10 जून 2026

161 उसकी आँखों के आगे गहराता अँधेरा



बैतूल से आनेवाली झाँसी नागपुर पैसेंजर सुबह सुबह ही हमें नागपुर स्टेशन पर उतार देती थी । वहाँ से भंडारा आने के लिए लगी लगाई ट्रेन मिलती जो एक घंटे में भंडारा रोड स्टेशन पर उतार देती । वहाँ से  स्टेट ट्रांसपोर्ट की  बस पकड़कर हम लोग भंडारा शहर आ जाते । गांधी चौक से हमारा घर पास ही था इसलिए हम लोग बस स्टैंड जाने की बजाय वहीं उतर जाते ।


बाबूजी को बस से उतरता देखकर वह तुरंत लपक कर आता और बाबूजी को “आइये गुरूजी” कहकर अभिवादन करता । टीन की पेटी वह अपने दोनों बलिष्ठ हाथों में उठा लेता और अपने रिक्शे तक ले जाता । फिर रिक्शे के फर्श पर पेटी जमा देता और थैलियाँ रिक्शे की फ्रेम में लगी खूंटियों पर टांग देता । फिर वह मुझे गोद में उठा  लेता और जैसे ही माँ बाबूजी रिक्शे में बैठते वह मुझे माँ की गोद में थमा देता ।


बाबूजी उसके चेहरे की बेचारगी पढ़ लेते थे “ क्यों सहदेव, लगता है तुम्हे आज सुबह से कोई सवारी नहीं मिली ?” “कहाँ गुरूजी, बस आप ही से बोहनी कर रहा हूँ ।“ बाबूजी उससे कभी मोल भाव नहीं करते थे, वे जानते थे यह गरीब रिक्शेवाला उनसे अधिक पैसे नहीं लेगा । कभी पूछते तो कहता “ जो मन हो वो दे देना गुरूजी , आपका ही रिक्शा है ।“


भंडारा में उन दिनों साइकल रिक्शे का चलन था और बस स्टैंड के अलावा गांधी चौक पर उनका अड्डा हुआ करता था । रेल्वे स्टेशन से आनेवाली बस मुसाफिरों को मनरो स्कूल चौक ,गांधी चौक या बस स्टैंड पर छोड़ देती थी । वहाँ से शहर के भीतरी हिस्सों में जाने के लिये रिक्शा ही एक मात्र साधन था । इसके अलावा भी लोग शहर के भीतर एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले जाने के लिए रिक्शों का ही उपयोग करते थे ।


“और सुनाओ, भंडारा के क्या हालचाल हैं ? बाबूजी का पहला सवाल होता । सहदेव रिक्शे पर पाईडल मारते हुए कहता “सब ठीक चल रहा है  गुरूजी । इस साल तो गर्मी बहुत थी हालत ख़राब हो गई , नल में पानी भी बहुत मुश्किल से आता था, बाकी तो सब ठीक है ।“ 


“अच्छा” बाबूजी कहते “और ?” और क्या गुरूजी इस बार डिलेवरी के टाइम घरवाली की तबियत बहुत ख़राब हो गई थी, सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाए थे, मरते मरते बची ..और बाकी तो सब ठीक है । ऐसे ही बाकी तो सब ठीक है, कहते हुए वह भंडारा के हाल सुना देता, किसके घर में बच्चे का जन्म हुआ, किसके यहाँ किसकी मृत्यु हुई, आदर्श और श्रीकृष्ण टाकीज में कौन कौन सी पिक्चर लगी, कौनसी उसे अच्छी लगी कौनसी ख़राब ऐसी जाने कितनी बातें ।


इतने में पोस्ट ऑफिस से पहले वाला चढ़ाव आ जाता । चढ़ाव पर रिक्शा बहुत मुश्किल से खिंचता था । सहदेव पूरा जोर लगाकर जैसे ही पाईडल पर खड़ा होता, बाबूजी कहते “रुको रुको” और तुरंत रिक्शे से उतर जाते और रिक्शे के पीछे जाकर धक्का लगाने लगते । बाबूजी इस बात के सख्त खिलाफ थे कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को ढोकर ले जाये । लेकिन मजबूरी थी, इसके अलावा वहाँ कोई और साधन न था । इसलिये कई बार वे सामान के साथ  हम लोगों को बिठा देते और पूरे रास्ते पैदल ही चलते थे ।


