पिंगा ग पोरी, पिंगा ग पोरी, पिंगा ग पोरी, पिंगा... यह गीत आपने अवश्य सुना होगा ? इतना गा कर देखिये इससे आगे जो बोल आपके मुँह से निकलेंगे वे लावणी के बोल होंगे ৷ आपको याद आयेगी नौ वारी यानि नौ गज की साड़ी पहन कर नृत्य प्रस्तुत करती हुई महाराष्ट्र की एक नृत्यांगना ৷
उन गली मोहल्लों में जहाँ रात रात भर चलने वाले खड़ा तमाशा या खड़ी गम्मत के कार्यक्रम हुआ करते थे लावणी पर थिरकती हुई नृत्यांगानाओं के पैरों में बंधे घुंघरुओं की आवाज़ कई दिनों तक विद्यमान रहती थी ৷ राजा रजवाड़ों के समय से चली आ रही इस नृत्य कला की धूम तब मची जब मराठी फिल्मों के बाद हिन्दी की कुछ फिल्मों में भी इसका प्रदर्शन हुआ ৷
उन दिनों वी.शांताराम की बहुचर्चित फिल्म ‘पिंजरा‘ आई थी ৷ इस फिल्म की कथा लावणी की नृत्यांगना संध्या और एक स्कूल मास्टर डॉ. श्रीराम लागू के प्रेम के इर्द गिर्द घटित होती है ৷ इस फिल्म की एक लावणी उन दिनों बहुत मशहूर हुई थी .. “दिसला ग बाई दिसला , मला बघून गालात हसला ग बाई हसला৷” हिन्दी में इसे कुछ इस तरह कहेंगे “ हाँ वो मेरा प्रेमी है , वह मुझे दिखाई दिया ..और पता है सखी, वह मुझे देखकर गालों ही गालों में हँसा ৷”
इतने मीठे शब्दों में पगा हुआ यह संप्रत्यय ‘लावणी’ लावण्य से बना है ৷ लावणी लोकगीत, लोकनृत्य और अभिनय का सुन्दर संयोजन है ৷ स्त्रियों द्वारा प्रस्तुत लावणी में मंच पर संगीत व गायक मंडली विद्यमान होती है৷ ढोलकी और तुनतुना इनके प्रमुख वाद्ययंत्र हैं ৷ एकल के अलावा यह समूह में भी प्रस्तुत की जाती है ৷ गांवों में जहाँ बिजली नहीं होती यह मशाल की रौशनी में प्रस्तुत की जाती है ৷
यदि लावणी के इतिहास पर हम सरसरी तौर पर नज़र डालें तो ज्ञात होता है कि लावणी का प्रारंभ तेरहवीं शताब्दी से माना जाता है ৷ प्रारंभ में संतों के प्रादुर्भाव की वज़ह से इसमें आध्यात्मिक पुट अधिक था, पेशवाओं के समय इसका महत्त्व अधिक बढ़ गया ৷ कालांतर में इसमें भक्ति रस,वीर रस, वात्सल्य रस के अलावा श्रृंगार रस प्रधान हो गया ৷ उन्नीसवीं शताब्दी से लावणी के कवियों और प्रस्तुतकर्ताओं को शाहीर कहा जाने लगा ৷ शाहीरों का खड़ा तमाशा जिसमें पहले विशुद्ध हास्य होता था, लावणी नृत्य उसका एक प्रमुख अंग बन गया ৷
लावणी में जिन गीतों पर नृत्य प्रस्तुत किया जाता है वे साहित्य की लावणी विधा के अंतर्गत आते हैं ৷ महाराष्ट के अनेक कवियों ने लावणी गीत भी लिखे हैं, जिनमे बशीर मोमिन कवठेकर का नाम बहुत प्रसिद्ध है उसी तरह बापू राव, भाऊ फक्कड़, अर्जुन वाघोलिकर के साथ कवि शाहीर अमर शेख का नाम भी प्रसिद्ध है ৷
कॉमरेड शाहीर अमर शेख जिनका वास्तविक नाम मेहबूब हुसैन पटेल था महाराष्ट्र के सुविख्यात कवि तथा शाहीर रहे हैं ৷ उन्नीस सौ सोलह में जन्मे महबूब हुसैन मिल मजदूरों के आन्दोलन में जेल गए जहाँ वे कॉमरेड रघुनाथ करहाड़कर के सम्पर्क में आये ৷ विचारधारा से लैस जनकवि के रूप में उनकी छवि उभरने लगी ৷अपनी बुलंद आवाज़ में अपनी कविताएँ प्रस्तुत कर उन्होंने न केवल गोवा मुक्ति आन्दोलन बल्कि पाकिस्तान और चीन के आक्रमण के समय लोगों में देशप्रेम की चेतना जागृत करने का कार्य किया ৷ सुप्रसिद्ध कवि,फ़िल्मकार,राजनेता प्रल्हाद केशव अत्रे ने उन्हें महाराष्ट्र का मायकोवस्की कहा है ৷ शाहीर अमर शेख की बेटी मल्लिका अमर शेख मराठी की वरिष्ठ कवयित्री हैं ৷
लावणी की सुप्रसिद्ध नृत्यांगनाओं में आज सत्यभामा पंढरपुरकर ,यमुना बाई वाईकर ,विठाबाई नारायणगाँवकर , कांताबाई सातारेकर ,सुरेखा पुणेकर, मंगला बंसोडे ,संध्या माने जैसे नाम काफी प्रसिद्ध हैं ৷ जर्मनी में विश्व मराठी सम्मलेन में दीपिका परब ने मराठी लावणी प्रस्तुत की है ৷ पुणे में रत्नाकर डांस अकादमी की पांच हज़ार नृत्यांगानाओं ने एक साथ एक मंच पर लावणी प्रस्तुत कर विश्व रिकॉर्ड बनाया है ৷
इस तरह लावणी अपनी समृद्ध लोक परम्परा में नए नए रूप बदलते हुए आज वैश्विक स्तर पर सम्मान पा चुकी है ৷ अब तो हिन्दी में सिद्धार्थ रागिनी की लिखी हिंदी लावणी भी आप सुन चुके हैं “लटपट लटपट कमर दामिनी अधर रागिनी .. मेरे अंगना में देखो आज खिला है चाँद ৷ और संभव है आपने इस लावणी पर नृत्य भी किया हो ৷ ”
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