आदिम मनुष्य की जीवनचर्या में सुख और दुख अलग अलग रूपों में शामिल हुए ৷ जैसे वह अपने सुखों का श्रेय किसी परम सत्ता को देता रहा उसी तरह वह अपने दुख एवं कष्टों के निवारण हेतु सदैव अज्ञात शक्तियों का सहारा लेता रहा ৷ उन शक्तियों के स्वयं के अनुरूप दिखाई देने की अपनी सामान्य चाहत के अंतर्गत उसने उन शक्तियों को साकार रूप में भी देखना चाहा ৷ उसकी इसी इच्छा ने उन शक्तियों को कथाओं एवं चित्रों के माध्यम समाज में स्थापित किया ৷
जैसे जैसे मनुष्य सभ्य होता गया विभिन्न वैश्विक सभ्यताओं में कलारूप में यह कथाएँ जन्म लेती रहीं जिनमे देशकाल के अनुरूप पात्रों की स्थापना हुई ৷ जैसे यूनान में यह देवता ओलिम्पिस पर्वत पर स्थापित हुए तो हमारे यहाँ कैलाश पर्वत पर, कहीं वे समद्र के अधिष्ठाता थे तो कहीं पाताल के ৷ कथाओं में उन्हें विविध रूप रंग, स्वभाव, आयुध वाहन, शक्तियाँ आदि प्रदान की गईं ৷
इस तरह की कथाओं में हमारे यहाँ जो कथा सर्वाधिक लोकप्रिय रही वह थी राम कथा ৷ उत्तर भारत में रामकथा किसी न किसी रूप में सदियों से चली आई है ৷ यह कभी वाल्मीकि के माध्यम से आई तो कभी भवभूति के माध्यम से, कभी वह दशरथ जातक में घटित हुई तो कभी तुलसीदास के मानस में उतरी ৷
उन दिनों जब पढ़ना लिखना केवल उच्च वर्ग एवं समर्थ लोगों के बस की बात थी स्वाभाविक था आस्थावान समाज अपनी प्राकृतिक सहज इच्छा के अंतर्गत रामायण के अपने प्रिय पात्रों को साकार रूप में देखना चाहता था ৷ फलस्वरूप उसने इन पात्रों को मनुष्यों के अभिनय के माध्यम से अभिव्यक्त किया और इस तरह रामलीला नामक इस सांस्कृतिक संस्था का जन्म हुआ ৷
यह रामानंद सागर द्वारा रामकथा को टी वी पर प्रस्तुत किये जाने से भी काफी पहले की बात है ৷ कहा जाता है कि रामलीला का प्रारंभ सोलहवीं शताब्दी से हुआ जब काशी नरेश ने तुलसी कृत रामचरित मानस के पूर्ण होने पर संकल्प लेकर आम नागरिकों हेतु इसके मंचन की व्यवस्था की ৷ इस अवसर पर तुलसी के शिष्यों द्वारा वाराणसी में इसे प्रस्तुत किया गया ৷
उसके बाद अगली शताब्दियों में रामलीला का विस्तार हुआ, उत्तर प्रदेश में अनेक रामलीला मंडलियों का गठन हुआ और विभिन्न नगरों में इसका प्रदर्शन प्रारंभ हुआ ৷ कालांतर में इन मंडलियों का भारत के विभिन्न क्षेत्रों के विभिन्न नगरों एवं गाँवों में जाना प्रारंभ हुआ ৷
सामान्यतः नवरात्र के प्रारंभ से रामलीला का प्रारंभ होता और दशहरे के दिन या उसके एक दो दिन बाद रावण वध के साथ इसका समापन होता है ৷ कहीं कहीं तो यह रामलीला एक एक माह भी चलती है जैसे वाराणसी के रामनगर में इसका मंचन एक माह तक होता है ৷ केवल भारत ही नहीं अपितु फ़िजी, मॉरीशस, थाईलैंड जैसे देशों में भी किंचित फेरबदल के साथ रामकथा का मंचन होता है ৷
