अंग्रेज़ों ने जैसे भारत में प्रवेश करने की स्मृति में मुंबई में गेट वे ऑफ़ इंडिया बनाया था वैसे ही अनेक शहरों में प्रवेश द्वार बनाये थे बैतूल का कमानिया गेट भी ऐसा ही एक दरवाज़ा था । कमानिया गेट से जैसे ही मार्च का महीना बैतूल शहर की सीमा के भीतर प्रवेश करता उसके पीछे पीछे जंगल की ओर से आनेवाली आम के बौर की मादक गंध भी प्रवेश कर जाती ।
हमारे मोहल्ले के अंतिम छोर से निकलने वाली रिंग रोड शहर की भी अंतिम सीमा थी । रिंग रोड से एक कच्चा रास्ता हमारे खेतों की ओर चला जाता था । मार्च आते ही इस रास्ते के दोनों ओर लगे आम के पेड़ों पर कूकती हुई कोयलों के समवेत स्वरों में में कोई गोंडी गीत सुनाई देने लगता ।
अप्रेल के अंत तक गेहूँ कट कर खलिहान में चला जाता और भूसा नए घर के पीछे वाली कोठरी में रख दिया जाता । हम समझ जाते कि अब इसके पीछे पीछे अमराई से तोड़े हुए आम आयेंगे । कोयलों की तरह हम लोग भी आम पकने की प्रतीक्षा करने लगते ।अमराई के आम घर आने से पहले बाज़ार में दूर दूर से आम आने लगते । इतवार और बृहस्पतिवार के बाज़ार में रघुबीर टाकीज की ओर जाने वाली सड़क के दोनों ओर आम के टोकने लिए बैठे आम विक्रेता दिखाई देने लगते । गर्मी के दिनों में सब्जियों के अलावा तरबूज और आम बाज़ार की शोभा होते थे । श्याम काका आवाज़ लगाते “चलो कौन चल रहा है आम लेने ?” हम दो तीन लोग तो तैयार हो ही जाते थे ।
दरअसल श्याम चाचा के साथ आम खरीदने जाने का अर्थ होता था पेट भर आम खाने का मौका मिलना । उन दिनों चखने के लिए खरीददार की हथेली पर ज़रा सा रस टपकाने या चाकू से काटकर आम की एक फाँक पकड़ा देने का कंजूसी से भरा चलन नहीं था । आम बेचने वाले खरीददार को चखने के लिये पूरा चुसना आम ही दे दिया करते थे । हमारे घर में आम भी सैकड़े की तादाद में ख़रीदा जाता था । श्याम चाचा कम से कम बीस दुकानों पर जाते और अंत में तय करते “ वो रघुवीर टाकीज के गेट के बाएँ तरफ़ जो बैठा है ना , उसके पास ठीक आम है । फिर टोकरे का भाव तय किया जाता और हम में से कोई न कोई उस टोकरे को सर पर रखकर घर छोड़ आता । सब्जियाँ भी इसी तरह से ख़रीदी जाती थीं, पांच किलो बैंगन लिया टोकरी सर पर रखकर दौड़कर घर पहुँचे, किचन से लगे कमरे में सब्जी उंडेली और फिर वापस आकर श्याम काका के पास तैनात हो गए ।
आम के उन ख़ास दिनों में श्याम काका के साथ बाज़ार जाने के लिये बच्चों के बीच प्रतिस्पर्धा होती थी कि कौन जायेगा । । बैतूल अपनी विशिष्ट प्रजाति के गाजर्या आम के लिए प्रसिद्ध है इसका स्वाद कुछ कुछ गाजर की तरह होता है । बैतूल में हम लोगों के लिए आम की कमी नहीं थी फिर भी रास्ते चलते हुए पेड़ों पर पत्थर मारकर आम गिराने में जो आनंद आता था उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । हरे आमों के बीच कोई पकती हुई सांख भर दिख जाए फिर समझो उसका काम तमाम ৷ हम बच्चों के बीच एक मिथ चलता था कि जिस आम पर बैठकर कोयल पाद देती है उसका स्वाद बहुत मीठा हो जाता है ।
शाम को जब मदन मोहन ताउजी मानस पाठ के लिए दालान में बैठते तो श्रोताओं में एक न एक बार उस साल की आम की फ़सल के बारे में बात ज़रुर होती थी । अब राम का और तुलसीदास का क्या सम्बन्ध था यह तो हमें उस समय नहीं पता था लेकिन अभी अभी पंकज चतुर्वेदी की एक कविता पढ़ने में आई तो लगा कि कुछ न कुछ सम्बन्ध अवश्य रहा होगा । पंकज लिखते हैं...
