बचपन के उस घर में राजा रवि वर्मा की बनाई हुई सरस्वती की एक तस्वीर थी जो एक कैलेण्डर में छपी थी और जिसे फ्रेम में मढ़कर बाबूजी ने छपरी में दीवार पर टांग दिया था ৷ लोग राजा रवि वर्मा,मूलगाँवकर जैसे चित्रकारों को नहीं जानते थे लेकिन उनके द्वारा चित्रित किए गए लक्ष्मी और सरस्वती के चित्रों की पूजा हर घर में होती थी । घर में कैलेंडरों पर उन्ही के चित्र होते । यह बात बहुत कम लोगों को ज्ञात होगी कि हमारे अधिकांश देवी देवताओं के प्रोफाइल फोटो इन्हीं चित्रकारों द्वारा बनाये हुए हैं ৷
माँ आर्यसमाजी परिवार से थी इसलिए देवी देवताओं के बारे में उन्हें उतनी जानकारी नहीं थी लेकिन उन्हें कई पुराण कथाएँ याद थीं ৷ एक ओर धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपने वाले, कृष्ण चंदर, राजेंद्र सिंह बेदी, इस्मत चुगताई, ख्वाजा अहमद अब्बास, रमेश उपाध्याय , ममता कालिया जैसे लेखकों की कहानियाँ थीं दूसरी ओर माँ बाबूजी और घर के अन्य लोगों द्वारा बताई पुराणों की कहानियाँ ৷ मेरा साहित्यिक विकास ठीक ठाक ही हो रहा था ৷
स्कूल में पहले ही दिन शिवहरे गुरूजी ने बताया था कि सरस्वती विद्या की देवी है और सरस्वती की पूजा करने से विद्या आती है । मेरे अवचेतन में यह संस्कार इस तरह स्थापित हुआ कि मैं नियम से सरस्वती की तस्वीर के सामने हाथ जोड़ने लगा घर में भी और स्कूल में भी । दो क्लास एक साथ पास कर लेने और हर साल पहला नंबर आने पर यह विश्वास और दृढ़ हुआ।
उन दिनों हमारे स्कूल में हर शुक्रवार को सरस्वती पूजन होता था । सब छात्रों से दस-दस पैसे इकठ्ठे किये जाते । उन पैसों से चिरौंजी दाने, फूल, अगरबत्ती व अन्य आवश्यक वस्तुएँ मंगाई जातीं ৷ शुक्रवार को अंतिम पीरियड सरस्वती पूजन हेतु तय होता । फ्रेम में मढ़ी हुई सरस्वती की तस्वीर क्लास की दीवार से हर शुक्रवार टेबल पर उतर आती और फिर पूजा के उपरांत सप्ताह भर के लिए दीवार पर टंग जाती ৷
‘या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वस्त्रा वृता’ गाते हुए, हाथ जोड़े खड़ी लडकियाँ, सरस्वती की मूरत से कम नहीं लगती थीं ৷ लड़के सिर्फ अपने होठ हिलाते और सरस्वती वंदना करती लड़कियों को देखा करते थे । इस सरस्वती पूजा में मुस्लिम छात्र अकसर शामिल नहीं होते थे । एक बार मैंने नईम से पूछा “तुम पूजा में शामिल नहीं होते ?” उसने कहा कि “हमारे धर्म में बुतपरस्ती यानि मूर्तिपूजा की मनाही है৷ “ मैंने कहा “ लेकिन सरस्वती बुत कहाँ है वह तो विद्या की देवी है ?” नईम मुस्कराता रहा ৷ बाद में वह उस समय क्लास में उपस्थित रहने लगा लेकिन फिर भी वह प्रसाद नहीं खाता था ৷ अच्छा ही था, उसके हिस्से का प्रसाद मैं खा लेता था ৷
उस समय धर्मनिरपेक्षता का माहौल था । इसलिये जहाँ हर शुक्रवार को सरस्वती पूजा होती थी वहीं सभी मुस्लिम छात्रों व शिक्षकों को जुम्मे की नमाज़ अदा करने के लिये दोपहर में छुट्टी मिल जाया करती थी । इसी तरह सावन के महीने में सावन सोमवार के दिन भी जल्दी छुट्टी हो जाया करती थी । नईम के भी क्लास में बहुत अच्छे नंबर आते थे ৷ एक दिन मैंने उससे पूछा “ तुम्हारे मज़हब में भी सरस्वती जैसी कोई देवी है क्या जिसके कारण तुम्हे अच्छे नंबर मिलते हैं ?” उसने कहा “नहीं, हमारे यहाँ सिर्फ एक ही अल्लाह है, सबके काम वही करता है ৷”
