10 जून 2026

68.राजनांदगाँव : मुक्तिबोध के राजनांदगाँव में पहला कदम


कुछ साल पहले हिंदी साहित्य में ग्राम्य जीवन पर शहरी लोगों द्वारा लिखी जाने वाली कविता को लेकर एक मुहावरा चलता था ‘रेल की खिड़की से देखे गए गाँव के दृश्यों पर लिखी कविता’ । बचपन के उन दिनों में छत्तीसगढ़ के अपने पहले प्रवास को लेकर मेरा लिखना भी कुछ इसी तरह होगा ।

वे गणेशोत्सव के दिन थे । भंडारा रोड रेल्वे स्टेशन पहुँचने तक भी मुझे पता भी नहीं था कि हम लोग कहाँ जा रहे हैं । बाबूजी दुर्ग,भिलाई,नांदगांव जैसी कोई जगह बता रहे थे । वह शायद कोई पैसेंजर ट्रेन थी जो सुबह भंडारा से निकलती थी । दोपहर के समय हम लोग एक स्टेशन पर उतरे, बाबूजी ने बताया यह राजनांदगांव है ।


हम लोग बाबूजी के एक फूफा के यहाँ जा रहे थे  जो राजनांदगाँव की गुड़ाखू लाइन में रहा करते थे । उन्हें सब लोग लाला गजाधर प्रसाद शर्मा कह कर बुलाते थे । 
इसी जगह था लाला गजाधर प्रसाद का मकान 
मेरी स्मृतियों में उस प्रवास का एक आधा अधूरा  सा कोलाज है जिसमें अब कुछ ख़ास ख़ास चित्र ही शेष हैं उन्ही को लेकर यह ताना बाना बन रहा हूँ ।  हम लोग जिन दिनों राजनांदगाँव गये थे उन दिनों वहाँ गणेशोत्सव चल रहा था और लाला जी के घर के सामने ही एक ऊँचे मचान पर गणेश जी की स्थापना हुई थी । वहाँ लाउडस्पीकर पर हेमंत कुमार का गाया हुआ फिल्म बीस साल बाद का यह  गीत बजा करता था .....’ बेकरार करके हमें  यूँ न जाइये , आपको हमारी कसम लौट आइये ।“ 
इन्ही दो खंभों के बीच बैठते थे गणेश जी 
एक पेड़े वाला था जो शहर की गलियों में चक्कर लगाया करता था यह गाते हुए कि ..” नान्दगाँव आया , नान्दगाँव का पेड़ा नहीं खाया ।“ सो दादाजी ने हमें  पेड़े भी खिलाये, लकड़ी का एक बैल बनाकर दिया और लोहे की एक रिंग भी जिसे मैं घनघड़ी कहता था । इस घन घड़ी को दौड़ाने का प्रयास मैंने गुड़ाखू लाइन और आसपास की गलियों में अवश्य किया लेकिन पाँव बहुत छोटे थे ।  बाद में भंडारा की सड़कों पर इसे लेकर तो मैं बहुत घूमा   
मैं और मेरी घनघड़ी 
राजनांदगाँव में हम लोग एक दिन रानी सागर तालाब भी गये थे । बहुत ही खूबसूरत तालाब था वह । इस ऐतिहासिक तालाब का निर्माण रियासत काल के दौरान वर्ष 1865 में राजा महंत घासीदास द्वारा करवाया गया था, जिसे बाद में राजा महंत दिग्विजय दास द्वारा और अधिक विशाल रूप दिया गया। 

मुझे अच्छी तरह याद है कि वहाँ मैंने एक केकड़ा देखा था । केकड़ा देखे जाने या उसे केकड़े के रूप में याद रखने का का यह पहला अवसर था । हमारा अवचेतन मैग्नेटिक टेप की तरह होता है जिस पर की जाने वाली पहली रिकार्डिंग सबसे बढ़िया होती है । इसीलिए हमें जीवन में पहली बार देखी अनेक चीज़ें हमेशा याद रहती हैं । 

आज भी जब केकड़ा देखता हूँ तो मुझे फ्रायड के लॉ ऑफ़ फ्री एसोसिएशन या मुक्त संयोजन के नियम के अनुसार राजनांदगांव की ही याद आती है । राजनांदगांव के दिग्विजय महाविद्यालय में एक बार मनोविज्ञान पर लेक्स्चार देते हुए मैंने यह उदाहरण दिया तो बच्चों को बहुत मज़ा आया ।

राजनांदगांव के तालाब इतने विशाल और इतने सुन्दर थे कि उनके चित्र आँखों में बसे रहे । बड़े होने के बाद मुझे पता चला कि उसी तालाब के किनारे दिग्विजय महाविद्यालय के परिसर में द्वार के ऊपर बने कमरों में  कवि मुक्तिबोध रहा करते थे । छत्तीसगढ़ में मेरी नौकरी लगने के बाद जब मैं पहली बार राजनान्दगाँव गया तो सबसे पहले  उन्ही जगहों पर गया जहाँ बचपन में मेरे नन्हे पांव गए थे । 


