अब सोचो तो लगता है बचपन के साल कितनी तेज़ी से बीत जाते थे ৷ हर साल गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक ऑर्केस्ट्रा,रिकॉर्डिंग डांस,नक्कल,खड़ा तमाशा,पोवाड़ा,लावणी,और बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम द्वारा अपने भरपूर के मनोरंजन लिए हम गणेश जी को धन्यवाद देते हुए ‘गणपति बाप्पा मोरिया , पुढच्या वर्षी लवकर या’ कहकर साल भर के लिए उन्हें वैनगंगा नदी या खामतालाव में विसर्जित कर आते ৷ फिर बीस दिनों का ब्रेक और उसके बाद दुर्गाजी का आगमन ৷ यह दिन भी मनोरंजन के होते थे, हालाँकि गणेशोत्सव जितनी छूट हम बच्चों को इस उत्सव में नहीं मिल पाती थी ৷ दस दिनों के दुर्गोत्सव के बाद फिर एक ब्रेक ৷ फिर दीपावली से पूर्व कहीं कहीं शारदा अर्थात सरस्वती की स्थापना भी होती थी ৷
आप सोच रहे होंगे कि इसके बाद हमारे भंडारा की जनता की उत्सवधर्मिता पर विराम लग जाता होगा ৷ लेकिन ऐसा भी कहीं होता है ৷ हमारे देश की उत्सवप्रेमी जनता के उत्सव तो भरी बरसात हो, भीषण ठण्ड या तपती गर्मी, कभी समाप्त ही नहीं होते हैं ৷ यह दुःख में भी उत्सव मना सकती है और सुख में भी ৷
गणेशोत्सव और दुर्गोत्सव के बाद टूटी तोरण की उड़ती हुई बदरंग पन्नियों की तरह युवाओं के चेहरे भी धीरे धीरे फ़ीके पड़ने लगते ৷ वे फिर से पढ़ाई लिखाई और रोज़गार की चिंताओं में डूब जाते ৷ फिर भी कुछ युवा होते थे जो इन चिंताओं से सायास मुक्त रहते थे ৷ मितव्ययिता की ट्यूशन पढ़ाने वाले यह युवक उत्सवों के भारी खर्च के बावजूद कुछ पैसे बचा लेते थे ৷ वैसे तो इन पैसों का दुरूपयोग नहीं होता था लेकिन कभी कभी किसी कार्यकर्त्ता को नई शर्ट पहने हुए हम बच्चे देखते तो उसे छेड़ते “क्या भैया... नई नई शर्ट ?” उसके बाद जैसे ही वह हमें ‘चलो भागो’ कह कर घुड़काता हम भाग खड़े होते ৷
बचे हुए पैसों का सबसे अच्छा उपयोग होता था ‘मस्कर्या गणपति‘ की स्थापना में ৷ आपने कभी मस्कर्या गणपति यह शब्द सुना नहीं होगा ৷ ‘मस्करी’ का अर्थ मसखरी,मज़ाक या हँसी ठिठोली होता है । इसीसे शब्द बना है ‘मस्कर्या’ ৷ बची हुई बल्लियों और कनातों का उपयोग कर फिर एक मंच बनाया जाता और उस पर ‘मस्कर्या गणपति‘ की स्थापना कर दी जाती ৷
मस्कर्या गणपति इस उत्सव की शुरुआत सन 1755 में राजे खंडोजी महाराज भोंसले उर्फ़ चिमणा बापू ने पितृपक्ष में की थी उस समय वे बंगाल राज्य पर विजय के उपरान्त नागपुर लौटे थे तब तक पारंपरिक गणेश पूजा का पर्व समाप्त हो चुका था ৷ वह पितृपक्ष का समय था उस समय पूजा पाठ नहीं होता है लेकिन आनंदोत्सव तो मनाना था अतः बंगाल पर विजय का उत्सव मनाने हेतु उनके द्वारा मस्कर्या गणपति की स्थापना की गई इस दौरान उसी तरह, भजन कीर्तन, लावणी, नक़ल , खड़ी गम्मत आदि मनोरंजक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया सामान्यतः पितृपक्ष में पूजा पाठ नहीं होता अतः इस विडम्बना को मूर्त रूप देते हुए उसे मसखरी जैसे शब्द से जोड़ा गया ताकि श्रद्धावान और कर्मकांडी लोगों की आस्था को ठेस न पहुँचे ৷ यह घटना लोकमान्य तिलक द्वारा महाराष्ट्र में सन अठारह सौ त्र्यानबे में सार्वजानिक गणेशोत्सव की परम्परा प्राम्भ करने से पूर्व की है ৷ आगे चलकर मस्कर्या गणपति का यह पर्व पूरे विदर्भ और महाराष्ट्र में मनाया जाने लगा ৷
