नदियों को समंदर की प्रेमिका कहा जाता है इसलिए कि वे अंत में सागर से जाकर मिलती हैं ৷ मुझे नदियाँ हमेशा उस कामकाजी स्त्री की तरह लगती हैं जो इस बृहत संसार को चलाने में अपना योगदान देती हैं साथ ही अपना परिवार भी पालती हैं ৷ सहायक नदियाँ उनकी बड़ी बहनें और जिन नदियों में वे जा मिलती हैं उनकी बड़ी बहनों की तरह होती हैं ৷ झीलें और तालाब उनके बच्चों की तरह होते हैं जो एक दिन अपने पाँवों पर खड़े होना सीख जाते हैं ৷ बस उनकी तरह बहना नहीं सीख पाते ৷
जो शहर नदियों के किनारे बसे होते हैं वे उस आदिम संस्कृति के वाहक होते हैं जब इंसान ने पानी की कीमत जानकर उससे दोस्ती की थी, उनके किनारों पर बस्तियाँ बसाई थीं इसलिए कि जल के बिना जीवन संभव नहीं था ৷ इसीलिए नदियों को जीवन दायिनी कहा जाता है ৷ नदियाँ केवल ज़मीन पर ही नहीं बहती हैं वे इंसान की रगों में खून बनकर बहती हैं ৷
भंडारा शहर को यह वरदान मिला था कि वह वैनगंगा के किनारे बसा था और तालाबों की वहाँ कोई कमी नहीं थी ৷ वैनगंगा भंडारा की जीवनदायिनी नदी है । भंडारा शहर में जल की आपूर्ति इसी नदी से होती है । बचपन में बाबूजी के साथ अक्सर हम लोग इस नदी में नहाने जाया करते थे । बारिश के अलावा अन्य मौसम में नदी का तट रेतीला रहता था और वहाँ पानी बहुत कम होता था ।
पुल के निकट ही शिवमन्दिर की बगल से जहाँ एक छोटा सा घाट था , नीचे नदी में उतरने का रास्ता था । वहाँ से उतरकर हम लोग कुछ देर रेत में चलते थे फिर नदी की धार मिल जाया करती थी । हम लोग पानी में डुबकी लगाते फिर कुछ देर रेत में आकर धूप सेंकते, फिर जाकर पानी में डुबकी लगाते, इस तरह हम लोगों का नहाने का खेल चलता रहता था । पानी तैरना सीखने का ख्याल भी कभी मुझे वहाँ नहीं आया
एक दिन प्यारेलाल सर से मैंने पूछा “ सर वैनगंगा का नाम वैनगंगा कैसे पड़ा ?” उन्होंने कहा “ इसका वास्तविक इतिहास तो पता नहीं लेकिन एक किस्सा इसके पीछे है ৷ अंग्रेज लोग जब हिन्दुस्तान आये तो वे यहाँ की हर नदी को ‘गंगा’ ही कहते थे ৷ गंगा शब्द का उच्चारण उनसे नहीं बनता तो ‘गैन्जेस’ कहते थे ৷ एक बार कोई अंग्रेज़ इस नदी के किनारे से जा रहा था तो उसने देखा कि कुछ लोग इसके जल में अपने अपने दीपक सिरा रहे हैं ৷ उसने अपने हिन्दुस्तानी ड्राइवर से पूछा यह लोग क्या कर रहे हैं ?”