मुक्तिबोध का वह निवास अब पदुमलाल पुन्नालाल बक्षी, तथा बलदेव प्रसाद मिश्र की स्मृतियों का साझा स्मारक है ।


अब वहाँ मुक्तिबोध की कोई गंध नहीं है अलबत्ता कांच के एक टेबल शो केस में उनके लिखे कुछ कागज़ अवश्य हैं ।

मैंने यह आवास चमकती हुई टाइल्स और पेंट की हुई दीवारों वाला स्मारक बनने से पहले जीर्ण शीर्ण रूप में देखा है । पहली बार जब उस जगह पर गया था तो यूहीं ख्याल आया था कि काश अपने पहले राजनांदगांव प्रवास के दौरान बचपन में एक बार इस जगह पर आता जब मुक्तिबोध जी यहाँ रहते थे । तब मैं डींग हांकने के लिए कह सकता था कि मुक्तिबोध ने मुझे बचपन में गोद में खिलाया था ।

राजनांदगाँव शहर मैं जब भी गया यह शहर मुझे अपना सा लगा । नौकरी के प्रारंभिक दिनों में अक्सर यहाँ आना होता था । उन दिनों पक्के मकानों के सामने बड़े बड़े चबूतरे हुआ करते थे जिन पर रात के भोजन के उपरांत पारिवारिक बैठकें हुआ करती थीं जहाँ लोग दुनिया भर की बातें किया करते थे ।


देर रात तक कुल्फी और खारी गरम के ठेले सड़कों पर टहलते रहते थे और खाने के सामानों की दुकानें भी देर रात तक खुली रहती थीं ।



रबड़ी, गुलाब जामुन जैसी मिठाइयों की महक अन्य खुशबुओं के साथ बाज़ारों में विद्यमान रहती थी । इन्ही में एक मिठाई की दूकान थी जो मानव मंदिर कहलाती थी । कहते हैं इस दूकान में कोइ शटर ही नहीं था और वह कभी बंद ही नहीं होती थी । बाद में इमरजेंसी के दौरान वहाँ शटर लगाया गया ।

राजनांदगाँव के बाद अगला पड़ाव भिलाई था । सन पचपन के करीब  मनोहर चाचा बंगलोर की एच एम टी कंपनी की अपनी नौकरी छोड़कर भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी करने के  लिए भिलाई आ गए थे । नेशनल हाइवे क्रमांक छह पर तथा मुंबई हावड़ा रेल लाइन पर राजनान्दगाँव से मात्र तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित भिलाई शहर तब बस ही रहा था । 2 फरवरी 1955 को तत्कालीन सोवियत संघ (USSR) के सहयोग से इस्पात संयत्र की स्थापना की  गई थी।राजनान्दगाँव और भिलाई की संस्कृति में काफी अंतर था । राजनांदगांव एक पुराना शहर था और भिलाई को बसे हुए मात्र कुछ ही साल हुए थे । यह इस्पात कारखाने का क्षेत्र था और यहाँ मजदूर बसते थे । 

चाचा जी उन दिनों भिलाई स्टील प्लांट में काम करते थे और भिलाई टाउनशिप के सेक्टर दो की सड़क पंद्रह में एक छोटे से टेब्युलर शेड क्वार्टर में रहा करते थे । उस समय उनके दो बच्चे थे, सरिता दीदी मुझसे बड़ी थीं और मंजू मुझसे छोटी बाद में उनकी तीन संताने और हुईं गोपाल, ममता और गुड्डू । उनके घर के आगे एक मुरुम का रास्ता था जिसके आगे जाने पर एक पक्की सड़क थी जिस पर बहुत भयानक आवाज़ करते हुए टेम्पो चला करते थे ।

 देश के अलग अलग प्रान्तों से अलग अलग भाषा अलग अलग संस्कृति  के लोगों का भिलाई आगमन जारी थे । आगे चलकर लघु भारत के रूप में विख्यात होने वाला भिलाई शहर उन दिनों बस रहा था । सड़कें और मकान अपनी प्रारम्भिक अवस्था में थे । ज़्यादातर सड़कें मुरुम की थीं । भिलाई से लगा हुआ पुराना शहर दुर्ग भी था । वहाँ मनोहर चाचा की बड़ी बहन ध्यानवती रहा करती थीं । हम लोग एक दिन टेम्पो में बैठकर ध्यान बुआ के यहाँ दुर्ग गये थे । वे लोग दुर्ग स्टेशन के सामने दीपक नगर मोहल्ले में रहा करते थे । दुर्ग में वह मेरा पहला कदम था । उस वक़्त किसे पता था कि मेरी उम्र के इक्कीस साल के बाद का पूरा जीवन  इसी शहर में बीतेगा और मेरे आधार कार्ड पर दुर्ग के न्यू आदर्श नगर में बने एक मकान का पता अंकित होगा । 



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