6 जून 2026

49. काले पत्थरों के बीच लाल लाल रक्त की धारियाँ


“मैं अपनी जेब में एक शाम लिए घूमता हूँ/और जब लगता है कि कॉफ़ी पीना चाहिए/या उस सड़क पर चल देना चाहिए /जिसके दोनों ओर पेड़ ही पेड़ है / इतने इतने और इतने सुन्दर / और जिस पर अफसरों की या ईसाई लडकियाँ सड़क घेर कर/चलती हैं खेलती और मुस्कुराती हुई..” 

अशोक वाजपेयी की कविता ‘एक छोटा शहर’ की इस सड़क जैसी एक सडक हमारे घर के सामने भी थी जिसके दोनों ओर पेड़ ही पेड़ थे । सब्ज़ी खरीदने के लिए आई हुई अफसरों की लडकियाँ उस पर सिर्फ रविवार और गुरूवार को साप्ताहिक बाज़ार के दिन ही दिखाई देती थीं, साथ ही गोंड आदिवासियों की भी लडकियाँ होती थीं जो गुदना गुदवाने के लिए यहाँ आती थीं । 


इस सड़क तक पहुँचने के लिए कोठी बाज़ार की मुख्य सड़क से कमानिया गेट की  ओर बढ़ते हुए जैसे ही देवी मंदिर के शीर्ष पर लगी ध्वजा दिखाई देती थी दाहिने मुड़ जाना होता था ।

यह खुला खुला सा इलाका इतवारी बाज़ार कहलाता था । हाट बाज़ार लगने की वज़ह से यहाँ सड़क के दोनों ओर खूब सारी खुली जगह छोड़ दी गई है । 

दुर्गा मंदिर के ठीक सामने बने चौराहे के बाद इस सड़क पर प्रवेश करते ही एक मकान के बाद दाहिनी ओर हमारा पुराना मकान है और ठीक उसके सामने सड़क की बाईं ओर नया मकान जिसे हमारे दादा ने उन्नीस सौ सत्तावन में औषधालय के लिए बनवाया था ।

पुराना मकान 
उनके निधन के बाद जैसे जैसे परिवार बढ़ता गया लोग इस मकान में भी बसते गए । दादाजी ने पुराने वाले मकान के निर्माण के समय ही सड़क के दोनों ओर नीम के पेड़ लगवा दिए थे जो उस समय तक काफ़ी बड़े हो चुके थे ।
औषधालय 
वे दिन शोर के प्रदूषण से मुक्त शांत दिन थे । मुख्य सड़क पर कभी कभार इक्का दुक्का स्कूटर या कार दिखाई दे जाती थी वर्ना वहाँ सिर्फ साइकिल की घंटियों की आवाज़ गूंजती थी जो शाम होते ही दुर्गा मंदिर से आनेवाली घंटियों की आवाज़ में मिल जाती, वहीं उसमे शामिल होती दूर किसी मस्जिद से आती अज़ान की आवाज़ । कुछ ही देर में सिन्धी गुरूद्वारे से भजन के स्वर सुनाई देने लगते ।

कृष्ण मंदिर 
उधर कृष्ण मंदिर से पुजारी जी की आवाज़ आने लगती “आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की / गले में वैजन्ती माला, बजावे मुरली मधुर बाला”
कृष्ण मंदिर के पुजारी के साथ 
उन दिनों वैजंती माला सिने जगत की एक प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं, हम बच्चों को यह बात कभी समझ में नहीं आई के वे कृष्ण जी के गले में कैसे पहुँच गईं । 
घर के सामने खुली जगह 
कृष्ण मंदिर की आतंरिक साज सज्जा तो बहुत सुन्दर थी लेकिन साठ के उस दशक तक दुर्गा मंदिर की स्थिति जंगल में बने किसी प्राचीन मंदिर की तरह ही थी ।

