10 जून 2026

159 . माता पिता जैसे ही होते हैं दोस्तों के माता पिता


 

बचपन मे अपने क्लासमेट्स के पिता अक्सर हमे अपने पिता से अधिक अच्छे लगते हैं ? शायद इसलिए कि वे हमारे सामने अपने बेटे को कभी डाँटते नहीं । हमारे पिता भी तो हमारे दोस्तों के सामने हमे नहीं डाँटते। फिर कभी किसी दिन अपने पिताजी से डांट खाने के बाद जब हम दोस्त के सामने उसके पिता की प्रशंसा करते हैं तो वह कहता है .. “रहने दे यार.. तेरे सामने भर नहीं डाँटते, वर्ना वैसे तो मेरी खटिया खड़े किये रहते हैं ।“ हम कहते हैं “ हाँ यार , मेरे पिताजी भी ऐसे ही ...। ” मतलब कुल मिलाकर पापा लोगों का इम्प्रेशन समाप्त  । 


वैसे हमारे ज़माने में ऐसा बहुत कम होता था । बहुत कम पिता ऐसे होते थे जो अपने बेटे के दोस्त के सामने संयम रख पाते थे । हालाँकि उनके डांटने में उतनी तीव्रता नहीं होती थी । अब जरा उस ज़माने के पिता लोगों के संवाद सुनिए “ देखो, तुम्हारे दोस्त को, कितना बढ़िया है पढ़ने लिखने में, और एक तुम हो फिसड्डी ,कुछ सीखो अपने दोस्त से। “ लो हो गई न इज्जत की किरकिरी ।


वहीं कुछ पिता बेटे के दोस्त से मिलने पर डाँटते नहीं थे बस अपने पराक्रम गिनवाया करते थे “अभी नई ड्रेस लेकर दी है इसे , साइकिल भी खरीदी है , इसने कहा ट्यूशन लगवा दो तो वो भी लगवा दी है और क्या चाहिए ।“ हो गया आपका काम । अब ग़लती से कहीं आपने अपने पिता के सामने दोस्त के पिता के पराक्रम की तारीफ कर दी तो सुन लीजिये अपने पिता से व्याख्यान “ अरे, उसके फादर को जानता हूँ मैं , सरकारी विभाग में है, खूब ऊपर का पैसा आता है, मेरे पास तुम्हारे ऊपर खर्च करने के लिए फालतू का पैसा नहीं है ।“


कुछ दोस्तों के पिता जो मजदूर हुआ करते थे, कहीं कारपेंटर, कहीं मोटर मेकैनिक, तो उन्हें चिंता ही नहीं होती थी अपने बच्चों के कैरियर की । बच्चे अपने दोस्तों का परिचय पिता से करवाते तो वे एक उचटती हुई निगाह उन पर डालते और अपने काम में लग जाते  ।


मुझे अपने जिन दोस्तों के पिताओं की याद है उनमे सबसे पहले है नानकचंद पंजाबी , जिसके पिता की भंडारा में मेन रोड पर किराने की दुकान थी । दुकान के ऊपर ही उनका निवास था । वे सफ़ेद पायजामा कमीज़ पहनते थे और गद्दी पर बैठे रहते थे । उनकी दुकान पर मेरी निगाह उनकी ओर कम और कांच के बरनी में रखी चॉकलेट की ओर अधिक रहती थी । वे नानक को जाने क्या इशारा करते, नानक बर्नी में से चार चॉकलेट निकालता और एक मुझे थमाकर एक खुद खाता और दो जेब में रख लेता । अगर बच गई तो वह हमारे अगले दिन के लंच टाइम में काम आती । ऊपर जाने पर नानक की माँ से भी मुलाकात होती ।


सुरेन्द्र के पिता मंगलदास जी चड्ढा को जब मैंने देखा तो वे पीतल के बर्तन बनाने की फैकट्री में दहकती हुई भठ्ठी के सामने खड़े थे । बस उनसे नमस्ते हुई लेकिन बातें कभी नहीं हुई । हाँ सुरेन्द्र की माताजी से मैं जरुर बात करता था।  वे लोग मेटल वर्क्स के परिसर में ही बने एक क्वार्टर में रहते थे । बाद में सुरेन्द्र के पिताजी ने साझेदारी में स्वयं का व्यवसाय शुरू किया और वे मजदूर से मालिक हो गए । लेकिन उनका वह मेहनत कश वाला रूप मैं कभी नहीं भूलता । केदारनाथ अग्रवाल की कविता “मैंने उसको /जब जब देखा /लोहा देखा /लोहे जैसा /तपते देखा /गलते देखा /ढलते देखा” पढ़ता हूँ तो मुझे मंगलदास चाचा की ही याद आती है ।


