बैतूल के इस साप्ताहिक बाज़ार में आनेवाले सभी आदिवासी केवल ज़रूरत का सामान खरीदने यहाँ नहीं आते थे बल्कि बहुत सारे आदिवासी अपनी वनोपज महुआ, अचार,चिरौंजी जैसी वस्तुएं बेचने के लिए भी यहाँ आते थे । बिक्री के बाद उन्हें जो पैसे प्राप्त होते उससे वे नमक, किराना, साबुन,अनाज और अन्य ज़रूरत का सामान खरीद लेते । इस तरह वे ग्राहक भी होते और दुकानदार भी, यद्यपि शहर के लोगों जैसे चालाक दुकानदार तो वे हो भी नहीं सकते थे । शहर के लोग भी उन दिनों इतने सभ्य नहीं हुए थे कि उनकी वनोपज को औने-पौने दामों में खरीद लें । फिर भी उनकी वस्तुओं को इतने कम दामों में बिकता देख कर आश्चर्य होता था । चिरौंजी जैसी वस्तु भी सूखे मेवों की दुकान पर पहुँचकर बीस पच्चीस गुना महंगे दामों में बिकने लगती थी ।
आज आदिवासी पहले की अपेक्षा समझदार हो गए हैं । वे अब इस तरह ठगे नहीं जाते । हालाँकि अब उन्हें ठगने वालों ने नए तरीके ईज़ाद कर लिए हैं । आज आदिवासियों के जंगल और ज़मीन पर मल्टी नेशनल कम्पनियाँ कब्ज़ा कर रही हैं, उन्हें असीमित दोहन के अधिकार और लायसेंस दिए जा रहे हैं । आदिवासी उस समय भी इन चालाक शहर वासियों का मुकाबला नहीं कर सकते थे आज भी वे बमुश्किल अपने शोषण के खिलाफ़ कुछ बोल पाते हैं । यह बात और है कि अब तो अपने शोषण के खिलाफ़ पढ़े-लिखे शहरी भी बोल नहीं पा रहे हैं ।
ये सब ताड़ी के अधिकारी
सुबह से शाम तक चलने वाला बैतूल का यह हाट बाज़ार केवल सब्जी भाजी या आवश्यक वस्तुओं के लिए नहीं होता था बल्कि मनोरंजन के भी यहाँ भरपूर साधन होते थे । हमारी लाइन के पीछे की ओर मरघट के सामने वाले मैदान में जहाँ सफाई कर्मियों की बस्ती थी वहाँ ऊपर नीचे चलने वाले लकड़ी के हवाई झूले लगते थे ।
खाने पीने की वस्तुओं के अलावा स्त्रियों और बच्चों के लिए इतना मनोरंजन पर्याप्त था । लेकिन बड़ों का मन इस तरह थोड़ी देर झूलने और झूमने से थोड़े ही भरता सो वहीं एक किनारे पर ताड़ी की एक दुकान के रूप में उनके झूमने का भी बेहतर प्रबंध था । घर लौटते हुए जहाँ ठहरना उनके लिये अनिवार्य था ।
इतने अलंकारों से तो आप समझ ही गए होंगे कि ताड़ी कोई नशीला पदार्थ है वास्तव में ताड़ी का अर्थ है ताड़ के या छीन्द के पेड़ का रस । पेड़ से यह रस प्राप्त करने के लिए अर्थात ताड़ी उतारने के लिए ताड़ के पेड़ पर चढ़कर ऊपर की ओर पत्तों के निचले हिस्से में तने पर एक हल्का सा चीरा लगाया जाता है, फिर उसमे एक खपच्ची फँसाकर उसका दूसरा सिरा वहीं तने से बंधी एक मटकी में लगा दिया जाता है ताड़ के पेड़ के तने से बूँद बूंद रस निकलता है और नाली नुमा खपच्ची से बहता हुआ धीरे मटकी में इकठ्ठा होने लगता है । कुछ घंटों बाद जब मटकी रस से भर जाती है , एक आदमी पेड़ पर चढ़कर उसे उतार लेता है ।
धीरे धीरे फर्मेंटेशन होते जाने के कारण यह रस नशीला होता जाता है । हालाँकि इसका नशा बहुत हल्का रहता है । एक तरह से यह लोकल प्राकृतिक बियर ही होती है । महाराष्ट्र में नागपुर की ओर ताड़ी नमक इस पेय को नीरा कहते हैं और सरकार द्वारा बाकायदा इसे प्राप्त करने और बिक्री हेतु लाइसेंस प्रदान किये जाते हैं ।
अब इनमें कुछ लोग ऐसे भी होते थे जिन्हें इतने मामूली से झूमने में आनंद नहीं आता था अर्थात उनका झूमने का माद्दा इससे थोड़ा अधिक था । ये हमारे पियक्कड़ समाज के उन लोगों की तरह थे जिन्हें ताड़ी लेडीज़ ड्रिंक लगता था । ऐसे मर्दों को अपनी मर्दानगी का अवसर प्रदान करने हेतु वहीं पास में देसी शराब ठेके की व्यवस्था भी थी यहाँ सरकारी शराब के अलावा महुए की शराब भी मिलती थी । हालाँकि ज़्यादातर आदिवासी अपने घरों में ही महुए की शराब बनाने में विश्वास रखते थे इसलिए यहाँ वे सरकार के आबकारी विभाग के माध्यम से सरकार को वित्तीय सहायता पहुँचाने के उद्देश्य से एकत्रित होते थे ।
जैसे जैसे संध्या परी का आगमन होता लाल परी की बिक्री बढ़ जाती । चालीस वाट के टिमटिमाते पीले बल्ब की रौशनी में देसी शराब भट्टी की खिड़की पर उपस्थित उन मानव आकृतियों को पहचानना मुश्किल होता । कुछ दूरी पर बाहर मैदान में अँधेरे में जलते हुए पुआल पर छोटी छोटी मछलियाँ भूनी जा रही होतीं । वातावरण में उपस्थित इस स्वप्न दृश्य में सोंधी सोंधी सी गंध और कुछ न समझ में आने वाली ध्वनियों के बीच जाने कितने घीसू,माधव और देवदास दिखाई देने लगते । उनके सामने बोतल और गिलास के साथ चखने के रूप में भुनी हुई ताज़ी छोटी छोटी सुनहरी मछलियाँ, भुनी कलेजी और शाकाहारी चना चबैना भी मौजूद होता । फिर शाम ढलने के साथ धीरे धीरे यह वैभव भी ढलने लगता ।

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