5 जून 2026

47. बैतूल : बैतूल के शर्मा भोजनालय और लल्ली होटल से आती खुशबू

शर्मा पूड़ी भंडार यहीं था 
रेस्टारेंट,कैफ़े,क्लब,बार आदि का चलन शहरों में आज सामान्य बात है लेकिन पचास साठ के उस दशक में छोटे शहर के लोगों के लिए यह केवल शब्द थे जो गुलशन नंदा, रानू, राजवंश के सामाजिक उपन्यासों या सुरेन्द्र मोहन पाठक, ओमप्रकाश शर्मा आदि के जासूसी उपन्यासों में दिखाई दे जाते थे । ब्लैक एंड वाइट सिनेमा के लाइट डार्क शैडो में, होटल में लगी टेबलों के  इर्द गिर्द सिगरेट के धुएँ के बीच ‘बाबूजी धीरे चलना’ या ‘मेरा नाम चिन चिन चू’ जैसे गीतों पर नृत्य करती हुई बालाएं भी किसी स्वप्न दृश्य की तरह सिर्फ सिनेमा के परदे पर दिखाई देती थीं । 

बैतूल के लोगों की उस दौर में भी ऐसी कोई चाहत भी नहीं  थी । वे शहर के हृदय स्थल में स्थित शर्मा भोजनालय और लल्ली होटल के पुराने कुर्सी टेबलों या बेंचों पर बैठकर, भट्टी के हल्के हल्के धुएँ के बीच ,भोजन में दाल, रोटी,और नाश्ते में समोसा कचोड़ी खाकर ही संतुष्ट थे । 

शर्मा भोजनालय आज़ादी के पूर्व  से ही अस्तित्व में आ चुका था । उस समय बैतूल शहर में बिजली भी नहीं आई थी और रौशनी के लिए कुछ कंदीलों का ही सहारा था । भोजनालय के संचालक भगवान दत्त शर्मा जी अपनी जीवन संगिनी श्रीमती चन्द्रकला शर्मा के संग उसी इमारत में दुकान के ऊपर निवास करते हुए बैतूल के उन लोगों की भूख मिटाने का इंतज़ाम करते थे जिनके यहाँ तात्कालिक अथवा स्थायी रूप से चूल्हा जलने की गुंजाईश नहीं थी । उनका यह भोजनालय घर जैसे भोजन के लिए प्रसिद्ध था ।

लल्ली चौक 

प्रतिदिन सुबह उनके भोजनालय में भठ्ठी जलाकर उसमे प्राण फूंके जाते फिर उस पर कढ़ाई चढ़ा दी जाती । इधर गरमागरम पूड़ियाँ छानी जाने लगतीं और उधर हींग, जीरा, राई जैसे हलके फुल्के मसालों के साथ हरी धनिया की खुशबू  से महकती आलू की रसेदार सब्जी तैयार हो जाती । चटनी और रायता भी साथ साथ बनने लगता । यह दिव्य भोजन जिसे चखने का सौभाग्य प्राप्त होता था वह अपने आप को धन्य समझता । 

वहीं घर जैसा भोजन चाहने वालों के लिए भठ्ठी पर तुरंत तवा चढ़ाया जाता और माता जी उस पर नर्म नर्म फुलके सेंककर अन्नपूर्णा की तरह बच्चों का पेट भरने के उपक्रम में जुट जातीं  । चाय और नाश्ते का प्रबंध तो हर समय रहता ही था । 

शर्मा जी के यहाँ की पूड़ी सब्ज़ी इतनी प्रसिद्ध थी कि बाद में उनके बेटे श्याम प्रकाश ने बस स्टैंड के सामने ‘शर्मा पूड़ी भंडार’ के नाम से ही नई होटल प्रारंभ की ।  भगवान दत्त जी का यह छोटा सा संसार था जिसमे उनकी छह बेटियां प्रेमलता,आशालता,उर्मिला,रूपा,शोभा,लाजो और दो बेटे श्याम प्रकाश और जय प्रकाश भी शामिल थे ।

लल्ली होटल और पुराना शर्मा पूड़ी भण्डार 
शर्मा जी की होटल से लगी थी ललित पुरोहित की होटल जो लल्ली सेठ की होटल के नाम से पहचानी जाती थी । इस होटल में दिन भर गरम समोसे,कचोड़ी,आलूबोंडे व जलेबी उपलब्ध रहते थे ।