मस्कर्या गणपति में गणेश जी की यह प्रतिमा पारम्परिक प्रतिमा से कुछ भिन्न होती थी ৷ इसमें कभी गणेश जी को पैंट शर्ट पहने बताया जाता,कभी वे साइकिल पर सवार या डिस्को में नृत्य करते हुए बताये जाते ৷ नील आर्मस्ट्रांग जिस वर्ष चाँद पर पहुँचे थे उस वर्ष एक उत्सव में गणेश जी को अंतरिक्ष यात्री की वेशभूषा में बताया गया था ৷ वस्तुत: इस प्रतिमा द्वारा उस दौर की किसी विशेष घटना को दर्शाया जाता है ৷ दुर्गा, गणेश, शारदा उत्सव के उपरांत एक तरह से यह आनंदोत्सव विश्रांति अथवा तनावमुक्ति के लिए होता है , यद्यपि इसमें भी देवता के रूप में गणेश जी के सम्मान का उचित ध्यान रखा जाता और बाकायदा पूजा पाठ और आरती इत्यादि होती ही है ৷
गणेश जी को एक सामान्य मनुष्य के रूप में स्थापित करने की इस प्रथा का उद्देश्य यही बताना होता था कि देवता मनुष्य से भिन्न नहीं हैं ৷ हमारे यहाँ धर्म की उदारवादी परम्परा में देवताओं को भी मनुष्य की तरह ही बताया गया है,वे मनुष्य के रूप में अवतार लेते हैं और उसी तरह कार्य व्यवहार भी करते हैं ৷ वे मनुष्य की भांति सुख दुःख से आंदोलित होते हैं, कष्ट सहते हैं ৷ जहाँ वे दुःख भी उठाते हैं वहीं खुशी के पलों में मनुष्य की तरह उत्सव भी मनाते हैं ৷
प्रारंभ में धर्म का यही उदारवादी स्वरूप था इसलिए पुराण कथाओं में देवी देवताओं का वर्णन इसी रूप में होता है लेकिन कालांतर में धर्म को लेकर यह समाज संकुचित होता गया, धर्म में विचार कम और कर्मकांड अधिक होते गए ৷ यह स्थिति केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं अन्य धर्मों में भी आई ৷ कर्मकांडों की अधिकता के अलावा धर्मों को गूढ़ बनाने का प्रयास भी किया गया ৷ धीरे धीरे लोग धर्म के आनंद में डूबते गए ৷ धर्म के मूल उद्देश्य लोग भूलते चले गए और आपस में द्वेष पालने लगे ৷ आज धर्म को लेकर नफ़रत का यह भाव पराकाष्ठा तक पहुँच गया है ৷ इस नफ़रत को फ़ैलाने में राजनीति की क्या भूमिका है इस बात को सभी बेहतर जानते हैं ৷
इसलिये आगे चलकर मस्कर्या गणपति की यह प्रथा कम होती गई ৷ अन्य कारणों के अलावा इस तरह की प्रथा से असहिष्णु या श्रद्धावान लोगों की श्रद्धा को ठेस भी पहुँचती थी ৷ असहिष्णुता के विभिन्न आयाम थे,पेंटिंग्स से लेकर विभिन्न उत्पादों पर देवी देवताओं के चित्रण का विरोध किया जाने लगा और हमारे बचपन में प्रचलित दिवाली के पटाखे लक्ष्मी बम के पैकेट से लक्ष्मीजी की फोटो हटा दी गई ৷ संभव है अपनी संकुचित मानसिकता की वज़ह से लोगों ने गणेश जी की प्रतिमा के साथ इस तरह के विडम्बना पूर्ण व्यवहार हेतु आक्षेप भी लिया हो ৷ अब भंडारा में शायद एक स्थान पर ही इस तरह मस्कर्या गणपति की स्थापना होती है ৷
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