10 जून 2026

113 अजीब दास्ताँ है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़तम




गर्मियों के उन दिनों में सूरज का ज़ोर बस दोपहर पर ही चलता था ৷ शाम होते ही स्त्रियाँ बाल्टियों में पानी लेकर निकलतीं जिसे आंगन में सींचते हुए वे सूरज के अरमानों पर पानी फेर देतीं ৷ शामें कुछ ऐसी ठंडी हो जाती थीं कि सूरज पर रहम आने लगता ৷ आंगन में पड़ी धूल पर पानी पड़ते ही हवा में मिटटी की सोंधी सोंधी महक उठती ৷ मुझे लगता अगर मैं इत्र फरोश होता तो माटी की वह सोंधी गंध काँच की एक  छोटी सी शीशी में कैद कर लेता और भविष्य में जब भी मुझे खूबसूरत शामों वाले उस अतीत में जाना होता उस शीशी से ख़ुशबू का एक कतरा  रुई के फाये में लगाता और धीरे से कान के पीछे खोंस लेता ৷ 


दोपहर भर अलसाने के बाद इधर मोहल्ले की सयानी कुतिया नीम के पेड़ की छाँव से अंगड़ाई लेकर उठ खड़ी होती, उधर रघुबीर टॉकीज़ की मुंडेर पर लगे लाउडस्पीकर से शाम के पहले खेल की सूचना देता रिकॉर्ड बज उठता ..जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा .. इसका अर्थ होता बुकिंग शुरू हो गई है, अब आप टिकट कटा सकते हैं ৷ गणेश जी की आरती के  बाद धर्म से सीधे संस्कृति में प्रवेश करता हुआ अगला रिकॉर्ड बजता ...प्यार किया कोई चोरी नहीं की प्यार किया... प्यार किया कोई चोरी नहीं की, छुप छुप आहें भरना  क्या, जब प्यार किया तो डरना क्या ..৷ 


बस इतना सुनकर वैजयंती मालाओं, आशा पारेखों, वहीदा रहमानों , निम्मी सिम्मियों, देवानंदों और दिलीप कुमारों के तमाम प्रेमी सिनेमाघर की ओर कदम बढ़ा देते ৷ कुछ ‘अजीब दास्ताँ है ये’ सुनाकर,’लग जा गले के फिर ये मुलाकात हो न हो ’ कहकर और हज़ारों रंग के नज़ारे बन जाने वाले कवि नीरज के ख़त लिखकर रिकार्डिंग का अवरोह पुनः गणेश वंदना के साथ ही होता “जय जय हो गणेश काटो हमरे कलेश, आये शरण तिहारी बलिहारी हो, जय गणपति विजय हमारी हो ৷“ जैसे ही यह वंदना समाप्त होती गेटकीपर दरवाज़ों पर लगे काले पर्दे सर्र से सरका कर गेट बंद करते और भारतीय समाचार चित्र के साथ रघुबीर टाकीज में सिनेमा का पहला खेल शुरू हो जाता ৷  


रघुबीर टाकीज के मंदिर जैसे पवित्र परिसर में हम बच्चों की आवाजाही बिलकुल घर आंगन की तरह ही थी ৷ बुकिंग विंडो पर बुकिंग क्लर्क की और गेट पर गेट कीपर की नौकरी विरासत में लगभग हमारे मोहल्ले के बड़े भैया लोगों को ही मिली हुई थी, सतीश उदासी, राजू उदासी,सुधीर गुंडे, और हमारे दिनेश काका उनमे शामिल ৷ उनके रहने से लाइन में न लगने के अलावा कभी कभी मुफ़्त में फ़िल्म देखने की अतिरिक्त सुविधा भी हम लोगों को मिल ही जाती थी ৷ 


रघुबीर टाकीज़ के परिसर में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर मैनेजर का कक्ष, बालकनी और लेडीज़ क्लास की बुकिंग विंडो थी ৷ बाईं ओर लोवर क्लास की बुकिंग खिड़की और चाय भजिये की होटल, सामने एक लम्बा सा वरांडा उसमे लगा पोस्टर का जाली वाला बॉक्स और थर्ड, सेकण्ड, फर्स्ट और लेडीज़ क्लास के गेट ৷ थर्ड क्लास सबसे आगे की ओर थी यहाँ ज़मीन पर बैठना होता था ৷ उसके पीछे सेकण्ड क्लास थी जहाँ बैठने के लिए  बेंचे थीं जिन पर पीठ टिकाने के लिए पट्टियाँ भी लगी थी ৷ 


लकड़ी की इन पट्टियों में ढेर सारी दरारें थी जिनमे खटमलों ने अपने फ्लैट्स बना लिए थे ৷ दिन भर भूखे रहने वाले यह खूबसूरत से जीव शाम शो शुरू होते ही अपने घरों से बाहर निकलते और जिनकी पीठ उनके घरों की दीवारों से टिकी होती उन पर हमला बोल देते ৷  अब आदमी ‘काँटों से खींच के ये आंचल’ पर नृत्य करती हुई खूबसूरत वहीदा रहमान को देखकर ‘आज फिर जीने की तमन्ना’ पूरी करे या इन शोषक खटमलों पर ध्यान दे ৷


