10 जून 2026

95 नाना रेटर की झगड़ने वाली बाई



नाना रेटर, जी हाँ आपने ठीक पढ़ा है, मैंने नाना रेटर ही लिखा है नाना पाटेकर नहीं ৷ जैसे आज हमारे प्रसिद्ध फिल्म कलाकार नाना पाटेकर हैं उसी तरह उन दिनों महाराष्ट्र में मंच के एक प्रसिद्ध कलाकार नाना रेटर हुआ करते थे जिन्हें महाराष्ट्र के विविध स्थानों पर अक्सर उनकी मशहूर कला ‘नक्कल’ के लिए आमंत्रित किया जाता था ৷ दुर्गा व गणेश उत्सव में तो उनकी बुकिंग फुल रहती थी ৷ नागपुर के रहने वाले नाना रेटर अपनी जिस विधा के लिए जाने जाते थे उसे मराठी में ‘नकला’ या ‘नक्कल’ कहते हैं ৷ 


‘नक्कल’ की यह कला हमारी प्राचीन कला परम्परा में किये जाने वाले ‘स्वांग’ की ही एक कड़ी है ৷ यह ऑर्केस्ट्रा के मंच पर की जाने वाली मिमिक्री या रिकार्डिंग डांस से बिलकुल अलग मनोरंजन की एक स्वस्थ्य परम्परा है  ৷ इसमें मुख्य कलाकार किसी प्रसिद्ध सामाजिक, राजनैतिक व्यक्ति का स्वांग भरता है अर्थात उसका अभिनय करता है  ৷


नाना रेटर की नकलों का कार्यक्रम देखने के लिए काफ़ी प्रतिष्ठित लोग आते थे ৷ इस कार्यक्रम में मंच सज्जा साधारण ही होती थी ৷ अमूमन मंच खाली होता था या प्रस्तुति के अनुसार टेबल कुर्सी या अन्य प्रॉप्स की व्यवस्था की जाती थी ৷ मंच पर एक स्टैंड माइक या हैंगिंग माइक लगा होता था ৷ नाटक की प्रकाश व्यवस्था की भांति इसमें भी स्पॉट लाइट की व्यवस्था होती थी ৷


हम लोग नाना रेटर की ‘नकला’ देखने के लिए सबसे पहली लाइन में जगह हथिया लेते थे ৷कार्यक्रम शुरू होते ही एक संचालक मंच पर आता था और अनाउंसमेट करता था “अब आपके सामने थोड़ी ही देर में पधारने वाले हैं, हमारे देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ৷” 


हम बच्चे सोच में पड़ जाते, नेहरु जी तो मर गए हैं वे कैसे आएँगे ? फिर थोड़ी देर में मंच पर नेहरूजी के गेट अप में नाना रेटर का प्रवेश होता, चूड़ीदार पायजामा, अचकन, जवाहर जैकेट, सर पर टोपी, कोट में लाल गुलाब और चेहरे पर वही मुस्कान ৷ वे लाल किले से भाषण देने के अंदाज़ में कहते ‘प्यारे देशवासियों..’ हम लोग चौंककर उनकी ओर देखते, गुड्डू वानखेड़े मुझे कोहनी मारता .. “देख तो शरद, एकदम डिट्टो.. नेहरू जी৷”   


फिर थोड़ी देर बाद मंच पर गान्धी भी आते, बिनोबा भावे भी ৷ सरदार पटेल,शहीद भगतसिंह और विवेकानन्द के चरित्रों को नाना रेटर वहाँ साकार करते  ৷ वे केवल प्रसिद्ध नेताओं की ही नहीं बल्कि सामान्य लोगों  की भी नक़ल उतारा करते थे जिनमे सिपाही, बस कंडक्टर,किसान, मजदूर, शिक्षक,चायवाला आदि शामिल होते थे ৷ 


नाना रेटर का एक प्रसिद्ध आइटम था ‘नल पर झगड़ने वाली बाई’৷ इस कैरेक्टर में वे मराठी नौवारी साड़ी यानी लुगड़ा पहनकर आते और फिर अभिनय और संवादों के माध्यम से सरकारी नल पर सुबह सुबह पानी के लिए झगड़ने वाली दो गृहणियों का दृश्य उपस्थित करते ৷ दोनों स्त्रियों की भूमिका वे स्वयं ही करते थे ৷ वे अपनी नौवारी साड़ी का ‘काष्टा’ खोंसकर देहाती मराठी में लड़ने के अंदाज़ में यह संवाद कहते...”आता सांग, तव्हा तू मले का मन्हालीस होती वो... “ यानी यहाँ एक स्त्री दूसरी से कह रही  है .. “अब बोल, तभी तूने क्या कहा था मुझसे ,बता तो ज़रा ? “ इसके बाद वे सीधे सार्वजनिक जल वितरण प्रणाली की कमियां गिनाते ৷ उनका यह अभिनय देखकर लोग हँसते हँसते लोटपोट हो जाते ৷ 


नाना रेटर अपनी अगली भूमिका प्रस्तुत करने से पूर्व  मेकअप और वेशभूषा हेतु ब्रेक लेते थे ৷ इस अंतराल में आयोजकों द्वारा फिलर के रूप में स्थानीय कलाकारों को अपनी कला की प्रस्तुति देने का अवसर प्रदान किया जाता ৷ यह वे युवा होते थे जिनकी महत्वाकांक्षा फ़िल्मी दुनिया में जाने की होती थी लेकिन उनकी यह महत्वाकांक्षा ऑर्केस्ट्रा पार्टी में गायक या रिकार्डिंग डांस में डांसर बनाने में तिरोहित हो जाती थी৷ उनमे से कभी कभार ही कोई मुंबई जाकर ‘एक्स्ट्रा’ बन पाता ৷ सही रूप में नाना रेटर की कला को कोई आत्मसात नहीं कर पाया ৷


नाना रेटर अपनी तरह के अनोखे कलाकार थे ৷ वे अपने आइटम की स्क्रिप्ट स्वयं लिखते थे जिसमे वे राजनीति  पर और शासन की शिक्षा,स्वास्थ्य आदि की कुव्यवस्थाओं पर करारा व्यंग्य करते थे ৷ उनके बाद अब ‘नक्कल’ नामक यह कला लुप्तप्रायः है ৷ यह अब स्टैंड अप कॉमेडी में बदल गई है जिसमे कलाकार का उद्देश्य केवल दर्शक को हँसाना होता है और इसके लिए वह अपनी फूहड़ता में और भाषा में किसी भी स्तर तक नीचे गिर सकता है ৷ आश्चर्य यह कि अब यह सभ्य ऑडियंस की पसंद की चीज़ है ৷ सांस्कृतिक पतन किसका हुआ है आप बेहतर समझ सकते हैं ৷ 



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