“ड्राईवर ने सोचा अब इस विदेशी को अपनी भारतीय संस्कृति के बारे में क्या समझाएँ इसकी समझ में आने से तो रहा इसलिए उसने कहा ‘पूजा कर रहे हैं साहब ৷” अंग्रेज ने कंधे उचकाए “व्हाट?” तो उसने मन ही मन उसे कोसते हुए कहा “कुछ नहीं साहब दारू उतार रहे हैं৷” उसने फिर पूछा “दारू व्हाट ?” ड्राईवर ने कहा “दारु यानि शराब৷” अब अंग्रेज़ साहब के दिमाग की बत्ती जली “ओ ... वाइन, वाइन इन गैन्जेस৷” बस यही ‘वाइन इन गैन्जेस’ आगे चलकर ‘वैनगंगा’ हो गया ৷
प्यारेलाल सर की बात मुझे कुछ हज़म नहीं हुई लेकिन मैंने सोचा इस देश में अंग्रेज़ों द्वारा दिए अनेक शब्दों के अपभ्रंश चलते हैं जैसे ‘लॉन्ग क्लॉथ’ ‘लंकलाट’ हो जाता है, इसलिए संभव है ऐसा हुआ हो ৷ आगे जाकर कहीं पढ़ा कि अंग्रेज़ लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने जब अठारह सौ चौरानबे में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘जंगल बुक’ लिखी थी उसमे वैनगंगा का ज़िक्र हुआ था ৷ कुछ लोग तो कहते हैं कि मोगली का जन्म ही सिवनी जिले में वैनगंगा के किनारे बसे जंगलों में ही हुआ था ৷
जन्म की बात आई तो वैनगंगा का उद्गम याद आया ৷ वैनगंगा मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के महादेव हिल्स जो कि विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी का दक्षिणी हिस्सा है वहां से निकली है और मध्यप्रदेश महाराष्ट्र होते हुए पांच सौ उनासी किलोमीटर की यात्रा तय कर तेलंगाना के कालेश्वरम में गोदावरी में जा मिली है ৷ समन्दर की प्रेमिका तो यह वैसे भी नहीं हो सकी ৷
बचपन में देश के हिंदी मीडियम वाले अनेक बच्चों की तरह हम भंडारा के बच्चे ‘मेरी प्रिय नदी’ शीर्षक से वैनगंगा पर ही निबंध लिखते थे ৷ उसमे लिखते थे कि वैनगंगा नदी के किनारे भंडारा, बालाघाट , गडचिरोली, सिवनी, जैसे बड़े शहर पवनी, देसाईगंज, ब्रह्मपुरी जैसे छोटे शहर बसे हैं ৷ और नदियाँ तो जाने कितनी इसमें मिली हैं कन्हान नदी, वर्धा नदी, सूर नदी, बावन थड़ी नदी, चन्दन नदी, हिर्री नदी, काथनी नदी आदि आदि ৷
बचपन में मैं जब भी नदी के उद्गम के बारे में सोचता तो उद्गम स्थल की कल्पना समुद्र की तरह करता था ৷ मैं सोचता जब समुद्र जितना पानी उस जगह पर होगा तभी तो उसमे से इतना बहकर नदी में आयेगा ৷ जब लोगों ने बताया कि नदी का उद्गम तो किसी छोटे मोटे गढ़े या झरने से होता है तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ ,ऐसा कैसे हो सकता है ৷
लेकिन फिर सोचा कि नदी भी तो इंसान की तरह ही होती है ৷ इंसान भी तो न दिखाई देने वाली एक बूँद से पैदा होता है और फिर हवा पानी अन्न जल लेकर बढ़ता है ৷ नदी भी इसी तरह एक कतरे से जन्म लेकर धरती से, जंगलों से, पेड़ों से, बादलों से, पानी लेते हुए बड़ी होती चली जाती है ৷ कभी इतनी बढ़ती है कि बाढ़ आ जाती है, कभी सूख जाती है ৷ बाढ़ आती है तो बच्चे खुश होकर पिकनिक के मूड में उसे देखने जाते हैं लेकिन जब सूखती है तो उसे कोई देखने नहीं जाता ৷
नदी ऐसा नहीं करती, वह अपनी अंतिम बूँद तक इंसान को जल देती है, इंसान उसके किनारे बड़े बड़े जल संयंत्र लगाता है जो उसके गर्भ से भी जल खींचते रहते हैं ৷ वह आखिरी तक इंसान की प्यास बुझाती है लेकिन इंसान उसकी प्यास की चिंता नहीं करता , उसके जंगल छीन लेता है , बदल छीन लेता है उसके किनारे वातावरण दूषित करने वाले कारखाने लगाकर वाहन बसे आदिम लोगों से उनका जीवन छीन लेता है ৷
लो जी .. फिर शुरू हो गया नदी पर निबंध , लेकिन यह बचपन वाले निबंध से अलग है ना ?
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