11 जून 2026

164 व्यवहारे डॉक्टर , , ,



डॉक्टर के बारे में मैं जब भी सोचता तो यह बात मन में जरुर आती कि इन्सान को पहली बार किसी दोक्टोत की जरुरत पड़ी होगी तो वह किसके पास गया होगा ज़ाहिर है उस समय बहुत से गुणी बैगा ओझा आदि हुआ करते थे जिनके पास अह जात था जो जड़ी बूटियों आदि से इलाज करते थे फिर यही लोग वैद्य बन गए प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति फिर आयुर्वेद होमियोपैथी आदि का चलन हुआ और उसके बाद मेडिकल साइंस ने एलोपैथी की खोज की पुरानी पद्धतियाँ कहीं पर ठहर गईं और एलोपैथी अपना विकास करती रही  उन दिनों गांवों में अमूमन सभी प्रकार के चिकित्सक हुआ करते थे आयुवेद पर लोगोंका विश्वास था और होमियोपैथी में पैसे कम लगते थे लेकिन इमरजेंसी में तो एलोपैथिक डॉक्टर की शरण में ही जाना पड़ता था 


मेरे दादाजी आयुर्वेदिक वैद्य थे , बाबूजी को भी चिकित्सा में काफी रूचि थी और वे होमियोपैथी का अध्ययन किया करते थे उनके पास एक किताब थी जिसका शीर्षक था डॉ शुश्लर की बारह दवाइयां डॉक्टर शिष्लर होमियोपैथ थे जर्मनी के बाबूजी के पास एक बक्सा था लकड़ी का जिसमे होमियोपैथी की गोलियां रहती थीं लेकिन उन्ही दिनों बाबूजी की भंडारा के डॉक्टर व्यवहरे से मुलाकात हुई और उन्होंने उनके यहाँ जान शुरू किया डॉक्टर व्यवहारे का खाम्तालाव जाने वाले रोड पर एक दवाखाना था डॉक्टर व्यहारे एक कड़वी सी दावा दिया करते कांच की शीशी में जसपर एक कागज की पत्ती लगी रहती जिसमे कोर्नेअर एरो जैसे बने होते उसका अर्थ था कि एक खुराक यहाँ तक लेनी है  किसी मरीज की बीमारी की गंभीरता को देखते हुए वे कहते इसे सुई लगानी पड़ेगी  सुई से मुझे बहुत दर लगता था स्कुल में जब टीके लगाये जाते तो मुझे देख देखकर ही दहशत होने लगती थी उन दिनों डॉक्टर के यहाँ एक कम्पौन्दर हुआ करता था जो छोटो मोटो सर्जरी में भी एक्सपर्ट होता था मरहम पट्टी से लेकर दवाओं के नाम पता नहीं रहते थे बस लाल दवा पीली दावा नीली दवा जैसे शब्द प्रचलित थे  डॉक्टर चाहे होमियोपैथ हों या एलोपैथ स्ठेठेस्कोप के आलावा नाडी भी चेक करते थे , जीभ दिकना पड़ता पेट को दबा दबा कर दखते कल क्या खाया पूछने पर कुछ बता नहीं पाते  डॉक्टर हँसते कहते बच्चे क्या बताएँगे फिर वे बाबूजी से पूरी जानकारी ले लेते 


 90 .5 व्यवहारे डॉक्टर -  गुर्जर  चौक से बाज़ार की ओर जाते हुए व्यवहारे डॉक्टर का दवाखाना पड़ता था । वैसे तो बाबूजी को डॉक्टर की ज़रूरत बहुत कम पड़ती थी इसलिये कि वे खुद होमियोपैथी के ज्ञाता थे और छोटी मोटी तकलीफों का खुद इलाज़ कर लिया करते थे । एक बक्सा था उनके पास जिसमें तरह तरह की दवाइयाँ हुआ करती थीं । लेकिन कभी कभी डॉ. के यहाँ जाने की नौबत आ ही जाती थी । एक बार ऐसा हुआ कि बाबूजी मुझे आवाज़ दे रहे थे और मैं अनसुना कर गया । बाबूजी ने पूछा ..क्यों ठीक से सुनाई नहीं देता क्या ? “ मैंने जवाब दिया “ हाँ । “ बाबूजी ने कहा “ ठीक है तुम्हे डॉक्टर व्यवहारे को दिखा देते हैं । “ अगले दिन वे मुझे डॉक्टर व्यवहारे के यहाँ ले गये । डॉक्टर ने मेरे कान में झाँकर देखा , फिर उन्होंने अपने माथे पर एक बेल्ट बान्धा उसमे एक लेंस लगा था । फिर वे मुझे धूप में ले गये और रोशनी को मेरे कान के भीतर केन्द्रित किया और एक उपकरण से मेरे कान के भीतर से ढेर सारा मैल निकाला और कहा “ इसकी वज़ह से ठीक से सुनाई नहीं दे रहा होगा । “ 


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