11 जून 2026

162 शोले वाले हरीराम से अच्छे एक्टर थे फत्तूजी



आप लोगों ने जादूगर का वह शो देखा होगा जिसमे वह टेबल पर एक छोटा सा गोल बक्सा रखता है और दिखाता है कि वह खाली है फिर उस खाली डिब्बे में से जाने कितने लम्बे लम्बे रिबन, एक के साथ एक बंधे रुमाल , माचिस, लाइटर जाने क्या क्या निकालता है और फिर अंत में एक कबूतर निकाल देता है । चीता वह निकाल नहीं सकता क्योंकि उसका साइज़ डिब्बे से बड़ा होता है । 


फत्तू जी की हजामत की पेटी भी हमें जादूगर के डिब्बे से कम नहीं लगती थी । वे जब हम लोगों के बाल काटने के लिए हमारे घर आते तो अपने साथ अपनी एल्यूमिनियम की पेटी लाया करते थे । उनकी इस पेटी में कब्जे वाले दो ढक्कन थे, एक बाईं ओर खुलता था और एक दाईं ओर । फत्तूजी के पहुँचते ही बाबूजी ज़मीन  पर बोरा बिछा कर पालथी मारकर बैठ जाते । फत्तूजी भी उनके सामने बैठ जाते और अपनी जादू की पेटी खोलते । सबसे पहले खुलता दाहिनी ओर का ढक्कन और ऊपर ही दिखाई देता तह किया हुआ एक साफ़ सुथरा सफ़ेद कपड़ा जिसे निकालकर वे बाबूजी की गर्दन पर बाँध देते । इसी ओर से निकलती एक कटोरी जिसमे वे मग्गे में लाया हुआ ठंडा पानी भर देते । 


‘खुल जा सिम सिम’ वाली कहानी की तरह अब खुलता दूसरी ओर का  ढक्कन और उसमे से सबसे पहले निकलती एक कैंची । फिर तो जादूगर की तरह फतूजी एक के बाद एक चीजें निकालना प्रारंभ कर देते, एक बड़ी कैंची, एक छोटी कैंची, बड़े दांतों वाली कंघी,  छोटे दांतों वाली कंघी , एक ऐसी कंघी जिसके एक ओर बड़े दांते और दूसरी और छोटे दांते होते थे, इसके अलावा बारीक दांतों वाली एक कंघी और । 

अभी इस जादू की पेटी से सामान निकलना बंद नहीं हुआ है , अब देखिए और क्या क्या निकल रहा है एक खच खच करने वाली लोहे की ट्रिमिंग मशीन, हजामत का उस्तरा, धार बनाने के लिए चमड़े का एक पट्टा या पत्थर , फिर शेविंग करने वाले साबुन की गोल गोल बट्टी , हजामत बनाने का ब्रश , और एक नहन्नी ।


इसके बाद फत्तूजी का केश कर्तन का कार्यक्रम प्रारंभ होता । वे सबसे पहले बालों में पानी लगाकर उन्हें सीधा करते फिर कंघी से खींच खींच कर देखते कि कौनसे बाल लम्बे हैं और कौनसे छोटे । फिर वे कंघे के पिछले हिस्से से गीले बालों को दबाते और बढ़े हुए लम्बे बालों को एक सीध में कैंची से काट देते । 


इसके बाद वे सर के टॉप फ्लोर पर  आते । मोटे दांतों वाली कंघी से बालों को ऊपर की ओर उठाते और दांतों से बाहर आने वाले बालों को कैंची से खच खच काटते जाते । इस बीच उनकी और बाबूजी की गपशप जारी रहती थी । बातें करते करते वे दुनिया जहान की बातें बता डालते । भंडारा की गलियों और नालियों से उनकी बात शुरू होती और राशन दुकान  में अमेरिका से आई लाल ज्वारी की खेप तक पहुँचती । उनके एनसायक्लोपीडिया में भंडारा शहर के अशोक भिवगड़े होते , विदर्भवीर जाम्बुवंत राव धोटे भी । फिर बाबासाहेब आंबेडकर , नेहरू , लाल बहादुर शास्त्री से होते हुए वे कैनेडी तक पहुँचते । जाने कब झुमरी तलैया से बात शुरू करते और जोहान्सबर्ग तक पहुँच  जाते ।