भंडारा में भी उन दिनों दशहरे से पहले उत्तर प्रदेश से अनेक रामायण मंडलियाँ आती थीं ৷ अलग अलग मोहल्लों में इनके मंचन के अलावा इनके ठहरने भोजन इत्यादि की व्यवस्था भी की जाती ৷ वापस जाते हुए यह मंडलियाँ यथेष्ट धनराशि भी अपने साथ ले जातीं थीं ৷ इन मंडलियों में काम करने वाले पात्र अपने सामान्य जीवन में विभिन्न पेशों में होते थे लेकिन रामलीला के एक माह में वे मन प्राण से इस कार्य में जुट जाते थे ৷ स्वाभाविक है यह भी उनकी कमाई का एक साधन था ৷
मोहल्ले के धनाढ्य या संपन्न लोगों द्वारा रामलीला मंडलियों के आवास भोजन इत्यादि की व्यवस्था की जाती थी उनमे हिन्दू मुसलमान सभी तरह के लोग होते थे ৷ हर दिन उन कलाकारों की कहीं न कहीं भोजन की व्यवस्था होती थी जिसकी घोषणा मंचन के बीच में की जाती ताकि लोग प्रेरित होकर उन्हें अपने यहाँ बुला सकें कई बार तो इस बात के लिए होड़ भी होती जो लोग भोजन नहीं करवा सकते थे वे उन्हें दान दक्षिणा दे देते थे ৷ इसके अलावा मंचन के पश्चात या बीच में आरती भी घुमाई जाती ताकि उस बहाने थोड़ी सी धनराशि इकठ्ठा की जा सके ৷
बावजूद इसके इन रामलीला मंडलियों की आर्थिक स्थिति बहुत खस्ता रहती थी ৷ इनमे काम करने वाले अधिकांश लोग केश कर्तन, काष्ठ कर्म, लौह कर्म, जैसे छोटे मोटे पेशे से आते थे, या उनकी मनिहारी या पान , इत्यादि बेचने वाले छोटे मोटे दूकानदार होते थे लेकिन कला का शौक उन्हें खींच लाता और वे अपना धंधा बंद कर वहाँ आते थे ৷ उनकी श्रद्धा भावना और उनकी कला उन्हें खींच लाती थी ৷
भंडारा में हमारे घर के पास बचपन में पहली बार रामलीला मैंने शंगर्पवार के मकान की बगल में स्थित हनुमान मन्दिर में देखी । वह रामलीला मंडली उत्तर प्रदेश से आई थी । हमारा मोहल्ला निम्न और निम्न मध्यवर्गियों का मुहल्ला था इसलिये आरती में भी उनकी कुछ खास कमाई नहीं होती थी । हाँ प्रति दिन कोई न कोई श्रद्धालु उन्हे भोजन के लिये आमंत्रित अवश्य कर लेता था । वे लोग मन्दिर के परिसर में ही ठहरे थे ।
उस समय तक हल्की हल्की ठण्ड शुरू हो जाती थी ৷ हम लोग शाम के भोजन के उपरांत शाल ओढ़ कर रामलीला देखने पहुँच जाते । बिछाने के लिये बोरा या चटाई रख लेते थे । मंच के एक ओर हारमोनियम ,तबला आदि वाद्ययंत्र लेकर एक भजन मंडली बैठी रहती थी और रामचरित मानस की चौपाइयों का गान करती थी । रामलीला के पात्र मंच पर अपनी पारी पारी से आकर अभिनय करते । प्रतिदिन का आकर्षण कोई न कोई विशेष प्रसंग होता था जैसे राम वनवास, सीताहरण, भरत मिलाप, निषादराज द्वारा सरयू पर कराना, फिर राम रावण युद्ध के विभिन्न प्रसंग ৷ सीता के पात्र की भूमिका एक कम उम्र का बालक करता था जिसकी दाढ़ी मूँछें भी नहीं उगी थीं ।
रामलीला लगभग 10 बजे प्रारम्भ होती थी और बारह बजे तक चलती थी । एक दिन जब बहुत देर तक रामलीला प्रारम्भ नहीं हुई दर्शकों की प्रतीक्षा सीमा पार कर गई । हमें लगा शायद कलाकारों के मेक अप आदि के कारण यह विलम्ब हो रहा है ৷
