वह साठ का दशक था ৷ देश आज़ाद हुए बीस साल से भी अधिक समय हो चुका था । भारत का मध्य प्रान्त अब मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे दो राज्यों में बंट चुका था । हिन्दी मध्यप्रदेश की और मराठी महाराष्ट्र की कामकाज की भाषा घोषित की जा चुकी थी । नागपुर,भंडारा, अकोला, अमरावती,बुलढाना जैसे वैदर्भीय शहरों का जन्म तो काफी पहले हो चुका था लेकिन अब वे प्रजातांत्रिक तरीके से विस्तार ले रहे थे । आज़ाद भारत में जन्म लेने वाली पीढ़ी अब जवान हो चुकी थी । इस कटु सत्य से वह वाकिफ़ थी कि आज़ादी की बातों से पेट भरने वाला नहीं है, ज़िन्दा रहने के लिए रोज़गार ज़रुरी है और बेहतर रोज़गार के लिए शहर की ओर कदम रखना ज़रूरी है ।
अपनी साँसों में जंगल की शुद्ध हवा भरकर, कोशिकाओं में नदियों व झरनों का मीठा जल बसाकर और मांसपेशियों में खेतों में उगे पौष्टिक अनाज से मिली ताकत लेकर यह सीधे सादे नौजवान अपने बढ़ते हुए परिवार के लिए रोजी-रोटी की तलाश में शहर आने लगे ৷ वैसे तो शहर में जगह की कमी नहीं थी लेकिन शहरी कहलाने वाले तथाकथित सभ्य और धनाढ्य लोगों के दिलों में उनके लिए जगह ज़रा कम थी ।
गाँव से शहर आए इन युवाओं ने अपने पाँवों में पड़ने वाले छालों की परवाह नहीं की और अपनी गठरियाँ पीठ पर लादे शहर की बाहरी सीमा पर बसी बस्तियों की ओर चले गए जहाँ पहले से उनके जैसे इंसान रहते थे । मिट्टी, लकड़ी, टीन और तार्पोलीन जैसी मामूली चीज़ों ने उनका साथ दिया और उनके लिए झोपड़ियाँ बना दीं । इन बस्तियों ने शहर के उन मेहनतकशों को न केवल पनाह दी बल्कि शहरी लोगों के घर दूध पहुँचाने से लेकर बनते हुए मकानों में मजदूरी करने का अपने हिस्से का काम भी दिया ৷ उनकी औरतों को भी बच्चे संभालने से लेकर बर्तन कपड़ा धोने जैसे काम मिल गए ।
दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद अपना पसीना सुखाते हुए जब शाम को वे घर लौटते और हाथ मुंह धोकर अपने दड़बे से बाहर निकलते उन्हें हवाओं में गाँव की चौपाल पर बजती ढोलकी की थाप सुनाई देती थी , किसी कीर्तनिया का आलाप और बजती हुई बंसी की धुन भी । लेकिन थोड़ी देर बाद ही उन्हें समझ में आ जाता कि यह केवल उनके मन का भ्रम है ।
वे जानते थे मनोरंजन मनुष्य का आदिम अधिकार है और इस शहरी जीवन में बच्चों के सो जाने के बाद ढिबरी बुझाकर किया जाने वाला मनोरंजन काफी नहीं है । शहर के सिनेमा,नाटक,ऑर्केस्ट्रा आदि लोक में पगे उनके मन के भीतर जगह नहीं पा सकते थे ৷ उनके अंतर की यह वेदना राजी ख़ुशी के समाचारों से भरे पोस्टकार्डों के किसी कोने में जगह पाकर गाँव पहुँच गयी और फिर डफ,ढोल, मंजीरे, बाँसुरी तक भी जा पहुँची । इन वाद्ययंत्रों और उनके बजाने वालों ने उनके दर्द को समझा और एक दिन अपना तामझाम लेकर शहर की इन बस्तियों में उनके मेहमान बनकर आ गए ।
