मिस पिंकी को नहीं पहचानते आप ? फिर तो मिस रोज़ी, रेशमा और हसीना को भी नहीं पहचानते होंगे ? सिनेमा देखते हुए ध्यान से देखिएगा ,वह जो हीरो हीरोइन के साथ ग्रूप मे ढिंका चिका ढिंका चिका पर डांस करते हुए लड़कियाँ दिखाई देती हैं न , वही हैं यह । इनके कपड़ो पर मत जाइएगा , ये झोपड़ पट्टियों मे रहती हैं । इनका चेहरा भी मत देखिएगा , उस पर मेकअप है । हो सकता है अभी भी अपने बच्चों को दूध पिलाकर शूटिंग पर आई हों ।
जाने कितनी लड़कियाँ ख्वाब लिए मायानगरी मे पहुँचती हैं लेकिन फिल्मी दुनिया मे हर किसी का जाना संभव नहीं होता । फिर वे लड़कियाँ अपनी कला का प्रदर्शन कहाँ करती हैं ? ए बीड़ू.... ज़्यादा अपना पुरुषवादी दिमाग मत लगाओ ,सब लड़कियाँ वहाँ नहीं जातीं जहां तुम सोच रहे हो ।
बचपन मे मैंने सुना था कि ऐसी लड़कियाँ जिन्हे फिल्मी दुनिया मे काम नहीं मिलता छोटी मोटी ऑर्केस्ट्रा पार्टियों , रिकॉर्डिंग डांस पार्टियों मे शामिल हो जाती हैं और गणेशोत्सव और दुर्गा उत्सव में ,प्रदर्शनी आदि मे अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं ।
गणेशोत्सव और दुर्गा उत्सव में भंडारा के दर्शकों के मनोरंजन के लिए ऑर्केस्ट्रा के अलावा फ़िल्मी गानों और नृत्य पर आधारित एक कार्यक्रम काफी प्रचलित था ৷ यह कार्यक्रम ‘रेकॉर्डिंग डांस’ कहलाता था ৷इस कार्यक्रम के लिए भी मंच उसी तरह सजाया जाता जैसे कि ऑर्केस्ट्रा में होता था लेकिन यहाँ वाद्ययंत्र नहीं होते थे इसलिए मंच पूरी तरह खाली होता था ৷
‘रेकॉर्डिंग डांस’ के मंच पर पीछे की ओर एक बड़ा सा पर्दा लगा रहता था जिस पर किसी बगीचे या बड़े शहर की बिल्डिंगों का दृश्य होता था ৷ जनता कुछ देर तक तो उस परदे को ध्यान से देखती थी फिर ऊबकर सीटियाँ बजाने लगती थी ৷ ऑर्केस्ट्रा के दर्शकों की तुलना में यहाँ कम पढ़े लिखे लोगों का बाहुल्य होता था ৷ महिलाएँ अमूमन रिकार्डिंग डांस नहीं देखती थीं इसलिए कि उसमें नर्तक नर्तकियों द्वारा अशोभनीय हाव भाव दर्शाए जाने की गुंजाईश होती थी ৷ घर का पुरुष वर्ग भी उन्हें यह देखने की अनुमति नहीं देता था इसलिए छतों पर भी उनका जमावड़ा नहीं होता था ৷ वैसे भी यह कम बजट वाला पुरुषवादी मनोरंजन कार्यक्रम का एक प्रकार था ৷
जब जनता की उत्कंठा काफी बढ़ जाती पार्श्व से अमीन सयानी के अंदाज़ की नक़ल करती हुई एक आवाज़ आती “मेहरबान कदरदान साहेबान ৷” मुझे वह आवाज़ अमीन सयानी की बजाय उस रिक्शेवाले की आवाज़ की तरह लगती थी जो नई पिक्चर लगने पर सड़क पर मुनादी करता था .. ‘आदर्श टाकीज के रुपहले परदे पर देखिये , आज तीन खेलों में जेमिनी का महान शाहाकार ...महान सामाजिक महान पारिवारिक चित्र फलां फलां ৷’ दर्शकों की सीटियाँ कुछ समय के लिए ठहर जातीं ৷
फिर कुछ पल बाद परदे के पीछे से आवाज़ आती..” इंतज़ार की घड़ियाँ खतम...लीजिये अब आपके सामने हमारी कंपनी की फेमस डांसर मिस पिंकी प्रस्तुत करने जा रही हैं, प्रसिद्ध फिल्म ‘अनोखी रात’ का यह मशहूर गीत , गीत के बोल हैं ‘मेरी बेरी के बेर मत तोड़ो कोई कांटा चुभ जायेगा’৷ बस इसके बाद लोग दिल थाम कर बैठ जाते ৷ इधर साइड में बैठा रिकॉर्ड बजाने वाला एच एम वी के चाबी वाले रिकॉर्ड प्लेयर पर गाने का रिकॉर्ड लगाता और जैसे ही बड़े बड़े लाउड स्पीकरों से आवाज़ बाहर आती मिस पिंकी अरुणा ईरानी के ग्रामीण बाला वाले गेट अप में मंच पर पहुँच जाती और आशा भोंसले की आवाज़ पर होठ हिलाते हुए गाने लगती.. ना ना ना ना ना ना मेरी बेरी के बेर मत तोड़ो .. मेरी बेरी के बेर मत तोड़ो कोई काँटा .. हाय.. कांटा चुभ जायेगा ৷
जनता इस गीत का आनंद लेते हुए कुछ इस तरह प्रतिक्रिया प्रकट करती जैसे उन्हें सही में कांटा चुभ रहा हो ৷ इस प्रकार के नृत्य में हाव भाव किस तरह के होते थे और किस किस एक्शन पर जनता की सिसकारियाँ निकलती थीं यह आप न पूछें तो बेहतर होगा ৷ इसके लिए आप फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ पर बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ में वहीदा रहमान द्वारा नौटंकी में प्रस्तुत गीत ‘पान खाए सैंया हमारो ’ पर वहाँ उपस्थित ऑडियंस की प्रतिक्रिया का स्मरण कर सकते हैं ৷ कभी कभी कोई बेवड़ा अपनी जगह पर खड़े होकर एकाध ठुमका लगाता और फिर बैठ जाता ৷ वैसे भी वहाँ कोई अप्रिय घटना नहीं होती थी इसलिए कि उत्सव आयोजकों के ‘भाई लोग’ पूरे समय तैनात रहते थे ৷
इस तरह रेकॉर्डिंग डांस’ का प्रोग्राम जारी रहता ৷ फिर किसी युगल गीत का रिकॉर्ड बजता जिसमे कोई मास्टर कुमार आते, मिस रोज़ी के साथ, फिर मिस बॉबी आती, कोई मिमिक्री आर्टिस्ट आते, कोई चुटकुलेबाज़ आते, हरेक के आगमन पर सीटियाँ बजाने का क्रम बराबर जारी रहता ৷ कभी कभी रिकॉर्ड की सुई किसी जगह पर अटक जाती उस समय नर्तक या नर्तकी की स्थिति बहुत असमंजस पूर्ण हो जाती ৷ अगर रिकॉर्ड बजाने वाला कहीं हल्का भारी होने गया हो तो उनके लिए और भी मुश्किल हो जाती ৷ तब यह जनता सीटियाँ मारकर और चीख चीख कर उनका स्टेज पर खड़े रहना भी हराम कर देती ৷ पूरे कार्यक्रम में खुशियाँ और प्रतिक्रिया प्रकट करने का यही कल्चरल सिस्टम था ৷
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