मज़े की बात यह कि बाबूजी को वे बोलने का मौका कम ही देते थे । बाबूजी अगर बीच में कुछ कहना भी चाहते तो उन्हें कहते “गुरूजी सर थोडा दाहिनी तरफ” , ऐसे ही कभी बाईं तरफ झुकवाते । किसी के आगे सर न झुकाने वाले बाबूजी चुपचाप उनके आगे सर झुका देते । वैसे भी मुंह में बाल न चले जाएँ इस डर से बाबूजी मुंह ज़रा कम ही खोलते थे । कैंची का उपयोग हो जाने के पश्चात वे अपनी हाथ से चलने वाली ट्रिमिंग मशीन निकालते ।   


बाबूजी की कटिंग होने के बाद मेरा नम्बर आता था । फत्तूजी कसकर मेरी नन्ही गर्दन पकड़ लेते और मेरे रोने चीखने के बावजूद मेरे बाल काट ही देते थे । कुछ देर बाद मेरा रोना तो बंद हो जाता लेकिन आईने में अपनी सूरत देखकर फिर रोना आने लगता । जब वे मेरी गर्दन के बालों को काटने के लिए  ट्रिमिंग मशीन चलाते तो मुझे बहुत गुदगुदी होने लगती  । बाल काटने के बाद वे अपनी नहन्नी से हाथ और पैर के नाखून भी काटते थे । वह भी मुझे बहुत अच्छा लगता था । नेलकटर से अपने नाखून काटने वाले लोग नहन्नी से नाखून कटवाने का आनंद नहीं जान सकते ।


फत्तूजी का एक वाकया मुझे याद है । सन बहत्तर में मेरी फुफेरी बहन डॉ.नीलम शर्मा का विवाह भंडारा से ही हुआ था । फत्तूजी बिलकुल घर की शादी की तरह बारातियों की सेवा में तैनात  । दूल्हे के जीजाजी  ने कहा कि ठण्ड काफी है , वह बिस्तर से बाहर नहीं निकलना चाहते इसलिये लेटे लेटे ही उनकी हजामत बनाई जाये । फत्तूजी ने अपनी धोती समेटते हुए कहा “चिंता न करें मैं आपकी छाती पर चढ़कर बैठ जाता हूँ, आप लेटे रहिये ।“ फत्तूजी अच्छे लम्बे चौड़े थे । फत्तूजी का डील डौल देखकर वे घबरा गए  और तुरंत उठकर बैठ गए और कहने लगे  “ नहीं,नहीं कोई बात नहीं मैं बैठ ही जाता हूँ ।“ 


फत्तूजी के पास न केवल मजेदार किस्से थे बल्कि छोटी मोटी बीमारियों के भी बहुत से नुस्खे थे । एक बार बाबूजी की पीठ पर एक मस्सा हो गया था । फत्तूजी उसे  काटने के लिये कहीं से घोड़े का एक बाल लेकर आये और कहा “ गुरूजी इससे काट देता हूँ, पता भी नहीं चलेगा । लेकिन जैसे ही उन्होंने बाल से मस्सा काटा,अचानक तेज़ी से खून बहने लगा । फत्तूजी ने तुरंत पान के डिब्बे से चूना निकाला और कटे हुए स्थान पर लगा दिया यह कहकर कि इससे खून बहना बंद हो जायेगा और इन्फेक्शन भी नहीं होगा । इस तरह उनकी सर्जरी संपन्न हुई ।


यह वह दौर था जब आज  के दिनों की तरह आधुनिक सुविधाओं से युक्त सेलून नहीं होते थे । अधिकांश केश कर्तन कलाकार लोगों के घर जाकर उनकी कटिंग बनाया करते थे । या फिर कहीं किसी को पेड़ के नीचे जगह मिल जाती तो वहीं अपनी दुकान खोल लेता । फिर धीरे धीरे समय बदलने लगा  और भंडारा में भी हेयर कटिंग सेलून के बोर्ड दिखाई देने लगे । हम लोगों की पीढ़ी घर में बाल कटवाने की बजाय सैलून जाना अधिक पसंद करने लगी । 


फत्तूजी ने भी अपने घर के सामने वाले कमरे के एक कोने में एक कुर्सी लगाकर सैलून नुमा व्यवस्था कर ली । मैंने भी फत्तूजी से कटिंग बनवाना छोड़कर एक आधुनिक सैलून में अपना खाता खोल लिया । लेकिन फत्तूजी के भीतर जब तक शक्ति रही उन्होंने लोगों के घर जाकर उनकी सेवा करने का क्रम नहीं छोड़ा । आज न बाबूजी हैं न फत्तूजी, लेकिन मुझे वह दृश्य अच्छी तरह याद है जब फत्तूजी बाबूजी को डांटकर कहते थे “ गुरूजी सर सीधा रखो नहीं तो कैंची लग जाएगी ।“ 



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