रूपचंद के पिता ज्ञानचंद जी उन दिनों भंडारा के छोटा भाई जेठाभाई बीड़ी कारखाने में मुनीम थे । यह कारखाना स्कूल के पास ही था । रूपचंद के साथ लंच टाइम में मैं अक्सर उनसे मिलने जाया करता था । अब वहाँ चॉकलेट तो होती नहीं थी और बीड़ी पीने की उम्र तक हम लोग पहुंचे नहीं थे इसलिए रूपचंद के पिता अपनी जेब से एक चवन्नी निकालकर हमें देते जिसका उपयोग हम लोग स्कूल के लंच टाइम में उबले हुए बेर, मुरमुरे के गुड़ वाले लड्डू जैसी चीजें खरीदने में करते ।


इशुप्रकाश स्कॉट के पिताजी मुझे फ़िल्मी दुनिया के ओमप्रकाश की तरह लगते थे । बाद में जब ‘जूली’ फिल्म देखी तो उनकी बड़ी याद आई । जब भी बड़े बाज़ार स्थित  उनके घर जाता वे ईसामसीह की तस्वीर के सामने मोमबत्ती लगाते हुए मिलते और मेरे लौटते समय बाइबिल की कहानी वाला एक रंगीन पिक्चर कार्ड मुझे थमा देते ।


अमर सिंह खत्री के पिताजी की बेकरी थी । उनके घर जाने पर भठ्ठी से आती हुई सिंकती हुई डबलरोटी की वह गंध मुझे बहुत अच्छी लगती थी । अमर की माताजी एक सीधी सादी पंजाबी घरेलू महिला थीं । वे मुझे झट से बरनी से उनकी बेकरी में बने कुरकुरे बिस्कुट निकालकर देतीं ।  आज भी किसी बेकरी के पास से  गुजरते हुए वहाँ से आती सोंधी गंध में मैं उन्हें याद करता हूँ । 


घनश्याम के पिता हेमनदास जी कौरानी की सिंधी कॉलोनी में राशन की दुकान थी । उनसे भी बस मुलाक़ात थी लेकिन बातें कभी नहीं हो पाई । हेमनदास जी के पिता का परिवार भी बहुत सारे सिन्धी और पंजाबी परिवारों की तरह विभाजन के समय भारत आ गया था । सभी सिंधी परिवारों को भंडारा में शहर से बाहर एक कॉलोनी में बसाया गया था । यह कॉलोनी मेरे घर से बहुत दूर थी इसलिए वहाँ जाना बहुत कम होता था ।

 

सबसे अधिक मेरा सामना नईम के पिता जी से हुआ । नईम के पिता जनाब मुनीर खान महाराष्ट्र शासन के लोक निर्माण विभाग में कार्यरत थे । कद में काफी ऊँचे पूरे । स्कूल से घर आते हुए मैं अक्सर उनके यहाँ रुक जाता था । वे हमसे हमारी पढ़ाई के बारे में और टीचर्स के बारे में पूछा करते । बाद में उन्होंने एक लकड़ी टाल भी डाली थी जहाँ मैं और नईम  बैठकर पढाई किया करते । हर ईद को उनके घर जाना तय था । बाबूजी से भी उनकी मुलाकात थी और जब भी उनके यहाँ जाता वे उनके हालचाल जरुर पूछते । बाद में जब स्टेट बैंक कालोनी में बाबूजी ने अपना मकान बनाया तो दोनों ने पास पास ही प्लाट लिया । नईम की माँ बचपन में ही गुजर गई थीं इसलिए वे अपने तीनो बेटों नईम,अलताफ़, सैफ़ और बिटिया शाहीन का बहुत ख्याल रखते थे । उन्होंने बच्चों को कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी ।


भगवान रहाटे मेरे साथ स्कूल में नहीं पढ़ता था लेकिन पड़ोस में ही उसका घर था इसलिए उसके यहाँ जाना बहुत होता था ।भगवान के पिता दयाराम जी उसके बचपन में ही गुजर गए थे और उसकी माँ बीड़ी बनाकर अपने तीनो बच्चों को पाल रही थी । उनका घर खपरैल वाला एक कच्चा घर था । भगवान के घर पहुँचते ही सबसे पहले दीवार पर टंगी गौतम बुद्ध और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की तस्वीर दिखाई देती । भगवान की माँ जिन्हें मैं मावशी कहता था मुझे बहुत चाहती थीं और जब भी मैं  उनके घर जाता वे बिना कुछ खिलाये मुझे जाने नहीं देती थीं । उनके घर की भाखरी और चटनी का स्वाद अभी भी जिव्हा पर है ।


यह वह ज़माना था जब क्लास के लड़कों के पिताओं से तो उनके घर जाने पर मुलाकात हो जाती थी लेकिन लड़कियों के पिताओं से मिलने का मौका बहुत कम आता था । आज बच्चे क्लासमेट्स पहले होते हैं और लड़का लड़की बाद में, लेकिन उस समय यह इतना आसान नहीं होता था । यह लड़का घर क्यों आया था ? इतनी देर क्यों रुका था ? कॉपी के लिए कोई दूसरा दोस्त नहीं मिला क्या ? यहीं सबके सामने बैठकर बात क्यों नहीं करता ? जैसे ढेरों प्रश्न ।


