10 जून 2026

101 मुझे झाँसी की रानी से इश्क़ हो गया था




इश्क़ की दास्तान सुनने से पहले आपको उस जगह के बारे में बताना चाहूँगा जहाँ मुझे इश्क़ हुआ था ৷ यह जगह है घर के पास रिंग रोड के किनारे स्थित खामतालाव ৷ बचपन में यह तालाब मेरे लिए दुनिया की किसी भी झील से बहुत बड़ा था ৷ इस तालाब के जीवन में घटित जाने कितने दृश्य लैंडस्केप बनकर आज भी मेरे अवचेतन में टंगे हैं ৷ 


इन दृश्यों में सबसे सुन्दर दृश्य नवदुर्गा के अंतिम दिन घटित होता था जब गाजे बाजे के साथ, सर पर कलश और उसमे जलता हुआ दीपक रखकर एक जुलूस की शक्ल में घटविसर्जन हेतु महिलाएँ यहाँ पहुँचती थीं ৷  जलते हुए दीपक को हवाओं से बचाने के लिए उन के सर पर छाता ताने हुए घर के पुरुष साथ चलते थे जो अमूमन उनके पति होते थे । दुनिया को उन पुरुषों की आँखों में इस बात की चिंता दिखाई देती थी कि कहीं जलता हुआ  दीपक बुझ न जाए लेकिन मैं उनकी आँखों में प्रेम देखता था ৷  


ऐसा ही दृश्य हरतालिका के समय होता था बाँस के एक पड्डे पर गेहूं की सुनहली बालियों के बीच, दीपक के प्रकाश से दैदीप्यमान, रेत से बने शिवलिंग इस तालाब में सिराये जाते ৷ राखी के दूसरे दिन यानि भुजलिया के दिन बांस की टोकरियों में उगी भुजलिया भी इसी घाट पर ठंडी की जाती थी । विवाह उत्सवों के मंडप से निकलकर अक्सर महिलाएँ यहाँ आतीं और  इसी तालाब के किनारे की माटी मांगर माटी हेतु ले जातीं ৷


महाशिवरात्रि पर यहाँ स्थित शिव मंदिर के परिसर का मानो दृश्य ही बदल जाता था ৷ प्रति रविवार या बुधवार को बड़े बाज़ार में लगने वाला बाज़ार महाशिवरात्रि  के पहले वाले रविवार या बुधवार को खामतलाव परिसर में शिफ्ट कर दिया जाता था । उस दिन बाबूजी इस बाज़ार से सब्ज़ियों के अलावा शकरकन्द भी खरीद कर लाते थे । हमारे यहाँ शिवरात्रि के व्रत के दिन उबले हुए मीठे शकरकंद दूध के साथ खाए जाते थे ৷


शिवमन्दिर की बाएँ तरफ़ थोड़ा पीछे की और एक जीर्ण शीर्ण सा एक पुराना मन्दिर और था उसे लक्ष्मी नारायण मंदिर कहते थे यद्यपि उस मन्दिर में कम लोग ही जाया करते थे । उस मंदिर का फर्श कच्चा था ৷ उस मन्दिर के पुजारी और उनके परिवार के लोग ही उस मन्दिर की देखभाल करते थे । बचपन में मुझे यह बात समझ में नहीं आती थी कि जब दोनों ही देवस्थल हैं तो एक को इतने उपेक्षित ढंग से क्यों रखा गया है । यह बात बड़े होकर समझ में आई कि भक्ति के लिए लोग अपने अपने देवता चुन लेते हैं इसी वज़ह से हमारे यहाँ शैव,वैष्णव और शाक्त जैसी भक्ति परम्पराओं ने जन्म लिया ৷ वैसे अब उस मंदिर का जीर्णोद्धार हो चुका  है और हमारे यहाँ भक्त और भगवान का अर्थ भी बदल चुका  है ৷

 

