरी ही नहीं और बहकर फर्श पर आ गई ৷ मेरा पहाड़ खड़ा होने से पहले ही ढह  गया ৷ 


इस नाटक का अंतिम दृश्य बहुत मार्मिक था ৷ शरद नाम का एक नन्हा सा बालक, कानों में बाबूजी की डांट और आँखों में आँसू लिए, अपनी मिट्टी से सनी हाफ पैंट संभालते हुए फर्श से कीचड़ साफ कर रहा था ৷ रसोई के डिब्बों को धो पोछकर रखने की हिदायत माँ से पहले ही मिल चुकी थी हालाँकि माँ उसमे मदद कर रही थी ৷ पावड़े काका जिनका इस काम के बनने बिगड़ने में ज़रा भी योगदान नहीं था एक और खड़े , मुसकुराते  हुए पीं पीं पीं पीं... कर रहे थे ৷


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें