![]() |
| गांधी विद्यालय |
बाबूजी अक्सर हम बच्चों को अपने बचपन की ग़रीबी के किस्से सुनाया करते थे कि किस तरह उनके घर में कभी कभी ऐसी नौबत आ जाती थी जब खाने के लिए भी कुछ नहीं रहता था और पडौसियों से उधार मांगना पड़ता था यहाँ तक कि एक बार घर आये किसी मेहमान से ही पैसे लेकर सब्ज़ी लानी पड़ी थी ।
बाबूजी बार बार दोहराए गए किस्सों की शर्म से निर्लिप्त होकर अक्सर हम बच्चों से कहते “ तुम लोग तो बहुत अच्छे समय में पैदा हुए हो ।“ आज जब मैं अपने बचपन के दिनों के अपनी ग़रीबी के किस्से बच्चों को सुनाता हूँ तो उनसे भी यही वाक्य कहता हूँ । ऐसा लगता है जैसे यह वाक्य हर बच्चे को परम्परा से मिलता है जिसे वह अपने पिता बनने के बाद बच्चों को ग़रीबी का महत्व बताने के लिए उपयोग में लाता है ।
एक बार मैंने किसी मैगज़ीन में अमेरिका के कुछ ऐसे लोगों के चित्र देखे थे जो स्पोर्ट शू और जींस पहने किसी स्क्वायर पर गिटार बजाते हुए भीख मांग रहे थे৷ अपने यहाँ के भिखारियों की वेशभूषा से उनकी तुलना करने पर वे मुझे बिलकुल भी भिखारियों की तरह नहीं लगे मुझे ৷ उनकी प्रतीति भारत के संपन्न लोगों की भांति थी ৷ सही बात है , ग़रीबी भी देशकाल के अनुसार अपनी परिभाषा बदल लेती है ৷
वैसे इस बात में कहीं कोई दो राय नहीं कि उन दिनों हर मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार में आर्थिक तंगी तो रहा करती थी । हालाँकि उन दिनों महंगाई आज जैसी नहीं थी और बाज़ार भी आज के बाजारों की तरह जेब काटने वाले बाज़ार नहीं हुआ करते थे । तो चलिए, अब चलते हैं भंडारा शहर के बाज़ार की ओर और सैर करते हैं उन दुकानों की जो मेरे नन्हे पाँवों के रास्तों में आती थीं

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें