इंसान को कपड़ों की ज़रूरत अपनी लाज ढँकने के लिए नहीं पड़ी उस आदिम इन्सान को तो पता ही नहीं था कि लज्जा किसे कहते हैं नैसर्गिक आवश्यकता में कपड़ों की कोई अहमियत नहीं थी लेकिन शरीर तो एक जैविक पिंड था , उसे ठण्ड लगती थी गर्मी भी लगती थी ,बारिश में वह भीग जाता था तो पहले वस्त्र बने पेड़ के पत्ते , छाल और जानवर की खाल , फिर उसने हड्डी की सुई और पेड़ के रेशों और लताओं से उसे सीना प्रारंभ किया ,फिर जूट के रेशों से कपड़ा बनाना सीखा , उसे सीना भी आ गया
सदियाँ बीतती गई लोहे की खोज हुई तो हड्डी की सुई लोहे की सुई में बदल गई , हाथों का काम मशीने करने लगीं और इस विशिष्ट काम को करने वाली एक विशिष्ट वर्ग का जन हुआ जिसे दरजी नाम दिया गया . उन दिनों गाँव में कोई एक दरजी हुआ करता था जो लोगों के कपडे सिलता था जैसे जैसे कपड़ों की जरुरत बढ़ी दर्जियों की संख्या भी बढ़ती गई रेडीमेड कपड़ों का चलन बहुत कम होता था अमूमन दरजी ही सबके कपडे सिलते थे त्योहारों पर शदी ब्याह के समय उनके पास काम बहुत बढ़ जाता था
मेरे जीवन के पहले दरजी थे भंडारा के सूर्यवंशी टेलर । जैसे बाबूजी के दुकानदार तय थे वैसे ही उनके कारीगर भी तय थे । कपड़े सिलवाने के लिये वे सूर्यवंशी टेलर के पास जाते थे । टेलर शब्द सुनते ही एक छवि मन में उभरती है नाक पर चढ़ा हुआ चश्मा जिससे ऊपर हर आने जाने वाली की और झाँकती आँखें गले में लटका इंच टेप सूर्यवंशी टेलर फटाफट कमर छाती और बाँह का नाप लेते और एक रजिस्टर में नोट कर लेते उस समय टाइट कम मोहरी वाली पेंट का फैशन था बाबूजी पहले ही हिदायत देते ज्यादा टाईट नहीं बनाना है हम धीरे से टेलर मास्टर को इशारा कर देते मोहरी कम रखना है लेकिन टेलर मास्टर धीरे से कह देते नहीं गुरूजी नाराज होंगे आखिर पैसा तो उन्हें बाबूजी से ही मिलना था
सूर्यवंशी टेलर बाबूजी को इसलिए भी पसंद थे कि उन दिनों के आम चलन की तरह वे कपड़ा नहीं चुराते थे बल्कि बचा हुआ कपड़ा ईमानदारी से वापस कर देते । एक बार बाबूजी दिल्ले से एक गर्म कोट का कपड़ा लाये थे उसमें से कुछ कपड़ा शेष रह गया । बाबूजी ने टेलर से कहा कि वह मेरे लिये एक जैकेट सिल दे । उन दिनों कमर से कुछ नीचे तक की जैकेट पहनने का फैशन था लेकिन सूर्यवंशी टेलर ने जो जैकेट सिली थी वह बमुश्किल मेरी कमर तक आता था । मैंने वह जैकेट पहन तो ली लेकिन उसे पहनकर स्कूल जाते हुए मुझे बहुत शर्म आती थी । बाद में जब उस जैकेट के दिन पूरे हो गये थे कमर तक पहनने वाली जैकेट का फैशन आ गया था ।
कुछ बड़े हुए थे फिर बाबूजी के बताये टेलर की बजाय दोस्तों के बताये हुए टेलर से कपडा सिलवाना शुरू किया किसी दोस्त को बढ़िया पेंट शर्ट पहने देखा तो पूछा “ कहाँ से सिलवाया यार ?” उसने फ्रेंड्स टेलर का नाम बताया बस फिर क्या था वहाँ बाबूजी का कोई दखल नहीं था हम अपने दोस्तों की सलाह के आधार पर उन्हें हिदायत देते , कालर में मोती वाली बकरम लगाना है , बुल डॉग कलर रखना है पॉकेट दोनों तरह होना चाहिए उस पर फ्लैप भी चाहिए , पेंट में नीचे फोल्ड नहीं होना और देवानंद के पेंट की तरह तीन चार प्लेट वाली पेंट बिलकुल नहीं चलेगी पेंट की मोहरी पर काफी डिस्कशन होता और तय किया जाता कि इन दिनों जितनी मोहरी का फैशन चल रहा है उतनी ही रखी जाए पॉकेट सीधे वाले चाहिए या कट वाले , बैक पॉकेट में फ्लैप रखा जाए या नहीं उसमे बटन लगाये या नहीं , शर्त की बटन कौनसे कलर की हो , उस पर ढँकने वाली कपड़े की पट्टी होनी चाहिए या नहीं इन तमाम बातों पर विस्तार से चर्चा की जाती
लेकिन इन सबके बीच मोहल्ले के मेश्राम टेलर का उल्लेख न आये यह कैसे हो सकता था मेश्राम टेलर की रिंग रोड पर टिन शेड वाली एक छोटी सी दुकान थी अन्य टेलरों की तरह उनकी दुकान पर सूट विशेषज्ञ जैसा कुछ लिखा हुआ कोई बोर्ड भी नहीं था । वे एक ही मशीन जिस पर वे स्त्री पुरुष सभी के कपडे सिया करते बाबूजी ने उनसे कभे कपड़े तो नहीं सिलवाए लेकिन हमारे घर के परदे सोफे के कवर आदि उन्ही के यहाँ सिलते थे ।
यह वह दौर था जब स्त्रियों के कपड़े अधिकांश स्त्रियाँ ही सिलती थी अगर पुरुष टेलर भी थे जो स्त्रियों के कपडे बेहतरीन सिलते थे मेरे मन में यह बात हमेशा रहती थी की वे स्त्रियों का नाप कैसे लेते होंगे लेकिन महिलाएँ उन्हें पहले से सिला हुआ अपना ब्लाउज दे दिया करती जिससे नाप लेकर वे नया ब्लाउज सिल देते फिर पहला कपड़ा शायद किसी स्त्री के द्वारा ही सिला जाता होगा
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