ग़नीमत कि पिताओं की ऐसी परम्परा होने के बावजूद मुझे अपनी क्लासमेट्स के ऐसे पिताओं से सामना नहीं करना पड़ा । ज़्यादातर छात्राओं के भाई हमारे साथ स्कूल में पढ़ा करते थे, भले ही वे अन्य क्लास में हों । अमरसिंह की बहन शांता हमारी क्लास में ही थी और नानक की बहन हर्ष बाला भी । विनोद का छोटा भाई एक दो क्लास पीछे था और अर्चना का भाई विनय भी ।


इनमें सबसे अधिक मेरा जाना अर्चना के घर ही हुआ । अर्चना जब पहली बार हमारे घर आई उसने मेरी माँ को मौसी कहकर पुकारा । मैं भी उसकी माँ को मौसी कहने लगा । इस तरह एक पारिवारिक रिश्ता कायम हो गया । अर्चना के पिता श्री मधुसूदन लाल जी श्रीवास्तव भंडारा में नायब तहसीलदार के पद पर कार्यरत थे । वे बहुत रौबीले दिखाई देते थे और मुझे उनका सामना करते हुए कुछ झिझक सी होती थी । हालाँकि ऐसा बहुत कम होता था कि मैं उनके घर जाऊँ और उनसे मुलाकात हो जाये । उनके घर जाने पर कभी कभी वे आंगन में बैठे मिलते थे । मैं उनसे नमस्ते करता था और झट घर के भीतर चला जाता । उनसे मेरा सम्वाद लगभग नहीं के बराबर था इसलिये उनसे थोड़ा डर भी लगता था । फिर अनेक बार उनसे मुलाकात हुई लेकिन संवाद बस उतने ही रहे जितने थे यानि कि बस 'नमस्ते' ।


हाँ, अर्चना की माँ जिन्हें मैं मौसी कहता था और उनकी बड़ी बहन इंदिरा जिन्हें मैं दीदी कहता था उनसे मेरी बहुत पटती थी । इन्ना दीदी बहुत सुन्दर थीं लेकिन बचपन से ही पोलियोग्रस्त थीं । मैं जब भी उनसे मिलता तो वे अपना सारा स्नेह मुझ पर उंडेल दिया करती थीं । मौसाजी यानि मधुसूदन लाल श्रीवास्तव जी का निधन सन 1994  में गोंदिया में हुआ । उनकी तेरहवीं की सूचना मिलते ही मैं  गोंदिया गया था । अर्चना के पुराने मकान में बीच के कमरे में उनकी तस्वीर रखी थी । उन्हें देख कर मुझे लगा अरे.. वे तो कितने सौम्य थे । मैं व्यर्थ ही उनसे खौफ़ खाता रहा । अर्चना का भाई विनय हम लोगों से दो साल पीछे गाँधी विद्यालय का ही छात्र था । विनय से छोटे भाई का नाम अभय है । 


आज इनमे से किसी दोस्त के माता पिता अब इस दुनिया में मौजूद नहीं हैं, और तो और घनश्याम,नानक और इशुप्रकाश भी अब दुनिया में नहीं हैं उनका असामयिक निधन हो गया । भंडारा के दोस्तों में सबसे बराबर संपर्क बना रहा अमर,नईम और अर्चना से अब भी मुलाक़ात होती है । बचपन में अर्चना और मैं  अपने  अपने नोट्स शेयर करते थे और कोशिश करते थे कि दोनों ही क्लास में सबसे आगे रहें । एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा के अलावा हम लोग यह भी पता लगाया करते थे कि कौन कितनी पढ़ाई कर रहा है । इस तरह से हम दोनों का एक गुट बन गया था । वैसे कक्षा में हम चार पाँच छात्र छात्राओं के बीच ही यह प्रतिस्पर्धा होती थी मैं ,अर्चना ,नईम, इशरत सुल्ताना और ज़ोहरा अंजुम । पढ़ाई के अलावा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों , भाषण स्पर्धा आदि में भी हम लोग भाग लेते थे । 


स्कूल के दिनों में बने रिश्ते इस उम्र तक बने रहें ऐसा बहुत कम होता है । हमारा रहन सहन, जीवन शैली, पारिवारिक स्थिति, विचारधारा सब कुछ बदल जाता है । माता पिता केवल स्मृतियों में शेष रहते हैं और शेष रहता है बचपन का वह प्रेम, वह सहजता, वह भोलापन, वह सच्चाई, जिसके संस्कार हमें अपने माता पिता से मिले होते हैं ।


ऐसे सभी माता पिता को मेरा सादर नमन ।



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