7 जून 2026

51.बैतूल का साप्ताहिक हाट बाज़ार

 

रविवार और गुरुवार को हमारा मोहल्ला एक रंगमंच बन जाता था । हफ़्ते के इन दो दिनों में लगने वाला यह हाट बाज़ार हम लोगों के लिये बैतूल के हमारे इतवारी बाज़ार नामक मोहल्ले के स्थायी से दिखाई देने वाले परिवेश में दृश्य परिवर्तन की तरह होता था । 
दुर्गा मंदिर से लगी दुकानें 
रंगमंच पर प्रॉपर्टी अर्थात ज़रूरी उपकरणों का प्रवेश सुबह से ही प्रारंभ हो जाता था सबसे पहले बैलगाड़ियों, छोटे ट्रकों का आना शुरू होता, उनसे एक एक कर सामान उतरता , कैनवास के तम्बू, तिरपाल ,सब्जियों के टोकरे, तराजू, बाँट, खाली बोरे, हलवाइयों की भट्टियाँ, बड़े बड़े थाल , बाल्टियाँ , फल वालों के लकड़ी के स्टैंड, आदि । सबकी अपनी अपनी दुकान की जगह तय रहती थी कोई किसी के क्षेत्र में अतिकरामं नहीं कर सकता था चारों कोनों में तिरपाल बांधने के लिए ज़मीन गीली कर लोहे के बड़े बड़े खूंटे गाड़े जाते। टन टन टन खूंटों पर पड़ती घन की मार से हम लोग समझ जाते कि अब इन पर तिरपाल बांधा जायेगा यह तम्बू जिसे हम लोग तिरपाल कहते थे यह तार्पोलीन का देशज रूपांतर था । 

बोरों मे सब्ज़ी 
बाज़ार के इस रंगमंच पर दुकान लगाने हेतु आवश्यक वस्तुएं स्थापित हो जाने के पश्चात गीले बोरों के में लिपटे सब्जियों के गठ्ठर उतारे जाते और उन्हें करीने से सामने बिछे हुए बोरों पर सजाया जाता । उधर रघुवीर टाकीज के सामने फल वालों की दुकानें सज जातीं । मोहल्ले के अंतिम छोर पर बनी रिंग रोड पर मिर्च मसाले और अनाज की दुकानें लाल रंग में रंगी दिखाई देतीं वहीं तापी की कपड़ों में प्रेस करने की दुकान के सामने वाले हिस्से में हलवाइयों की भट्टियाँ तैयार हो जातीं । मंदिर की दाहिनी ओर मिशन स्कूल के सामने मनिहारी की दुकानें सजतीं और मेन रोड पर चांदी के जेवरों की ।

ग्यारह बारह बजे तक बाज़ार के इस मंच की सज सज्जा जारी रहती थी । फिर दुकानदार दुकान की को झुककर प्रणाम करते और गद्दी पर बैठ जाते । अब संवाद शुरू होते, बैंगन एक आना किलो, टमाटर दो आना,  लो कटहल ताज़ा कटहल । अब नए पात्रों के रूप में ग्राहकों का आना शुरू होता । 

ख़मीर की ख़ुमारी में गर्म गर्म जलेबियाँ 

दोपहर तक बाज़ार अपने शबाब पर आ जाता था । हलवाई की दुकान पर भट्टी के लाल लाल दहकते हुए कोयले पर रखी कढ़ाई में खौलते तेल से जलेबियों की महक उठने लगती । जैसे ही खुशी से फूलती उसे चाशनी में दबा दिया जाता । गुड़पट्टी तो घर से बनाकर लाई जाती थी । ढेर पर मंडराती हुई ततैया से बचते हुए ग्राहक गुड़ में पगे सेव के लड्डू खरीदते और वहीं दुकान पर खड़े खड़े खा जाते ।


मैदे के टुकड़ों को चाशनी में डुबोकर बनाये हुए खाजा को बंधवाकर घर ले जाना अधिक उचित होता था यह लम्बे समय तक टिकने वाली मिठाई होती थी बूंदी के लड्डू तो गरमागरम तुरंत तैयार किये जाते जलेबी के साथ कॉम्बिनेशन के लिए एक भट्टी में गरमागरम आलुबोंड़े निकलते रहते ।

उधर मनिहारी की दुकान पर आदिवासी बालाएँ चूड़ी ,कंगन, बिंदिया, चोटी में लगाने के बैंगनी रंग वाले फुंदने, रंगबिरंगी कंघियाँ और शीशे, नेलपालिश और आलता, आदि खरीदने हुए दिकाही देतीं वहीं पास में होती बच्चों के खिलौनों की दुकानें, मिट्टी की कमर मटकाने वाली गुड़िया, पी पी करने वाला बाजा , रंगीन कागज की चरखी ,

हम लोगों को पैसे मिलते थे उससे हम लोग क्या क्या खरीदते थे 

बैतूल शहर के आसपास से अनेक ग्रामीण जन  सब्जी भाजी ,कपडा , मिठाई और जरुरत की वस्तुएं खरीदने अपने बालबच्चों सहित आते थे । इन गाँव वालों में आदिवासियों की संख्या अधिक हुआ करती थी l गोंड आदिवासियों को सबसे पहले मैंने इसी हाट बाज़ार में देखा l उनकी भाषा गोंडी थी लेकिन सामान खरीदने के लिए वे कामचलाऊ भाषा सीख चुके थे । दुकानदारों ने भी गोंडी के कुछ शब्द सीख लिए थे और उन्हें भी सामान बेचने में कोई दिक्कत नहीं होती थी । आज हम दुनिया के किसी भी देश में बने प्रोडक्ट का विज्ञापन देश की किसी भी भाषा में देख सकते हैं 

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