रसाल है रामचरित /
और रसाल है /
अवधी में उसका विन्यास /
भक्ति का रस / और काव्य का रस /
जानने में/ शायद इससे मदद मिले/
कि कौन-सा आम / खाते थे तुलसीदास /
तुलसी बाबा कौनसा आम खाते थे और आम खाने के क्या किस्से सुनाते थे यह तो मुझे पता नहीं लेकिन बैतूल से जुड़े हुए आम के किस्सों की मेरे पास कमी नहीं है ।
अब पढिए एक मजेदार किस्सा
हम लोगों के खेत में भी आम के पेड़ थे जो उन दिनों फल देने लगे थे । मनमोहन ताउजी खेत से बहुत सारा कच्चा आम तुड़वाकर घर में भेज देते थे जिन्हें तह लगाकर भूसे के बीच रख दिया जाता था ताकि कुछ दिनों बाद वे पक जाएँ और उन्हें खाया जा सके । बड़ी माँ यानि बिन्नू की माँ इस कमरे की इंचार्ज थीं । उन्हें पता था कि कौनसा आम कब रखा गया है और वह कब पकेगा ।हम लोग आम रखने में उनकी मदद करते थे और इस रहस्य को जान लेते थे । जैसे जैसे खेत से कच्चा आम आता उसे वहाँ रख दिया जाता । आम रखे जाने के बाद बड़ी माँ उस कमरे में ताला लगा देती थीं ।
![]() |
| बड़ी माँ और माँ |
मैं और बिन्नू भैया इस बात का बराबर हिसाब रखते थे कि किस ओर रखा हुआ आम कब तक पकेगा जैसे ही वह समय आता हमारी चौर्य कला आजमाने का समय भी आ जाता । बड़ी माँ रोज दोपहर में खाना खाकर कुछ देर के लिए सो जाती थीं । सोते हुए वे आम वाले कमरे की चाबी का गुच्छा अपनी तकिया के नीचे रख लेती थीं । उन्हें सोता हुआ जानकर हम लोग उनकी तकिया के नीचे से धीरे से चाबियाँ निकालते और आम वाले कमरे का ताला खोलकर कुछ आम चुरा लेते फिर चाबियाँ यथा स्थान रख कर आम लेकर पुराने घर में आते और चूस चूस कर आराम से आम खाते ।
एक दिन बड़ी माँ ने बहुत प्यार से हम लोगों को बुलाया और पूछा “ बेटा आम खाओगे ? “ नेकी और पूछ पूछ , हम लोगों ने तुरंत हाँ कर दी । आम के सार्वजनिक वितरण से इतर यह हम लोगों पर उनकी विशेष कृपा थी । वे आम की कोठरी का ताला खोलकर भीतर गईं और एक टोकरी में बहुत सारे आम लेकर आ गईं, फिर एक बाल्टी भर पानी में उन्हें डुबो दिया । यह चुसना आम थे जिन्हें चूस चूस कर खाया जाता था । वे बहुत प्यार से धो धो कर हम लोगों को आम देती रहीं । हम बाएँ हाथ की मध्यमा और अंगूठे के बीच उन्हें रख पिलपिला करते फिर उसका मुँह खोलकर दो बूंद रस बाहर टपकाते और फिर हुए चूस चूस कर खा जाते । बड़ी माँ हम दोनों को उसी तरह देखती रहीं जैसे यशोदा मैया कृष्ण और बलदाऊ को मक्खन खाते हुए देखती होगी ।
आठ दस आम खाने के बाद हम लोगों का पेट भर गया । मैंने बड़ी माँ से कहा “ बस बड़ी माँ, अब पेट भर गया । । “ वे बोलीं “ बस बेटा, एक आम और खा लो । “ मैंने बिन्नू भैया की ओर देखा बिन्नू भैया ने संकेत किया ‘खा लो’ बड़ी मुश्किल से वह एक आम खाया गया । लेकिन बड़ी माँ तो एक एक आम लिए फिर तैयार थीं ..”लो बस एक और खा लो ..।“ हमने मना किया तो उन्होंने धमकी दी “नहीं खाओगे, तो कल से एक भी आम नहीं मिलेगा ।“ मज़बूरी में हम लोगों ने फिर एक एक आम खाया ।
यह हमारी भूख,स्वाद,इच्छा और तृप्ति की इन्तहा थी । अगला आम उनके हाथ में देखकर हम लोगों ने सुबक सुबक कर रोना शुरू कर दिया ..”बस बड़ी माँ..बस.. अब नहीं खा सकते ..बस ..अब पेट फूट जायेगा, अब नहीं ।“ बड़ी माँ मुस्कुराईं और हम बच्चों पर रहम दिखाते हुए कहा ..ठीक है , अब नहीं देंगे लेकिन पहले बोलो कि अब से आम चुराकर तो नहीं खाओगे ? “
हम दोनों ने रोते रोते चौंक कर उनकी ओर देखा .. हमें समझ में आ गया था कि उन्हें हम लोगों की इस चोरी का पता चल गया है और वे हमें प्यार से आम नहीं खिला रही थीं बल्कि इस तरह चोरी की सज़ा दे रही थीं । हम लोगों ने कान पकड़ कर कहा “ठीक है, अब से चोरी नहीं करेंगे । “ तब जाकर हम लोगों को छुट्टी मिली ।
शरद कोकास



कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें