10 जून 2026

155 मेरे हाइस्कूल के शिक्षक : हफ़ीज़ खान मास्साब



“अपनी ग्रामर की किताब कौन कौन नहीं लेकर आया है ?” हफ़ीज़ खान मास्साब की कड़कती हुई आवाज़ क्लास में गूँज रही थी । अब छात्रों में इतनी शर्म तो बाकी थी कि वे हाथ खड़ा कर खीसे निपोरकर नहीं कह सकते थे कि सर ,मैं नहीं लाया हूँ । मास्साब का अगला फरमान था  “ठीक है  जो लोग अपनी किताब लेकर नहीं आए हैं वे क्लास से बाहर चले जाएँ और अगली बार किताब लेकर ही क्लास में एंटर करें ।“


उसके बाद उन्होंने कहा “अब अपनी किताब खोलें और पेज नंबर फलां फलां निकाले ।“ सब ने अपनी किताब खोलकर डेस्क पर फैला ली । “ठीक है पहले बेंच से शुरू करें एक्टिव वौइस् पैसिव वौइस् ।“ पहला नंबर मेरा ही होता था मैंने शुरू किया कोलम्बस  डिस्कवर्ड अमेरिका , अमेरिका वाज़ डिस्कवर्ड बाय कोलम्बस ।“ “ वैरी गुड सर ने कहा “नेक्स्ट ।” मेरे साथ वाला छात्र अनुपस्थित था ज़ाहिर है मुझसे पीछे वाले का नंबर था वह थोड़ा असावधान था या फिर उसका ध्यान कहीं भटक गया था वह हड़बड़ी में पन्ने पलटाने लगा और इधर उधर देखने लगा । मास्साब ने कहा “ यहाँ वहाँ क्या देख रहे हो ? पेज नंबर फलां फलां ऊपर से सेवंथ रो ।


वैसे यह एक कक्षा का सामान्य दृश्य हो सकता है फिर इस क्लास में ऐसी क्या विशेषता थी ? विशेषता यह थी कि सबको अपनी अपनी किताब लाने का हुक्म देने वाले हफ़ीज़ खान मास्साब की टेबल पर कोई किताब नहीं थी और इसके ज़रूरत भी नहीं थी इसलिए कि उन्हें रेन और मार्टिन की पूरी ग्रामर पेज दर पेज लाइन दर लाइन याद थी और वे अपनी याददाश्त से बता रहे थे फलां पेज पर फलां लाइन देखो ।   


उम्रदराज़ हफ़ीज़ खान मास्साब बरसों से गाँधी विद्यालय भंडारा में इंग्लिश पढ़ाते आ रहे थे होमवर्क करके न लाने पर वे सीधे सीधे कहते “ दुनिया में काम प्यारा होता है चाम नहीं “ । भंडारा में हिंदी उर्दू मीडियम का एकमात्र स्कूल होने के कारण वे सभी छात्र जिनकी मातृभाषा मराठी नहीं थी इसी स्कूल में पढ़ते थे और यहाँ को एजुकेशन था 


हफ़ीज़ खान मास्साब उस ज़माने में भी बहुत प्रोग्रेसिव थे और लड़कियों की शिक्षा पर बहुत ध्यान देते थे । उनकी नज़र में लडके लडकियाँ सब बराबर थे । “अच्छा तो क्या नाम है आपका ?” उनका डायलाग कुछ इस तरह शुरू होता ..बिलकिस बेगम... बेगम मतलब जिसे कोई ग़म नहीं । पढ़ाई लिखाई में कमज़ोर हैं लेकिन कोई ग़म नहीं ।“ बेगम का यह मतलब पहली बार सुना था हम लोगों ने 


हफ़ीज़ खान मास्साब की हमेशा की एक ही वेशभूषा थी उनका रहन सहन बहुत सादा था वे छत्तीस इंच मोहरी का एक पायजामा और उस पर एक लम्बी घुटनों तक आनेवाली क़मीज़ । पैंट शर्ट में हमने उन्हे बस एकाध बार ही देखा है ।