दुर्गा मंदिर 
बैतूल के हमारे मोहल्ले का यह दुर्गा मंदिर तब भी था जब यहाँ बस्ती नहीं थी । प्रेमचंद की कहानी ‘बांका ज़मींदार’ में बताई गई किसानों की मडैया की तरह यहाँ भी एक मडैया थी जिसके नीचे रखे एक काले पत्थर को देवी स्वरूप माना जाता था, इसलिए इसे देवी मडैया कहते थे ।
वर्तमान में दुर्गा मंदिर 
फिर धीरे धीरे इसने मंदिर का स्वरूप धारण करना प्रारंभ किया दादाजी के बाद ताऊजी इसके संरक्षक मंडल में थे । मंदिर की जीर्ण शीर्ण अवस्था को देखते हुए  शहर के गणमान्य लोगों ने मिलकर एक समिति बनाई और मंदिर के जीर्णोद्धार का जिम्मा ले लिया । समिति ने प्रयास कर शहर के धनाढ्य और श्रद्धालु लोगों से पैसा इकठ्ठा किया और मंदिर बनने लगा । तीन ओर से दुकाने निकाल दी गईं और उन्हें किराये से दे दिया गया ताकि मंदिर का निर्माण कार्य आगे बढ़ता रहे और अन्य खर्चे भी पूरे हो सकें । 
मंदिर के भीतर का दृश्य 
इस मंदिर के बारे में हम लोगों ने बहुत सी बातें सुन रखी थीं जिनमे से एक यह भी थी कि वहाँ कभी मनुष्यों की बलि चढ़ाई जाती थी । मोहल्ले के हमारे बड़े भाई लोग बहुत भयावह ढंग से उस बलि प्रथा का वर्णन भी करते थे ।  मनुष्यों अथवा प्राणियों की बलि की बात उस समय तक हम लोगों ने केवल किस्से कहानियों में ही पढ़ी थी ।

मंदिर के प्रांगण में रखी अनगढ़ सी उन प्राचीन मूर्तियों के काले पत्थरों के बीच कहीं कहीं हल्की सी लाल लाल धारियाँ दिखाई देती थीं जिनके बारे में किंवदंती थी कि वह दरारों से झाँकता हुआ बलि चढ़ाये गए मनुष्यों का रक्त है । यह तो हमें बाद में ज्ञात हुआ कि उन पत्थरों की प्राकृतिक संरचना ही कुछ ऐसी थी । यद्यपि पूरे बैतूल में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जिसने वहाँ किसी को नर बलि चढाते हुए देखा हो इसलिए इस किंवदंती पर हमें कभी विश्वास ही नहीं हुआ ৷ हालाँकि देवी को पशुबलि चढाने की प्रथा अवश्य थी जो कई वर्षों तक चलती रही लेकिन वह भी उस समय तक बंद हो चुकी थी ।

अब तो बैतूल में बालाजी पुरम नाम से एक भव्य मंदिर बन गया है जो बहुत प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका है । यहाँ कृत्रिम झरने हैं , कृतिम गुफाएं हैं और कृत्रिम मन्दाकिनी भी बनाई गई है । देश विदेश से पर्यटक यहाँ आते हैं लेकिन बैतूल शहर के पुराने लोगों का मन तो अभी कोठीबाज़ार के दुर्गा मंदिर में  माता के चरणों की वंदना में लगा रहता है वे कृष्ण मंदिर में अभी भी वही आरती गाते हैं और रामनवमी के दिन धनिया का प्रसाद खाने दौड़ जाते हैं ।

बालाजी पुरम 
बैतूल के बारे में यह भी सुना था कि बैतूल में अंग्रेज़ों से पहले के गोंड राजाओं के समय अपराधियों को सज़ा देने के लिये उनकी नाक काट कर उन्हें बदनूर कर दिया कर दिया जाता था  इसलिए इस जगह का नाम बदनूर रखा गया था । कुछ आलिम फ़ाज़िल लोगों का यह भी कहना था कि बैतूल में मुग़लों के समय सरकारी खजाना रखा जाता था । अरबी में बैतुल का अर्थ खजाना होता है इसलिए इसका नाम बैतूल हो गया ৷ हालाँकि बैतूल आदिवासी क्षेत्र था और वहाँ मुस्लिम प्रभाव नहीं था अतः इस पर विश्वास करना कठिन था । वैसे एक मान्यता यह भी थी कि अंग्रेज़ों की पसंद कपास यानि तूल वहाँ नहीं होता था इसलिए बिना कपास का क्षेत्र बेतूल कहलाया ।  


शरद कोकास 

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