अचानक मंच के पीछे से ऐसी आवाज़ें आने लगीं जैसे कोई लड़ रहा हो । कुछ देर में दोनो लड़ने वाले तू तू मैं मैं करते हुए दर्शक दीर्घा में आ गए । हमने देखा अरे ! यह तो हमारे हनुमान जी हैं और रामजी से कह रहे हैं “साले, तू अपने आप को समझता क्या है ..? तू हमें तनखा नहीं देगा तो हमारा गुजारा नहीं होगा क्या । “ और राम बना पात्र उसे समझा रहा था ..”अरे अभी सेठ पैसा देगा तब तो तुझे तनखा दूंगा अभी तनखा कहाँ से दूँ । करना है काम तो ठीक से कर वरना निकल जा । “
हम समझ गये कि राम का अभिनय करने वाला पात्र इस रामलीला मंडली का मैनेजर है और उसने हनुमान का अभिनय करने वाले पात्र को बहुत दिनों से पैसे नहीं दिये हैं । हनुमान जी फिर फॉर्म में आ गये थे “तोहर खातिर हम अपनी पान दुकनवा बंद करके आए हैं , का समझत हौ अपन आप को ?” लेकिन यह क्या अचानक दोनों ने हाथा पाई प्रारम्भ कर दी और गालियाँ तो इस तरह एक दूसरे को दे रहे थे जैसे चौपाइयाँ पढ़ रहे हों । हम लोगों को इसलिए मजा आ रहा था कि दोनों अपने हनुमान और राम के मेकअप में थे और हमने ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था ৷ चूँकि रामलीला प्रारम्भ होने का समय था और सभी पात्र अपनी वेषभूषा में थे इसलिये उन्हें रामलीला से अलग यह संवाद कहते देख जनता को बहुत आनन्द आ रहा था और लोग हँस हँस कर लोटपोट हो रहे थे ।
मंच से बाहर चलने वाली इस लीला में अचानक रावण का प्रवेश हुआ रावण बना वह पात्र भी अपनी वेषभूषा में था, उसने हनुमान के कन्धे पर हाथ रखा और कहा “अपन ही भाई है काहे रार करत हौ?” फिर उसने राम के कंधे पर हाथ रखा और उस एक कोने में ले गया । फिर पता नहीं उन तीनों में क्या बात हुई और वे लोग भीतर चले गए हम लोग समझ गए कि इनमे कोई समझौता हो गया है ৷
उन दिनों इसी तरह मज़ेदार प्रसंग घटित हुआ करते थे ৷ इसी तरह एक बार खामतलाव के पास स्थित राममन्दिर के प्रांगण में रामलीला हुई थी । दृश्य था कि लक्ष्मण को इन्द्रनाथ द्वारा भेजी हुई शक्ति लग जाती है और वे बेहोश हो जाते हैं । उन्हे देखने के लिये सुषेण नामक वैद्य आते हैं । सुषेण का अभिनय करने वाला पात्र रामलीला में विदूषक भी था, उसने तुरंत अपने बैग से थर्मामीटर निकाला और लक्षमण की बगल में उसे लगाया और फिर थर्मामीटर देखकर कहा कि लक्षमण को शक्ति लग गई है । जनता यह दृश्य देखकर हँसने लगी ।
अब ज़माना बदल गया है, धर्म के नाम पर लोगों की इतनी ब्रेन वाशिंग की जा चुकी है कि लोग कला,आस्था, धर्म जैसी चीज़ों को गड्ड मड्ड करने लगे हैं ৷ अब अगर ऐसा प्रसंग मंच पर घटित होता तो ऐसे धर्म के रोबोट “तुम हमारे भगवान का मजाक उड़ा रहे हो” ऐसा कहकर उन कलाकारों की ही पिटाई कर देते ৷ उन दिनों बनी हुई ‘जाने भी दो यारों’ जैसी अनेक फ़िल्में जिनमे रामायण , महाभारत इत्यादि महाकाव्यों से ऐसे प्रसंग लेकर ऐसे दृश्य रचे जाते थे शायद बैन ही कर दी जातीं ৷

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