चाय भी यहाँ की ख़ास हुआ करती थी । सुबह का दृश्य देखने लायक होता था, एक सपाट तल वाली कढ़ाई भठ्ठी पर चढ़ा दी जाती एक कारीगर एक कपड़े में ख़मीर वाला मैदे का घोल लेकर उसे गोल गोल घुमाता और जलेबियाँ छनने लगतीं ।
गर्मी के उन दिनों में दिनेश काका मुझे सुबह सुबह लल्ली सेठ की होटल में ले जाते थे और कुरकुरी जलेबियों का नाश्ता करवाते थे । समोसे कचोड़ी के साथ दी जाने वाली चटनी यहाँ की बहुत स्वादिष्ट हुआ करती थी । बाद में यह होटल लल्ली सेठ के बेटे सुभाष पुरोहित ने संभाल ली थी ।

साल भर धूम धाम से चलने वाली यह होटलें गणेशोत्सव के दस दिनों में बंद कर दी जाती थीं इसलिए कि इन दस दिनों में यहाँ गणेश जी की प्रतिमा की स्थापना की जाती थी ।  दस दिनों तक पूजा-अर्चना के बाद, अनंत चतुर्दशी को गाजे-बाजे और विशाल चल समारोह के साथ प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। बैतूल की माचना नदी के कर्बला घाट व अन्य विसर्जन घाटों पर जिला प्रशासन और नगर पालिका द्वारा विशेष सुरक्षा और क्रेन की व्यवस्था की जाती है।

विशेष बात यह कि लल्ली सेठ और भगवान दत्त शर्मा जी में इस बात पर स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा होती कि इस बार किसकी मूर्ति की ऊंचाई अधिक है । प्रतिमा निर्माण के समय जासूस लगे रहते थे लेकिन कोई नहीं जान पाता था कि इस बार किसकी प्रतिमा कितनी ऊंची है । हालाँकि मूर्तियाँ मध्यम कद की ही होती थीं, लेकिन जिसकी मूर्ति एक इंच भी ऊँची निकल जाती तो पूरे दस दिन उसकी ठसक देखने लायक होती थी । 

इस गणेशोत्सव का उद्देश्य केवल मूर्तियाँ स्थापित कर उनकी पूजा करना नहीं होता था बल्कि यह एक सांस्कृतिक उत्सव होता था । इन दस दिनों में शर्मा जी और लल्ली सेठ विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करते थे जिनमे प्रतिदिन होने वाले झाँकी प्रमुख थी । पुराण कथाओं पर आधारित इन झाँकियों  में अक्सर शर्मा जी के बच्चे ही नया रूप  धारण करते, श्याम विष्णु बन जाते तो उर्मिला देवी लक्ष्मी, शोभा, रूपा, लाजो वगैरह चाँद सितारे बनकर खड़े हो जाते ।


फिर कार्यक्रमों में नृत्य, गीत, भजन आदि का भी शुमार होता । भगवान दत्त जी के बड़े दामाद जगदीश शर्मा जो कोटा राजस्थान में बाबा कव्वाल के नाम से मशहूर थे, अपनी मंडली सहित बैतूल आ जाते और फिर गणेश जी के दरबार में कव्वाली की वो  महफ़िल रंग लाती जिसमे पूरा बैतूल शामिल हो जाता । शर्मा जी रंगमंच के कलाकार भी थे सो वे भी अपना फ़न दिखाते  ।

समय पंख लगाकर उड़ जाता है और स्मृतियों में अवशेष शेष रह जाते हैं । आज यह दोनों ही होटलें यहाँ नहीं हैं । तिगड्डे पर बनी रवींद्र गोठी जी की इस इमारत का रिनोवेशन हो चुका है । शर्मा भोजनालय और  लल्ली सेठ के होटल की जगह अब यहाँ ज्वेलरी शॉप और रेडीमेड कपड़ों के अत्याधुनिक शो रूम हैं । इस इमारत में स्थित पुरानी दुकानों का अहसास दिलाती सिर्फ मुलुक की पान की दुकान और लक्ष्मण का सेलून भर शेष बचा है ।


लक्ष्मण के यहाँ का भी जवान बेटा विगत दिनों कोरोना की भेंट चढ़ गया । शर्मा जी और माता जी अब स्मृतिशेष हैं और उनके बच्चे भी दादा दादी नाना नानी बन चुके हैं ।
शर्मा जी की बेटी शोभा दामाद यशवंत नाती सुमित और नत बहु  प्रीती 

शरद कोकास 


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