6 जून 2026

48. फलीभूत हुआ दूधों नहाओ पूतों फलों का आशीर्वाद


संयुक्त परिवार बादलों से भरे उस आसमान की तरह होता है जहाँ मौत हवा के झोंके की तरह आती है और पुराने बादलों को उड़ा ले जाती है । फिर उन बादलों की जगह लेने के लिए दूसरे बादल आ जाते हैं । विश्वेश्वर प्रसाद जी के पांच पुत्रों में से सबसे छोटे चन्दनलाल और सबसे बड़े बाबूलाल के गुजर जाने के बाद उनके शेष तीन पुत्र कई बरस जीवित रहे। बाबूलाल जी से छोटे थे ब्रजलाल जी । उन्हें सब लोग ‘बड़े काका’ कहते थे । अपनी जेठानी राजरानी की तरह दादी जी का नाम राजप्यारी था, उन्हें ब्रजरानी भी कहते थे । ब्रजरानी दादी के तीन बेटों में सबसे बड़े बेटे रमेश नागपुर में रेल्वे में टी टी थे ।

संयुक्त परिवार के बच्चे जब नौकरी या रोजगार के सिलसिले में माँ से दूर चले जाते है तब माँ उनके साथ नहीं जाती। वह अपने अन्य बेटों के साथ उसी घर में रहना पसंद करती है जहाँ वह बहू बन कर आई थी । लेकिन उन बच्चों के लिए माँ की चिंता पास रहने वाले बच्चों से अधिक होती है । जब भी हम लोग भंडारा नागपुर से होते हुए बैतूल जाते, दादी माँ हम लोगों से रमेश चाचा के हाल चाल अवश्य पूछती थीं ।

प्रणय प्रभात और ब्रजरानी दादी 

रमेश चाचा का विवाह माँ की छोटी बहन लीला से हुआ था इसलिए रिश्ते में वे मेरे मौसाजी भी लगते थे । यद्यपि प्रथम सम्बन्ध के अनुसार मैं उन्हें चाचा ही कहता था । लीला मौसी तो खैर मेरी एकमात्र सगी मौसी थी ही । रमेश चाचा, मौसी, बड़े बेटे प्रभात,दो बेटियों संध्या व निशा के साथ इतवारी नागपुर में इतवारी रेलवे स्टेशन के निकट जुलाहों की एक बस्ती में रहते थे ।  छोटे बेटे प्रणय का तब जन्म नहीं हुआ था । उनसे छोटे दोनों भाई सुरेश व दिनेश बैतूल में ही रहते थे । 

रमेश चाचा व लीला मौसी 

सुरेश काका उस समय कॉलेज स्टूडेंट थे । बाबूजी के बाद उनकी पीढ़ी में प्राणिशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त कर वे पहले साइंस पोस्ट ग्रेजुएट हुए । । सुरेश काका का विवाह बाद में सन बहत्तर में महू में बिहारी लाल शर्मा जी की बेटी संतोष से हुआ और उनकी संतानें हुईं प्रतुल, तुषार और शिशिर ।

संतोष चाची और मैं 

ब्रजलाल जी के सबसे छोटे बेटे यानि दिनेश काका हम बड़े बच्चों से बहुत अधिक बड़े नहीं थे इसलिए वे हम लोगों से बहुत घुले मिले थे। 
सुरेशकाका 

ब्रजलाल दादाजी की चार बेटियों में से तारा और शीला निधन बचपन में ही हो गया था ।
छोटी बेटी छाया उस समय स्कूल में पढ़ रही थीं ।

छाया बुआ और अशोक फूफाजी 

बड़ी बेटी माया का विवाह भुसावल में श्रीनाथ शर्मा जी के साथ हो चुका था । श्रीनाथ फूफाजी रेलवे में वरिष्ठ चालक  थे । उनके बेटे राजेश और बेटी रेखा थे। उसके बाद उनसे छोटे महेंद्र,रेखा,उमा,सीमा,विमला,रवींद्र और पुष्पा हुए । उस समय छाया बुआ स्कूल में पढ़ती थीं । उनका विवाह सन उन्यासी में मुंबई के अशोक शर्मा जी के साथ हुआ जो फैशन डिज़ाईनर थे । फिर उनकी संतानें हुईं सपना और सपन । 

छाया बुआ के विवाह के पश्चात सन अस्सी में दिनेश काका का विवाह भी कामठी में हमारी बड़ी माँ हेमलता देवी की भांजी और हमारे रामप्रसाद मामा की बेटी सुमित्रा से हुआ । इस तरह से उस परिवार से हमारा दोहरा रिश्ता हो गया । कामठी मेरे बचपन की स्मृतियों में शामिल रहा  । दिनेश काका और सुमित्रा चाची की संतानें हुईं प्रवेश, निषेध और आकांक्षा । 