फिर तो अक्सर यह होने लगा कि अचानक किसी सुबह एक रंगबिरंगी मिनी बस नुमा गाड़ी इनकी बस्ती में आकर रुकती और उससे कुछ कलाकार उतरते, एक शाहिर, साज बजाने वाले कुछ साजिन्दे, और नृत्य व अभिनय करने वाले कुछ कलाकार ৷ गाड़ी के कैरियर से परदे, बांस बल्लियाँ, लकड़ी के पटिये, लाउड स्पीकर, बैटरी, माइक आदि उतारे जाते और शाम तक स्टेज बन जाता, परदे लग जाते, स्टेज पर एक पट्टी लगाकर उसमे तीन चार माइक लटका दिए जाते , मंच के बगल में एक ग्रीन रूम बन जाता और बस्ती में ऐलान कर दिया जाता ....”बंधू आणि भगिनिन्नों ..ऐका हो एका.. आज रात को यहाँ शाहीर बाबूराव एंड कंपनी का ‘खड़ा तमाशा’ होने वाला है ৷”
बस फिर क्या था ,अपने खून पसीने से शहर का विकास करने वाले उन मेहनतकशों की तो मानो मुराद ही पूरी हो जाती थी । शाम को मजदूर घर लौटते तो एक अनोखे उत्साह से भरे होते आखिर उनका गाँव उनके शहर आया हुआ है । खा पीकर वे मंच के सामने बैठ जाते । कुछ लोग तो शाम से ही बोरा, चटाई आदि बिछाकर अपनी सीट रिजर्व कर लेते । फिर रात दस बजे करीब खड़ा तमाशा प्रारम्भ होता ।
इससे पहले कि मैं आपको खड़ा तमाशा घटित होने के बारे में विस्तार से बताऊँ ‘खड़ा तमाशा’ इस शब्द से आपका परिचय कराना चाहूँगा । वैसे तमाशा इस शब्द से तो आप वाकिफ होंगे, हमारे यहाँ सड़क से लेकर संसद तक यह होता ही रहता है। लेकिन यहाँ ‘खड़ा तमाशा’ महाराष्ट्र की एक समृद्ध लोक परम्परा है ৷ पूर्वी विदर्भ में इसे ‘खड़ी गम्मत’ कहते हैं । यह मूलतः एक लोकनाट्य होता है जो लगभग पूरी रात मंच पर चलता है ৷ इसमें पात्र खड़े होकर अभिनय करते हैं इसलिये इसे ‘खड़ा तमाशा’ कहते हैं । यह बिना किसी मंच के खुले में भी प्रस्तुत किया जा सकता है । ‘खड़ी गम्मत’ के पात्र ग्रामीण वेशभूषा में मंच पर आते हैं और छोटे छोटे नाटकों ,नृत्य आदि से जनता का मनोरंजन करते हैं ৷
यूँ तो इसका इतिहास बहुत पुराना है । पौराणिक गाथाओं और भजन कीर्तन की परम्परा तो लोक में जाने कब से व्याप्त थी । तमाशा के अंतर्गत पौराणिक कथाओं, महाभारत व रामायण के दृश्यों को ग्रामीण बोली में नाटक के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता था । कहते हैं एक बार औरंगजेब की सेना दक्षिण अभियान पर आई तो उन्होंने किसी गाँव में डेरा डाला । उनके मनोरंजन के लिए गाँव वालों ने नाटक शुरू किया औरंगजेब के मुँह से निकला ‘वाह यह तो बढ़िया तमाशा है’ और बस इसका नाम ‘खड़ा तमाशा’ हो गया ।
तो लीजिये अब गाँव से आई हमारी मंडली का खड़ा तमाशा प्रारम्भ होता है । सारे पात्र मंच पर आ चुके हैं और गणेश वंदना प्रारंभ हो रही है । मंच पर एक वादक व गायक मंडली भी विद्यमान है । वाद्य यंत्रों में मंजीरा, तुनतुनी, ढोलक, डफ, घुंघरू और हारमोनियम जैसे पारंपरिक वाद्य शामिल हैं ।