उस मन्दिर के  ठीक बगल में खात जाने वाले रास्ते पर एक अखाड़ा भी था जहाँ स्थानीय पहलवान कुश्ती खेला करते थे । कुश्ती खेलने वालों के लिये उस अखाड़े में एक चौकोर गढ्ढा था जिसमें  लाल रंग की महीन बालू भरी हुई थी । बाहर की ओर मुगदर आदि रखे थे । भंडारा के पहलवान नियमित रूप से वहाँ जाते थे और कुश्ती का अभ्यास किया करते थे । कभी कभी मैं वहाँ जाकर उकडूं बैठ जाता और कुश्तियां देखा करता৷ दगड़ू पहलवान से लेकर दारासिंह और गामा पहलवान जैसे नामों से मेरा परिचय वहीं हुआ ৷ 


जैसे जैसे परिसर में देवताओं का आगमन हो रहा था मंदिरों की संख्या बढ़ती जा रही थी ৷ शिवजी ,लक्ष्मी नारायण और बजरंग बली के बाद अब रामजी का नंबर था ৷ बचपन में उस राममंदिर को बनते हुए देखना मेरे लिए एक सुखद अनुभव था कैसे नींव खुदी फिर दीवारें खड़ी हुईं संगमरमर के फर्श से सुसज्जित एक सुन्दर सभागार बना और एक दिन गर्भगृह में राम, सीता व लक्ष्मण की छोटी छोटी सुन्दर सलोनी मूर्तियाँ स्थापित हो गईं ৷ कोई शोर शराबा नहीं, कोई बड़ा उत्सव नहीं बस थोड़ा सा भजन कीर्तन हुआ और रामजी देवताओं में शामिल हो गए ৷ 


लेकिन मेरे लिए न शिव आकर्षण का केंद्र थे न सीता राम ৷ मैं जैसे ही इस परिसर में प्रवेश करता राम मंदिर के ठीक पहले एक रेलिंग के भीतर रानी लक्ष्मीबाई की एक प्रतिमा पर मेरी नज़र अटक जाती ৷ इस प्रतिमा में झाँसी की रानी तलवार और ढाल लेकर खड़ी हैं । 


मैं घाट की ओर जाते या लौटते हुए अक्सर इसकी रेलिंग पर कुहनी टिकाकर झाँसी की रानी के चेहरे  की ओर टकटकी लगाकर देखा करता । झाँसी की रानी की सूरत मुझे बहुत अच्छी लगती थी ৷ जाने कितनी देर मैं उस चेहरे को देखता लेकिन मेरा मन ही नहीं भरता था ৷ झाँसी की रानी और अठारह सौ सत्तावन के स्वतंत्रता संग्राम के विषय में हमें  स्कूल में बताया गया था । कुछ बातें बाबूजी से भी सुनी थीं ৷ माँ तो खैर झाँसी की ही थी ৷ मैं इस प्रतिमा का बहुत आदर करता था और यह सोचता था कि शिव और राम की प्रतिमा तो मन्दिर के भीतर है लेकिन लक्ष्मीबाई की प्रतिमा खुले में क्यों है, इनके लिये कोई मन्दिर क्यों नहीं बना है ।     


अभी कुछ बरस पहले ऐसे ही एक दिन मेरी एक मित्र ने मुझसे कहा “तुम्हें पता है, मैं अपने बचपन से ही किसी से प्रेम करती हूँ ৷” मैंने चौंककर पूछा “अरे ! कौन है वो ?” तो उसने मुस्कुराते हुए कहा “भगतसिंह ৷” मैंने एक लम्बी साँस ली और उससे कहा “मुझे भी बचपन में  ही किसी से इश्क हो गया था “ अरे ! किससे ?” अबकी बार उसने चौंककर पूछा ৷ मैंने मुस्कुराते हुए कहा “झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई से ৷” फिर हम दोनों जोर से हँस पड़े ৷ इस तरह मैं बचपन में ही इश्क़े बुतां में गरिफ्तार हो गया था ৷ हमारा यह इंसानी इश्क़ तो उसके आगे कुछ भी नहीं था ৷ 


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