एक दिन लंच टाइम में क्लास के उधमी छात्रों ने शरारतन बेंचों को लात मार मार कर टेढ़ा कर दिया जस्ट उसके बाद हफ़ीज़ खान सर की क्लास थी । “ ये बेंचे किसने टेढ़ी की हैं ? क्लास में प्रवेश करते ही हफीज़ खान सर की गरजती हुई आवाज़ क्लास में गूंजी । सारे छात्र व छात्रायें सर झुकाकर खड़े थे लेकिन किसीकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि कोई कुछ कहे ।  वे एक एक कर सभी के पास गये और बहुत प्यार से पूछा “ बेटा यह बेंचे किसने गिराई हैं ?” लेकिन सबके सब चुप । 


मास्साब मुस्कुराने लगे “ अच्छा इतनी एकता है तुम लोगों में कि गुनहगारों का नाम भी नहीं बताओगे । ठीक है फिर सभी को सज़ा मिलेगी । सब गुनाह में बराबर के शरीक हैं चलो लड़कियों के अलावा बाकी सब लोग बेंच पर खड़े हो जाओ । “ हफीज़ खान सर ने आदेश दिया । सभी बच्चे बेंच पर खड़े हो गये लेकिन मैं अपने स्थान पर ही खड़ा रहा । वे मेरे पास आये और कहने लगे ..” क्यों भाई क्या आप लोकमान्य तिलक हैं या गान्धीजी हैं जो गुनाह में अपने आप को शरीक नहीं मान रहे हैं ।“


“ठीक है अपने साथियों के नाम बताइये ।“ सर ने धीरे से कहा । मैंने पढ़ रखा था कि लोकमान्य तिलक के साथ भी उनके बचपन में ऐसा ही वाकया हुआ था, जब उन्हें क्लास में मूंगफल्ली के छिलके फ़ैलाने के लिए डांट पडी थी तब उन्होंने कहा था “ न मैं अपने साथियों के नाम बताउंगा न ही सज़ा भोगूंगा क्योंकि यह कचरा मैंने नहीं फैलाया है ।“


मैंने उसी तर्ज पर कहा “ यह बेंचे मैंने टेढ़ी नहीं की हैं ।“ “ ठीक है सच कहने की हिम्मत है तुममें । “ सर ने  कहा लेकिन  बाकी लोग खड़े रहें ।“ मुझे लगा सर लोकमान्य तिलक की कहानी भूल गए हैं  क्योंकि उस कहानी मे ऐसा नहीं हुआ था बल्कि उनके टीचर ने सभीको माफ़ कर दिया था ।


लेकिन हफ़ीज़ खान सर को भी शीघ्र ही इस बात का अहसास हुआ और उन्होंने अगली बार ऐसा न हो इस हिदायत के साथ सब छात्रों को बेंच से नीचे उतरने का आदेश दिया । यह कहने की ज़रूरत नहीं कि दो मिनट में हम लोगों ने क्लासरूम यथावत कर दिया । “  


हफ़ीज़ खान मास्साब उसी साल रिटायर हो गए थे । बरसों बाद एक दिन मैं उनसे मिलने उनके घर गया अस्सी से ऊपर उम्र थी वे बूढ़े और कमज़ोर दिखाई से रहे थे और उन्हें आँखों से भी कम दिखाई देने लगा था मैंने उन्हें अपना नाम बताया तो उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा “बेटा तुम्हे देख तो नहीं सकता लेकिन महसूस कर सकता हूँ । खूब खुश रहो ।“


हफ़ीज़ खान मास्साब से स्कूल लाइफ में जितने भी डायलाग्स हम बच्चों ने सुने थे उनसे यह डायलाग बहुत अलग था । वे सब तो हम एक कान  से सुनकर दूसरे से निकाल देते थे लेकिन यह डायलाग मन के भीतर तक पहुँच गया । आज हफ़ीज़ खान मास्साब दुनिया में नहीं हैं लेकिन उन्हें मैं महसूस कर सकता हूँ ।  



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