बाबूजी ने मुझे बताया था कि हमारे धर्म में हर काम के लिए अलग अलग देवी देवता हैं ৷ मैंने सोचा यह कैसा धर्म है जहाँ एक अकेले अल्ला को ही सबके रोल अदा करने पड़ते हैं । कितना वर्क लोड बढ़ जाता होगा ना ৷ फिर मैंने पूछा “तो यह अल्लाह कैसा होता है इसकी कोई फोटो नहीं है?” उसने कहा “नहीं हमारे यहाँ किसी की कोई फोटो नहीं होती ।“ मैंने यही सवाल बाबूजी से किया तो उन्होंने कहा ‘ईश्वर की भी कोई तस्वीर होती है क्या ? “ मैंने कहा “लेकिन वह तो अल्ला है ?” बाबूजी ने मुस्कुराते हुए कहा “तुमने गाँधीजी का भजन नहीं सुना “ ईश्वर अल्ला तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान ৷“
बाबूजी की यह बात सुनकर मैं अच्छी तरह समझ गया कि जिनकी ढेर सारी तस्वीरें होती हैं या जिनकी बहुत से लोग पूजा करते हैं या जो बहुत लोकप्रिय होते हैं वे भगवान नहीं होते । धीरे धीरे यह मति भी आई कि सरस्वती की पूजा करने से परीक्षा में अच्छे नंबर नहीं मिलते न ही विद्या आती है । फिर कुछ बड़े होने के बाद जब ‘सन्मति’ आई और मैंने लिखना प्रारंभ किया तो यह बात भी समझ में आ गई कि सरस्वती की पूजा मात्र करने से कोई लेखक नहीं बनता ।
हमारे मध्यवर्गीय भारतीय समाज में हर माता पिता को एक ख़ब्त रहती है कि वे बच्चों को उनके बचपन से कम्पीटीशन करना सिखा देते हैं , “तुम्हें नंबर वन पर रहना है ৷” अरे, जब सब नंबर वन पर रहना चाहेंगे तो नंबर टू ,नंबर थ्री पर कौन रहेगा ? मुझे यह बात कभी समझ में नहीं आई कि बच्चों को प्रतियोगिता की दौड़ में शामिल करवाने से बेहतर वे बच्चों को अच्छा इंसान बनना क्यों नहीं सिखाते ৷
बचपन में मैं भी इस दौड़ का शिकार हुआ था, न केवल पढ़ने की बल्कि स्कूल में होने वाली ड्रामा,गीत भाषण प्रतियोगिता आदि की दौड़ में भी ৷ मेरी कम्पीटीशन अर्चना से होती थी, कभी वह प्रथम आती कभी मैं । तीसरे नंबर का हमें ख़याल भी नहीं आता ৷ कभी कभी बाबूजी मुझे भाषण के लिए नोट्स लिख कर दे देते थे ৷ वैसे तो मैं भाषण लिखकर रट लिया करता था,लेकिन फिर ऐसा होता कि समय पर रटा हुआ याद नहीं आता तो मन से बोलने लगता था ৷ पुरस्कार के रूप में हमें पेन पेंसिल आदि दी जाती थी ।
खेलकूद में मेरी शुरू से ही कोई दिलचस्पी नहीं थी । स्कूल लाइफ में मुझे कभी कोई गेम्स का सर्टिफिकेट नहीं मिला । खेलकूद के नाम पर शरद भोयर और मित्रों के साथ कुछ दिन जोगीतालाव के मैदान पर क्रिकेट भर खेला था । बड़े होने के बाद एक बार शहर के कुछ क्रिकेट प्रेमियों के साथ मनरो स्कूल के ग्राउंड पर एक दिन क्रिकेट खेलने गया था लेकिन दिन भर फील्डिंग करने के बाद जब बैटिंग की अपनी पारी में मैं पहली ही बाल पर आउट हो गया तो मैंने क्रिकेट से तौबा कर ली । उस दिन के बाद से फिर मैंने कभी क्रिकेट नहीं खेला । बाद में रीजनल कॉलेज भोपाल में मैंने टेबल टेनिस ज़रूर सीखा था और कुछ समय तक खेलता भी रहा ।
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