गाँधी विद्यालय भंडारा में मिडिल स्कूल में श्री घड़ोले हमें अंग्रेज़ी पढ़ाते थे ৷ एक दिन घड़ोले सर के मुँह से अंग्रेज़ी की एक कहावत सुनी “बोर्न विद सिल्वर स्पून इन माउथ ।“ सर ने बताया था कि यह मुहावरा व्यंजना में उन बच्चों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिनका जन्म बहुत धनाढ्य घरों में होता है, वास्तव में पैदा होते समय चांदी का चम्मच मुँह में नहीं होता । मैं जब भी अपने आसपास नज़र दौड़ाता तो मुझे अपना एक भी दोस्त ऐसा नहीं दिखाई देता था जो चाँदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुआ हो । मेरे सारे के सारे दोस्त मेरे जैसे ही इस मुहावरे के अभिधात्मक अर्थ में मुँह में खुद का अँगूठा लेकर ही पैदा हुए थे ।
बाबूजी अक्सर हम बच्चों को अपने बचपन की ग़रीबी के किस्से सुनाया करते थे कि किस तरह उनके घर में कभी कभी ऐसी नौबत आ जाती थी जब खाने के लिए भी कुछ नहीं रहता था और पडौसियों से उधार मांगना पड़ता था यहाँ तक कि एक बार घर आये किसी मेहमान से ही पैसे लेकर सब्ज़ी लानी पड़ी थी ।
बाबूजी बार बार दोहराए गए किस्सों की शर्म से निर्लिप्त होकर अक्सर हम बच्चों से कहते “ तुम लोग तो बहुत अच्छे समय में पैदा हुए हो ।“ आज जब मैं अपने बचपन के दिनों के अपनी ग़रीबी के किस्से बच्चों को सुनाता हूँ तो उनसे भी यही वाक्य कहता हूँ । ऐसा लगता है जैसे यह वाक्य हर बच्चे को परम्परा से मिलता है जिसे वह अपने पिता बनने के बाद बच्चों को ग़रीबी का महत्व बताने के लिए उपयोग में लाता है ।
एक बार मैंने किसी मैगज़ीन में अमेरिका के कुछ ऐसे लोगों के चित्र देखे थे जो स्पोर्ट शू और जींस पहने किसी स्क्वायर पर गिटार बजाते हुए भीख मांग रहे थे৷ अपने यहाँ के भिखारियों की वेशभूषा से उनकी तुलना करने पर वे मुझे बिलकुल भी भिखारियों की तरह नहीं लगे मुझे ৷ उनकी प्रतीति भारत के संपन्न लोगों की भांति थी ৷ सही बात है , ग़रीबी भी देशकाल के अनुसार अपनी परिभाषा बदल लेती है ৷
वैसे इस बात में कहीं कोई दो राय नहीं कि उन दिनों हर मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार में आर्थिक तंगी तो रहा करती थी । हालाँकि उन दिनों महंगाई आज जैसी नहीं थी और बाज़ार भी आज के बाजारों की तरह जेब काटने वाले बाज़ार नहीं हुआ करते थे । तो चलिए, अब चलते हैं भंडारा शहर के बाज़ार की ओर और सैर करते हैं उन दुकानों की जो मेरे नन्हे पाँवों के रास्तों में आती थीं

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