10 जून 2026

134 बाबूजी की छेद वाली फटी बनियाइन



गाँव से शहर बनते हुए पृथ्वी के भूभागों पर उन दिनों पक्की सड़कें नहीं के बराबर थीं ৷ वैसे भी उनकी उतनी ज़रूरत नहीं थी, कारें उन पर चलती नहीं थीं और साइकिलें धूल उड़ाती नहीं थीं ৷ एक दिन स्कूल से घर लौटा तो देखा गली के मुहाने पर काले रंग की एक एम्बेसडर कार खड़ी है ৷ भंडारा जैसे शहर में इस तरह की कार कहीं खड़ी हुई मिल जाए इसका अर्थ होता था उससे कोई बड़ा आदमी आया है और कहीं आसपास ही है ৷ हम बच्चे कार के चारों ओर घूमते हुए किसी अजूबे की तरह उसे देखते और खिड़की के शीशों से नाक चिपकाकर उसके भीतर झांकने की कोशिश करते हुए भीतर की नर्म नर्म गद्दियों पर बैठे होने की कल्पना करते ৷ जबकि हमें पता होता कि हमारे जीवन में कभी कोई दिन ऐसा नहीं आएगा जब ज़मीन पर खड़े इस चलते फिरते कमरे में प्रवेश करने का अवसर हमें प्राप्त होगा ৷ 


घर पहुँचते ही एक नितांत अजनबी सज्जन को छपरी में कुर्सी पर बैठे पाया “ये शरद है ৷” जैसे ही बाबूजी ने कहा मैंने हाथ जोड़कर उन्हें नमस्ते किया ৷ उन दिनों हमारी उम्र के बच्चों को “बेटे अंकल को नमस्ते करो ৷” ऐसा कहने की आवश्यकता नहीं होती थी, जो भी घर में आया है उसे नमस्ते करना ही है यह तय था ৷ वे जवाब दें न दें उनकी मर्ज़ी ৷ मुझे याद है उन सज्जन ने मेरी नमस्ते का कोई जवाब नहीं दिया था ৷ चाय की खाली कप बशी देखकर मैं समझ गया कि उनकी चाय वाय हो चुकी है ৷ उनके छोड़े हुए बिस्कुट नमकीन के जूठन पर मेरी नज़र थी, उनके जाने के बाद जिस पर मैं दावा करने वाला था ৷ 


“अरे वो सिन्हा कहाँ है आजकल ? पॉलिटेक्निक से निकलने के बाद सुनते हैं यही कहीं नौकरी लगी थी उसकी ৷” इतना संवाद काफी था यह जानने के लिए कि  उक्त सज्जन बाबूजी के साथ पॉलिटेक्निक कॉलेज में इंजीनियरिंग पढ़ते थे ৷ उस काली एम्बेसडर से उनका रिश्ता जोड़ते हुए मैं जान गया कि आजकल वे कहीं किसी बड़े पद पर हैं ৷


बाबूजी के बारे में हम लोग जानते थे कि कॉलेज से निकलने के बाद उन्होंने छह माह तक बैतूल में ओवरसीयर की नौकरी की थी तत्पश्चात भ्रष्ट व्यवस्था का विरोध करते हुए त्यागपत्र दे दिया था ৷ उन दिनों शिक्षक की नौकरी ही सबसे ईमानदारी की नौकरी थी इसलिए वही नौकरी फिर उन्होंने कर ली ৷ फिर नौकरी करते हुए ही ग्रेजुएशन,पोस्ट ग्रेजुएशन, बी टी , साहित्य रत्न और अंत में एम एड किया ৷ उनके पॉलिटेक्निक का डिप्लोमा उनके लिए एक कागज़ का टुकड़ा मात्र रह गया था लेकिन इसका उन्हें कोई दुख न था ৷   


“अच्छा जगमोहन मैं चलता हूँ ৷” इतना कहकर वे सज्जन उठे और खड़े हो गए ৷ छपरी की दीवारों और उन पर टंगी फ्रेम की हुई तस्वीरों और दीवार पर लटके कैलेंडरों से होती उनकी नज़र बांस की छत पर अटक गई “क्या यार इस रद्दी से किराये के मकान में रहते हो, फटीचर सी मास्टर की नौकरी .. इतनी अच्छी पी डब्ल्यू डी में नौकरी मिली थी ..अगर तुमने नौकरी न छोड़ी होती तो आज तुम्हारे पास भी मेरी तरह शानदार बंगला और गाड़ी होती ৷”  


मैंने महसूस किया बाबूजी थोडा असहज हो गए थे ৷ उन सज्जन का बोलना अभी थमा नहीं था ৷ बाहर निकलते हुए अब वे आंगन में खड़ी पुरानी साइकिल की ओर देख रहे थे  ৷ “क्या है भाई, पुरानी खटारा रेले साइकिल पर घूमते  हो, देखो  मैंने अभी नई एम्बेसडर खरीदी है, चलो दिखाता हूँ ৷ अभी उधर बड़ा बंगला भी बनाया है ৷ प्लाट भी ले लिए हैं दो तीन ৷“ उन्होंने बाबूजी के कंधे पर हाथ रखा ৷ उनकी नज़र बाबूजी की छेद वाली बनियाइन पर थी ৷ “अच्छा है .. अब तुमने गुरूजी बनना स्वीकार किया है तो बने रहो ज़िंदगी भर ऐसे ही गुरुजी के गुरुजी, शायद यही लिखा होगा तुम्हारी किस्मत में ৷”


अपमान के घूँट पीकर भी कैसे मुस्कुराया जा सकता है, इस उक्ति को दृश्य रूप में मैंने उस दिन बाबूजी के चेहरे पर देखा ৷ बाबूजी ने मुस्कुराते हुए उनका हाथ अपने कंधे से हटाया “ गुरूजी बनने का मुझे कोई अफ़सोस नहीं है ৷ बल्कि इस बात का संतोष है कि मैंने जो कुछ भी कमाया है गलत तरीके से नहीं कमाया है ৷ किराए के मकान में रहता हूँ और साइकिल पर चलता हूँ इस बात का भी मुझे कोई अफ़सोस नहीं है ৷ पूरे महाराष्ट्र में मेरे स्टूडेंट हैं, मैं जहाँ भी जाता हूँ वे मुझे प्रणाम करते हैं ৷” वे क्षण भर रुके और  होठों को किंचित चौड़ा करते हुए उन्होंने कहा “ तुम्हारी तरह पीठ पीछे या मुँह पर बेईमान या घूसखोर कहकर कोई मुझे गाली नहीं देता ৷ “ 


उन सज्जन का चेहरा अचानक लाल हो गया ৷ अगर आप के पास सच की ताकत है तो प्रतिरोध और हौसला कितना बुलंद होता है यह मैंने उस दिन देखा ৷ अचानक उन सज्जन का एक अट्टहास गूंजा जिसकी ध्वनि उसके नकली होने की चुगली कर रही थी .. “तुम बिलकुल वैसे ही हो जैसे कॉलेज में थे, बिलकुल नहीं बदले ... अच्छा चलता हूँ ৷” फिर वे दोनों बाहर निकल गए ৷ 


जाने क्यों मुझे लगा कि बाबूजी अब उन्हें कार तक छोड़ने नहीं जायेंगे ৷ लेकिन वे कार तक गए, उनसे गले मिले और आकर माँ से कहने लगे “बड़ा अच्छा दोस्त है मेरा, देखो इतनी दूर से अकोला से मिलने आया है वर्ना कौन आता है इतनी दूर से मिलने ৷” 


माँ ने जवाब दिया .. “कुछ नहीं, वो इधर कुछ सरकारी काम से आये थे, आपका पता चला तो मिलने आ गए ৷ कोई खाली आपसे मिलने थोड़े ही आये थे ৷” बाबूजी अब एक पति की भूमिका में भी थे   “ अरे तुम्हे क्या पता, तुम क्या जानो, तुम कुछ नहीं जानती ৷ हम सब जानते हैं ৷ इतनी दूर से आया था वो ৷”


मैं समझ गया अब काफी देर तक इनकी नोकझोंक चलेगी, बाबूजी अपने दोस्त का पक्ष लेंगे और माँ ऐसे ही कुछ कुछ कहकर उन्हें चिढ़ाती रहेगी और अंत में कहेगी  ...”कोई आये तो कम से कम यह फटी बनियाइन तो मत पहना करो, ऐसे ही बैठे रहते हो, क्या सोचता होगा आपका वो दोस्त ৷” फिर बाबूजी कहेंगे “अरे क्या सोचेगा,अब जैसे हैं वैसे हैं, और सोचेगा तो सोचेगा,  दोस्त की बात का भी कोई बुरा मानता है ৷” 


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