सहदेव हमारे घर के पास ही रहता था और बुलाने पर तुरंत ही आ जाता था । इसलिए कई बार मुझे बालक मंदिर ले जाने वाले श्रावण के न आने पर वह मुझे बालक मंदिर भी छोड़ आता था और पैसे भी नहीं लेता था। वह कहता “बच्चे तो भगवान का रूप होते हैं, मेरे रिक्शे में भगवान बैठ गए और मुझे क्या चाहिए ।“ 


मैं धीरे धीरे बड़ा होता गया । सहदेव अब बूढ़ा होने लगा था । जब मैं भंडारा से बाहर पढ़ने गया तो छुट्टियों में घर लौटता था । बस स्टैंड पर मेरी आँखे सहदेव की तलाश करती थीं लेकिन वह जाने कहाँ होता । वैसे भी उन दिनों ऑटोरिक्शा चलने लगे थे और रिक्शे का चलन कम हो गया था। 


बरसों बाद मेरे विवाह के पश्चात एक बार जब मैं भंडारा गया तो उससे मुलाकात हुई थी । वह बूढ़ा हो चुका था । मुझे और लता को उसने रिक्शे में बैठाया । उसके मुँह से शराब की तेज़ गन्ध आ रही थी । स्टेट बैंक कॉलोनी स्थित हमारे मकान तक पहुँचने के पहले वह एक स्थान पर रुका और ‘ अभी आता हूँ। ’ कहकर एक गली में चला गया । पाँच मिनट में ही वह वापस आ गया । मैं समझ गया वह गली में देसी शराब पीने गया था ।


लौटकर उसने मुझे देखा और कहा .. “क्या करूँ बाबा, अब तो यह चोबीस घंटे की साथी है, बिना इसके रिक्शा खींच ही नहीं पाता । “ मुझे उसकी हालत देखकर तकलीफ़ हुई । मैंने उसे कहा ... “ छोड़ दो सहदेव इसे, यह तुम्हारी जान ले लेगी। “


 “जानता हूँ बाबा .. लेकिन क्या करूँ छूटती ही नहीं, अब तो आखिरी समय तक यह साथ ही रहेगी। उसके बाद काफी देर तक हम लोगों के बीच एक मौन पसरा रहा । मुझे बार बार लग रहा था शायद यह अंतिम बार है जब मैं इसके रिक्शे में बैठ रहा हूँ । घर पहुँच कर रिक्शे से उतरते हुए मैंने सहदेव से कहा “जो भी हो यह अच्छी चीज़ नहीं है इसे छोड़ दो “ उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया । चुपचाप जेब में पैसे रखे और रिक्शा मोड़कर चला गया ।


बरसों बाद मैंने सहदेव पर एक कविता लिखी 


उसके पाँवों में इकठ्ठा ताकत 

शाम को रोटी बन जायेगी 

माथे से टपकता पसीना 

नन्हे बच्चे के लिये दूध 

आँखों के आगे गहराता 

नसों से निकलता अन्धेरा 

गवाह रहेगा 

आनेवाली खुशहाल सुबह का 


रिक्शे की गुदगुदी सीट पर 

बैठने का सामर्थ्य रखने वाले लोग 

राह चलते रोएँगे 

खाली जेबों का रोना 

समय काटू बातों के बीच 

पूछेंगे शहर के मौसम 

और सिनेमा हॉल में लगी 

नई फिल्म के बारे में 

खस्ताहाल सड़कों को लेकर 

शासन को गालियाँ देते हुए 

उतरते वक़्त थमा देंगे 

रेज़गारी के साथ 

उसके लुटेरे होने का प्रमाणपत्र 


वह जानता है 

इन थुलथुल व्यक्तियों के पास 

लिजलिजी दया के अलावा 

और कुछ नहीं है ।



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें