उन दिनों रानी लक्ष्मीबाई, भगतसिंह ,सुभाषचंद्र बोस,जवाहर लाल नेहरु के अलावा महात्मा गांधी की भी हम बच्चों के बचपन में आवाजाही थी ৷ यह सब लोग अक्सर पाठ्य पुस्तकों से बाहर निकलकर हम लोगों से बतियाया करते थे ৷ एक दिन गांधीजी किताब से बाहर आए और मुझसे कहा “ तुम्हे पता है इस साल हमारी जन्मशताब्दी मनाई जा रही है ৷” मैंने कहा “ अच्छा,इसका मतलब आपको पैदा हुए सौ साल हो गए ৷”बापू कुछ नहीं बोले, बस मुस्कुराते रहे ৷
अगले दिन गाँधी विद्यालय के हमारे हिन्दी के शिक्षक श्री प्यारेलाल फुलसुंगे ने बताया “हाँ, यह सही है इस साल हम लोग गांधीजी की जन्मशताब्दी मनाएंगे और इस अवसर पर स्कूल में बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किये जायेंगे ৷” फुलसुंगे सर ऐसे कामों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे ৷ उन्होंने हम बच्चों को लेकर तुरंत एक नाटक तैयार किया ৷नाटक का नाम था ‘बापू ने कहा था’। इस नाटक में अनाथालय में रहने वाले बच्चों की एक कहानी थी ।
स्कूल की छुट्टी होने के बाद प्रति दिन शाम को सर हमें स्कूल में ही रोक लेते और एक कमरे में नाटक की रिहर्सल करवाते ৷ इस नाटक में अर्चना का भाई विनय एक ऐसे अनाथ मुस्लिम बच्चे का रोल कर रहा था जिसके माँ बाप दंगे में मारे जा चुके हैं और वह दंगाइयों से बचता हुआ अनाथालय तक आया है । मैं इस नाटक में अनाथालय का एक हिन्दू बालक बना था ৷ मेरी अनाथ बहन का रोल मेरी क्लासमेट इशरत सुल्ताना की छोटी बहन शबाना कर रही थी ৷ नाटक में उस मुस्लिम बालक के अनाथालय पहुँचते ही अपनी दुखद गाथा सुनाते हुए रोने का एक दृश्य था ৷
सर जब भी रिहर्सल करवाते विनय उस दृश्य में रोने की बजाय हँसने लगता था । उसे हँसता देखकर हम सभी को हँसी आ जाती ৷ सर जितना डाँटते उतना ही वह ज़्यादा हँसता ৷ सर को डर था कि कहीं नाटक की प्रस्तुति में वह हँसने ना लगे वर्ना पूरे नाटक का कबाड़ा हो जायेगा । अंतत: सर ने उससे कहा कि बेहतर होगा वह इस दृश्य में चुप ही रहे, ना हँसे ना रोये । लेकिन प्रस्तुति के समय कमाल हो गया, वह उस दृश्य में इस कदर फूट फूट कर रोया कि तमाम दर्शकों की आँखें भीग गई । मैं उसे समझा रहा था और उसका रोना था कि बंद ही नहीं हो रहा था ৷
गाँधी जी की जन्मशताब्दी के अंतर्गत स्कूल में विभिन्न प्रतियोगिताओं के अलावा बच्चों के लिये ‘गान्धी जीवन दीपिका’ नामक एक परीक्षा भी आयोजित की गई थी जिसे पास करने पर एक प्रमाणपत्र भी हम लोगों को मिला था । इसी साल मैंने गांधी जी की किताब ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़ी और उनके रोजनामचा लेखन से प्रभावित होकर डायरी लिखना प्रारंभ किया ৷ मेरा यह डायरी लेखन बरसों चलता रहा ৷
जैसे कि हर बच्चे के जीवन में उसकी प्रतिभा निखारने में किसी न किसी शिक्षक का योगदान होता है मेरे जीवन में वह स्थान प्यारेलाल फुलसुंगे सर का है ৷ वे मुझे बहुत चाहते थे और सदा मुझे प्रोत्साहित किया करते थे । कक्षा में वे मेरे लिखे निबन्धों की बहुत प्रशंसा किया करते थे । मैं उनके पूछे गये तमाम सवालों के सही सही जवाब दे देता था । एक बार बोर्ड पर उन्होंने तीन शब्द लिखे ‘ गया गया गया ‘ सभी छात्रों से उन्होंने इसका अर्थ पूछा । उस दिन मैं कक्षा में कुछ देर से आया था । जैसे ही मैंने प्रवेश किया उन्होंने डाँटने की मुद्रा अख्तियार कर ली । फिर कहा कि अगर इस वाक्य का अर्थ बता दोगे तो मैं कुछ नहीं कहूँगा । मैंने थोड़ा सा दिमाग पर ज़ोर लगाया और कहा “ गया नामका लड़का गया नामक शहर में गया ।‘ वे प्रसन्न हो गये और देरी से आने की सज़ा माफ हो गई ৷
एक दिन प्यारेलाल फुलसुंगे सर ने हम सभी को होम वर्क के अंतर्गत ‘चांदनी रात में नौका विहार’ इस शीर्षक से निबंध लिखने के लिए दिया ৷ अगले दिन कक्षा में प्रवेश करते ही उन्होंने प्रश्न किया ..” हाँ भई , निबन्ध कौन कौन लिखकर लाया है ? आधे से अधिक बच्चों ने अपने हाथ खड़े कर दिये । “ शाब्बास । ठीक है , अब अपने अपने निबन्ध से एक एक अंश पढ़कर सुनाओ “ सर ने कहा । एक लाइन से छात्र छात्राओं ने पढ़ना प्रारम्भ किया ৷
तीसरी लाइन की शुरुआत मुझसे हुई । मैंने पढ़ना प्रारम्भ किया .. “ चांदनी रात में नौका विहार .. नर्मदा के प्रवाह मे माँ की गोद में खेल रहे बच्चे की तरह हमारी नाव तैर रही थी । संगमर्मर की दूधिया चट्टानों पर चांदनी कुछ इस तरह छा रही थी जैसे कोई सेना रात में चुपचाप शत्रु के शिविर पर आक्रमण के लिये बढ़ रही हो । “ इतना कह कर मैं कुछ देर के लिये ठहरा । सर ने आगे पढ़ने का इशारा किया । मैंने फिर पढ़ना प्रारम्भ किया और निबन्ध समाप्त करके ही रुका । सर ने पूछा “ तुमने सचमुच भेड़ाघाट में चांदनी रात में नौका विहार किया है ? “ मैंने कहा “ नहीं सर, मैं तो आज तक नाव में भी नहीं बैठा हूँ । “ मतलब तुमने यह पूरा निबन्ध कल्पना से लिखा है ? “ सर ने पूछा । “ जी सर “ मैंने कहा । वे मेरे पास आये और मेरी पीठ ठोकते हुए कहा ..” तुम ज़रूर बड़े होकर लेखक बनोगे ।
आज जो यह घटना मैं लिख रहा हूँ वह कल्पना नहीं है यथार्थ है ৷ जीवन ऐसे ही यथार्थ का प्रतिबिम्ब होता है जो अपने अंतिम यथार्थ तक घटित होता रहता है ৷
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