10 जून 2026

160 भट्टी की आग में जलता हुआ कोयला हूँ




महादेव कलई वाला – मेरा बचपन महाराष्ट के भंडारा नामक शहर में बीता है । भंडारा यद्यपि उन दिनों ज़िला बन चुका था लेकिन वह एक बड़े कसबे की तरह ही था । उन दिनों स्टील के बर्तन चलन में आ चुके थे लेकिन भंडारा में पीतल के बर्तन बनाने का गृहउद्योग था इसलिए पीतल के बर्तन अपेक्षाकृत सस्ते थे । तमाम घरों में पीतल के गंज ,गुंडी ,थाली ,लोटे और गिलास का उपयोग होता था । लेकिन पीतल के बर्तन में एक असुविधा यह थी कि खाना पकाने के उनमे कल करवाना ज़रूरी होता था बगैर कलई किये खाना या दूध खराब हो जाने की संभावना रहती थी । दुकान से जब लोग बर्तन खरीदते थे तो उसमे कलई नहीं होती थी वह करवानी पड़ती थी ।उन दिनों भंडारा में एक ही व्यक्ति था जो कलई  किया करता था  उसका नाम महादेव था ।


हमारे यहाँ भी महादेव आता था और एक रुपये में सोलह बर्तनों में कलई करता था । अक्सर हमारे घर के आंगन में ही अपनी भट्टी लगाता था । सबसे पहले वह ज़मीन को पानी से गीला करता और उसमे एक छोटा सा गढ्ढा खोदता फिर उसमें एक धौंकनी का पाइप नुमा मुँह घुसा  देता और उसी गढ्ढे से निकली हुई मिट्टी को गीली कर उस मुंह को दबा देता । जहाँ धौंकनी का मुँह खुलता था वहाँ वह लकड़ी का कोयला रखता था । 


कोयले की तरह काले रंग का महादेव सफ़ेद टोपी पहने जब अपने थैले से कोयले निकालता तो हम उसके चेहरे की ओर देखते और कोयले के रंग से उसकी तुलना करते । महादेव हमारे मन के भाव समझ जाता और हंसकर कहता ..”बच्चों भट्टी की इस आग में जलकर मैं भी कोयला हो गया हूँ .. एक दिन राख भी हो जाऊँगा ।“ हम बच्चे एक श्रमिक का यह जीवन दर्शन कहाँ समझ सकते थे। 


महादेव हँसता फिर थोड़े से कपास में माचिस से आग लगाकर उस कोयले पर रख देता । जैसे ही वह धौंकनी का पहिया घुमाता पाइप से हवा निकल कर कोयले तक पहुँच जाती और कोयले पहले थोड़ा सा धुआं देते फिर आग पकड़ लेते । बरसों बाद जब मैंने पहली बार दुष्यंत का यह शेर पढ़ा ..” इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो , जब तलक खिलते नहीं यह कोयले देंगे धुंआ “सच कहूँ तो मुझे उस वक्त महादेव कलई वाले की वह धौंकनी ही याद आई 


महादेव कलई वाल फिर उन धधकते हुए कोयलों पर एक एक कर थाली, लोटा,गिलास,गंजी या उस बर्तन को औन्धा करके रखता जिस में कलई करना होता । जैसे ही वह बर्तन भीतर से गरम होता उसके भीतर उगते सूरज की रक्तिम आभा दिखाई देने लगती । फिर वह उसे संसी से पकड़कर उठाता और उसमें नौसादर का सफेद पाउडर छिड़कता जिसके छिड़कते ही धुएं का एक बादल भीतर से बाहर निकल आता । फिर वह  अपने झोले से निकेल का एक चमकीला तार निकालता और उसका एक सिरा उस बर्तन के भीतरी भाग पर रगड़ता जिससे थोड़ा सा निकेल पिघलकर उस बर्तन में लग जाता । हमें यह दृश्य काले आसमान में बिजली चमकने की तरह दिखाई देता । 


इसके बाद  महादेव अपने झोले से काली सफ़ेद रूई का एक पुलिंदा निकालता और उसे हाथ से पकड़कर उस पिघले हुए निकेल को नौसादर पाउडर के साथ बर्तन के भीतरी हिस्से में तेजी से फैला देता । फिर वह उस गर्म बर्तन को पानी से भरी बाल्टी में डुबो देता जिसके डूबते ही छन्न से आवाज़ आती और ढेर सारी खुशबूदार भाफ निकलती । फिर वह बर्तन हमें दिखाता ,उसकी भीतरी चमक देखकर हम लोगों के चेहरे पर  भी चमक आ जाती । अंत में वह उसे उठाकर अलग रख देता और फिर दूसरा बर्तन उठा लेता । हमें यह सब कुछ किसी जादू की तरह लगता था ।


इस तरह वह एक एक कर सारे बरतनों में कलई करता था । महादेव मोहल्ले में सिर्फ हमारे आँगन में ही अपनी भठ्ठी लगाता था इसलिए मोहल्ले के अन्य लोग भी अपने अपने बर्तन कलई के लिये वहाँ ले आते थे और लगभग तीन -  चार घंटे का कार्यक्रम हमारे यहाँ हो जाता था । महादेव के जाने के बाद हम उसके द्वारा छोड़ी हुई मिट्टी और राख में निकेल के पिघले हुए गोल गोल छर्रे ढूंढते थे । गर्म बर्तन में नौसादर छिड़कते हुए जो भाफ उठती थी उसमें एक अजीब सी गन्ध होती थी और उस वक़्त महादेव का चेहरा बिगड़ जाता था ।

उसका वह चेहरा अब भी मुझे किसी न किसी मजदूर के चेहरे में दिखाई दे जाता है ।


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