अब दो पात्र मंच पर आते हैं इनमे एक पत्नी है और एक पति । पति कहता है “शहर जा रहा हूँ कुछ मंगाना तो नहीं है ?” पत्नी कहती है “जा रहे हो तो वहां से सरप ले आना ।“ पति कहता है “ पागल हो गई है क्या ? सरप का क्या करेगी ?” पत्नी कहती है “ कपडे धोउंगी।“ पति चौंककर कहता है “ पागल हो गई है क्या सरप से भी कोई कपड़े धोता है और कहीं काट लिया तो ? “ पत्नी कहती है “ वो काटने वाला सरप नहीं है और कैसे काटेगा पकड़ के रखूँगी । “ इसके बाद गड़बड़ झाला वाले कई संवाद होते हैं और जनता हंस हंस कर लोटपोट हो जाती है । कुछ ही देर में लोगोंको समझ आ जाता है पत्नी कपड़े धोने वाले सरफ की बात कह रही है पति उसे सर्प समझ रहा है ।
नाटक अब आगे बढ़ता है और एक के बाद एक बाद पात्रों का आगमन होता जाता है । अभी कुछ देर पहले पति पत्नी की नोकझोंक चल रही थी अब उसमे पड़ोसियों की तकरार भी शामिल हो गई है । कुछ देर में एक स्त्री और आती है जो एक सास के तरह दिखाई देती है । आप समझ जाइये अब सास बहू की लड़ाई का प्रसंग है । इसी बीच कहीं जीजा साली की आशनाई भी आ गई है । बीच बीच में ग्राम प्रधान भी आते हैं जिनकी भुलक्कड़ी के प्रसंग जनता को हँसाते हैं , फिर गाँव के पटवारी, कोतवाल, लफूट लड़के मजदूर किसान सब इनमे शामिल हो जाते हैं ।
आप सोच रहे होंगे इतनी छोटी मंडली में इतने सारे पात्र कहाँ से आ गए जी नहीं पात्र तो लगभग पंद्रह बीस ही होते हैं बस वेशभूषा और मेकअप बदल बदल कर आते रहते हैं , यहाँ तक कि वे आवाज़ भी बदल लेते हैं और पत्नी का रोल करने वाला अभिनेता कॉलेज की युवा लड़की बन जाता है और अपने नए मेकअप में बूढ़ी सास भी ।
आप सोच रहे होंगे मैंने अभिनेता शब्द ग़लती से तो नहीं लिख दिया या मुझे अभिनेत्री लिखना चाहिए था । जी नहीं वह अभिनेता ही है माने स्त्री के भेष में पुरुष अभिनेता । लेकिन इतना बढ़िया मेकअप , इतनी सुन्दर साड़ी, स्त्री की वजा बनाकर बोलने में ऐसे लटके झटके कि पूछो मत । खड़ी गम्मत में यही पात्र मनोरंजन की मुख्य धुरी होता है इसे ‘नाच्या’ कहते हैं । लोक कला हो या शहरी क्षेत्र का रंगकर्म उन दिनों स्त्रियों का ऐसे सार्वजनिक प्रदर्शनों में आना अच्छा नहीं माना जाता था लेकिन मंडली में स्त्री तो चाहिए ही थी वैसे भी हमारे देश में स्त्री के बगैर कोई मनोरंजन पूरा कहाँ होता है , इसलिए ऐसे पुरुषों की खोज की गई जो स्त्री का अभिनय करने में माहिर हो ।
बस उसके बाद पुरुष अभिनेता द्वारा स्त्री का रोल करने की परिपाटी बन गई । पार्टी के लिए भी यह अच्छा था, स्त्री होती तो उन्हें उसके लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ती और जनता के लिए भी अच्छा था, स्त्री बने पुरुष से शाब्दिक छेड़छाड़ करना भी आसान होता था । कहीं कहीं तो इस नाच्या का अभिनय इतना जीवंत होता कि गाँव के शोहदे उनसे शारीरिक छेड़छाड़ तक कर बैठते । वैसे पुरुष का स्त्री की भूमिका में आना हमारी नाट्य परम्परा में नया नहीं है और अब तो इसका विस्तार आप टी वी पर आनेवाले बड़े बड़े कॉमेडी शोज में भी देख सकते हैं ।