दिनेश काका का विवाह 

अक्सर लोग जब अपने पूर्वजों के वंश का बखान करते हैं तो उसमें केवल बेटों का ही ज़िक्र करते हैं लेकिन मैंने वंशावली बनाते हुए पितृसत्ता की इस परंपरा को नकार कर बेटियों को भी वंश में शामिल किया । बैतूल के हमारे परिवार में दादाओं के अलावा उनकी पाँच सगी बहनें यानि मेरी पाँच दादी बुआएँ भी थीं जिनके नाम थे ललता बाई, रन्नो बाई, नारायणी बाई, बिरजन बाई और इन्द्राणी बाई यानि बिट्टी बुआ। मुझे केवल बिरजन दादी बुआ और बिट्टी बुआ की याद है । गर्मी की छुट्टियों में बिरजन दादी बुआ के बच्चे यानि रज्जन काका, मुरारी काका , विपिन चाचा,  राजकुमारी व कृष्णा बुआ तथा बिट्टी बुआ की बेटी शीला भी आ जाया करते थे । यह सभी लोग नागपुर के बबूलखेड़ा के निवासी थे और हम लोगों की बैतूल के अलावा नागपुर में भी सबसे मुलाकात होती थी । 

हमारे आदि पूर्वज बलदू प्रसाद जी का यह परिवार उनके पोते के पोते विश्वेश्वर के माध्यम से बैतूल में वृद्धि कर रहा था लेकिन उनकी फतेहपुर, अमरावती और मुंबई शाखा के वंशज भी आपस में जुड़े हुए थे । हमारे दादाओं के चचेरे भाई अमरावती स्थित मेरे दादा जी  नत्थूलाल जी शर्मा के बेटे गणेश, उनकी बेटी कुसुम और उनके परिवार के बच्चे योगेश, मनीष ,आशीष, रीतेश वगैरह भी विभिन्न कालावधि में आते रहे । शादियों में तो फतेहपुर से दादा गणेश प्रसाद और उनके बच्चे राजकुमार, लक्ष्मी आदि भी आते रहे । मुंबई से रामप्रसाद बाबा  भी सपरिवार आते थे । और इनके अलावा जाने कितने रिश्तेदारों के रिश्तेदार जैसे हमारे मामा के बेटे आनंद , नंदकिशोर ब्रजकिशोर फूफाजी के भाई नवल किशोर रामदास फूफाजी के भाई भरत चाचा, लखन फूफाजी, आदि भी सपरिवार हमेशा आते रहे ।   

मेरे बचपन के उन प्रारंभिक दिनों में परिवार इतना बड़ा नहीं था इसलिए कि  बहुत सारे भाई बहनों का उस समय तक आगमन ही नहीं हुआ था । बच्चों के साथ खेलने वालों में चन्दनलाल दादाजी के एकमात्र बेटे थे किशन काका जो बुद्धि में हम बच्चों जैसे ही सहज और सरल थे । दिनेश काका, उपेन्द्र चाचा, बच्चन भैया ,संतोष व लल्ली भैया तो काफी बड़े थे । वहीं ऊषा बुआ, सरोज बुआ , छाया बुआ ,मुल्लू भैया और मधु जीजी, नांदगाँव वाले राजू भैया आदि मुझसे बड़े थे और बिन्नू भैया लगभग बराबरी के , प्रभात, भारती, राजेंद्र  व मुन्ना कक्कू कुछ छोटे  । अन्य बच्चों में सीमा के बराबर के राजू , राकेश और मनोज थे । 

१९६४  में बैतूल के बच्चे 

पता नहीं हमारे परदादाओं में से किसे किसी संत महात्मा ने दूधों नहाओ पूतों फलों का आशीर्वाद दिया था कि आठ दस बच्चे सभी दादाओं के हुए । ग़नीमत की हमारी पीढ़ी तक इस आशीर्वाद का प्रभाव समाप्त  हो गया वर्ना बहुत मुश्किल हो जाती । फिर चाचाओं और बुआओं की शादियाँ होती गईं और घर फलता फूलता गया ।सारे बच्चे गर्मियों में बैतूल में इकठ्ठा होते थे । इस तरह लगभग तीस पैंतीस लोगों के इस संयुक्त परिवार की गर्मी की छुट्टियों में सदस्य संख्या पचास साठ के लगभग हो जाती थी । खेलने के लिए जगह की कमी नहीं थी, दो मकान, बीच में बहुत सारी खुली जगह ,खुला खुला सा मोहल्ला और घर के पास ही खेत । 

अब मल्टी स्टोरी बिल्डिंग के फ़्लैट सिस्टम और सोसायटी में रहने वाले बच्चे उन बच्चों की तरह बचपन के दिनों का अनुभव नहीं कर सकते जब किताबें और कापियाँ गठ्ठर बंधकर रख दी जाती थीं । अब लोगों के घर जितने छोटे हो चले हैं मन उससे भी छोटे । इसमें कुछ अस्वाभाविक नहीं हैं । रोजी रोटी के लिए बच्चे घर से बाहर जा रहे हैं इसलिए एकल परिवार बनना अनिवार्य है । बस ज़रूरी है कि इन परिवारों की जड़ें कहीं गांवों, कस्बों या नगरों में सुरक्षित रहें ताकि इनके बच्चे भी बड़े होकर कह सकें कि हम भी गर्मी की छुट्टियों में अपने दादा या नाना के यहाँ जाते थे ।   

शरद कोकास 

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