चलिए देखते हैं नाटक में इसके आगे क्या होता है । नाटक आगे बढ़ता है और खड़ा तमाशा के कलाकार हँसी मजाक के बीच जाने कब गंभीर विषय भी उनमे पिरो देते हैं पता ही नहीं चलता । विषयों की क्या कमी है हमारे देश में, गाँव की शाला की समस्या अस्पताल की समस्या, छुआछूत की समस्या , अंधविश्वास की समस्या ,लोगों की दारू की आदत जैसी समस्या सब कुछ उसमे शामिल हो जाता है । खड़ा तमाशा के कलाकार लेकिन इन समस्याओं की बात भर नहीं करते अपने स्थानीय नेता,पाटील,कारखानेदार जैसे ओहदेदारों को भी व्यंग्य बाणों का शिकार बनाते हैं जिसमे जनता को बहुत मज़ा आता है ।
नाच्या अर्थात स्त्री बने पुरुष के अलावा खड़ा तमाशा में लोगों के हँसने का एक प्रमुख कारक होता है उसमे प्रयुक्त द्वीअर्थी संवाद । आप चाहें तो ऐसे कुछ संवादों के उदाहरण मैं दे सकता हूँ लेकिन उदाहरण देने की क्या आवश्यकता, मराठी फिल्मों के सुप्रसिद्ध हास्य कलाकार दादा कोंडके की हिन्दी फिल्म ‘अँधेरी रात में दिया तेरे हाथ’ में के संवादों को याद करते हुए आप स्वयं ही कल्पना कर लें तो बेहतर होगा ।
तो इस तरह यह खड़ी गम्मत या खड़ा तमाशा का कार्यक्रम आगे बढ़ता है जनता लोटपोट होती रहती है , बच्चे या फिर जिन्हें नींद आती है वे आधी रात के बाद घर चले जाते हैं । जिन्हें आनंद आता है वे और कुछ ज़ोरदार आइटम की चाहत में वहीं डटे रहते हैं । कलाकार बिना थके पूरी रात तमाशा जारी रखते हैं और जब सुबह होने लगती है प्रातः वंदना या सूर्य की वंदना कर कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा कर अगले गाँव के लिए कूच कर देते हैं ।
खड़ा तमाशा अब भी महाराष्ट्र के ग्रामीण भागों में मनोरंजन की मुख्य कला है । हाँ समय के साथ इनके विषय बदल गए हैं लेकिन अपने चुटीले संवाद, संवादों की अदायगी, गीत,संगीत, नृत्य और गति की विशेषताओं के साथ इन्टरनेट ,सोशल मीडिया , गाँव की राजनीति, और वर्तमान समस्याएँ भी अब इनमे शामिल हो गए हैं । हालाँकि मनोरंजन अब भी उनका मुख्य उद्देश्य है । आखिर इसका नाम गम्मत है और सब जानते हैं ‘ गम्मत’ का अर्थ हँसी मज़ाक, खेल कूद,दिल्लगी या मनोरंजन होता है ।
बचपन के उन दिनों में जब भी मुझे मौका मिलता था मैं अपने मित्रों के साथ भंडारा की उन बस्तियों में या लगे हुए गाँवो पांढराबोड़ी,खोखुरला,टवेपार,कारधा आदि में खड़ा तमाशा देखने पहुँच जाता था ৷ वैसे हम लोगों की बस्ती भी गरीबों की ही बस्ती थी इसलिए यहाँ भी अक्सर यह कार्यक्रम होते ही थे ৷ गणेशोत्सव और दुर्गा उत्सव में तो यह कार्यक्रम अनिवार्य रूप से किये जाते थे ।
बाज़ार का क्षेत्र और संपन्न लोगों की बस्तियाँ भी हमारी बस्तियों से लगी हुई थीं ৷ शहरी सिनेमा के पोस्टर देख देख कर बड़ी होने वाली पीढी को शुरू शुरू में यह सब देहातीपन लगता था लेकिन जब हमारी बस्तियों से हवा के हेलिकॉप्टर पर सवार होकर तुनतुने और ढोलकी की आवाज़ उन तक पहुँचती , वे लोग भी अपने आपको रोक नहीं पाते और गरीबों की बस्तियों में खड़ा तमाशा देखने पहुँच जाते । तमाशा देखकर लौटते हुए उनमे से कोई न कोई यह ज़रूर कहता था “ बावा..इस खड़ी गम्मत में ना..अपन को सिनेमा से जास्ती मजा आई ৷” और उसका साथी कहता “हौ क्या, बरोब्बर बोला तू ।“
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