 इसीलिये हम लोग सेकण्ड क्लास में कभी नहीं जाते थे ৷ वैसे भी हमें सैमसंग वाले दारासिंह और ढिशुम ढिशुम वाले शेट्टी पसंद थे ৷ हाँ कभी मुफ्त में सेकण्ड क्लास में बैठने का अवसर प्राप्त हो गया तो सबसे पहले टाकीज से बाहर आते ही वरांडे में पहले अपनी कमीज़ उतारकर उसे ज़ोर ज़ोर से झटकारते ताकि ‘नदी का पानी नदी में जा’ की तरह खटमल वापस अपने निवास स्थान पर चले जाएँ ৷


सेकण्ड क्लास के ठीक पीछे फर्स्ट क्लास थी जहाँ बाकायदा कुर्सियां लगी हुई थीं ৷ हालाँकि इन कुर्सियों में गद्दियाँ नहीं थीं और बैठने वाली सीट बैक पोर्शन की तरह ही दो तीन पटिये जोड़कर बनाई गई थी ৷ यहाँ खटमलों के बंगलों के अलावा उनके बंकर भी बने हुए थे ৷ जैसे ही कोई इन सीटों पर बैठता वे अपने बंकरों में छुप जाते और फिर पूरे तीन घंटे अपने बंकरों से बाहर निकलकर सिनेमा देखने में मग्न लोगों के पार्श्व भाग पर हमला करते रहते ৷ 


फ़र्स्ट क्लास में बैठकर सिनेमा देखने में एक दिक्कत और थी ৷ सेकण्ड क्लास से बाहर आकर हम लोग कमीज तो झटकार लेते थे लेकिन फर्स्ट क्लास से बाहर आकर पैंट उतारकर झटकारना बहुत कठिन काम था ৷ उसके लिए सेंसर बोर्ड से अनुमति भी नहीं मिलती ৷ फिर हम लोग तो हाफ पैंट आश्रम में थे इसलिए हम लोगों के लिए तो और भी मुश्किल थी ৷ खटमलों का प्रत्यक्ष हमला रोकने के लिए हमारे पास आधे अधूरे साधन थे ৷ आखिर पैबंद लगी उन कमज़ोर हाफ़ पैंटों के पीछे हम अपना क्या क्या छुपाते ৷

 

लेडीज़ क्लास यहाँ भी भंडारा की आदर्श और श्रीकृष्ण टाकीज़ की तरह फर्स्ट क्लास के पीछे ही था, जहाँ से बर्तोल्त ब्रेख्त द्वारा बताये गए कैथोर्सिस अर्थात भावनाओं के विरेचन का बिलकुल भी ध्यान न रखते हुए सिसकियाँ, आहें और अरे अरे, च्चा च्च,  उफ़ उफ़ की आवाजें लगातार आती रहती थीं ৷ इन सब आवाजों के अलावा नौनिहालों के इस बोझिल वातावरण को बर्दाश्त न कर पाने की सूचना देने वाले, उनके महाभयंकर रुदन की आवाजें भी इनमें शामिल रहती थीं ৷ खटमलों द्वारा काटे जाने से बचने अथवा उन्हें घर तक ले जाने की विवशता से बचने की उनके लिए कोई संभावना नहीं थी ৷ यह पितृसत्तात्मक समाज था और स्त्रियों को वह सब करने की स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी जो पुरुषों को प्राप्त थी ৷


लेडीज़ क्लास के ऊपर बालकनी थी जिसकी बुकिंग विंडो भी सबसे अलग थी और ऊपर तक जाने की सीढियां भी ৷ यह संपन्न और विशिष्ट लोगों का क्लास था ৷ सुना था कि वहाँ नर्म मखमली गद्दियों वाली कुर्सियां लगी हैं ৷ हम लोगों को सपने में भी कभी बालकनी में बैठकर सिनेमा देखने का ख्याल नहीं आता था ৷ जो लोग बालकनी में बैठकर सिनेमा देखने की हैसियत रखते थे, हम लोग मन ही मन उनसे इर्ष्या करते और सोचते कभी अपना भी टाइम आएगा ৷ 


वर्ग व्यवस्था के इस ढाँचे में हम लोग सर्वहारा थे ৷ अपनी स्थिति  से खुश होते हुए भी हम इन ज़ंजीरों  को तोड़ने का प्रयास करते, हालाँकि थर्ड क्लास में बैठकर बुर्जुआ मानसिकता के फेर में खटमल जैसी आपदाओं से बचने की मान्यता गढ़ लेते और देश की तमाम जनता की भांति थर्ड क्लास में ही खुश रहते ৷ वैसे यहाँ एक सुविधा थी कि हम लोग घर से बोरा ला सकते थे और आराम से पैर फैलाकर और अपने साथी की गोद में सर रखकर लेटे हुए भी पिक्चर देख सकते थे ৷ यथार्थवादी सिनेमा देखते हुए हम कभी कभी यह स्वप्न भी देखते कि कभी तो ऐसी क्रांति होगी जब सभी क्लासों  में एक जैसी कुर्सियाँ होंगी और सभी क्लासों का टिकट भी एक ही मूल्य का होगा ৷ कालांतर में इस स्वप्न का पहला भाग तो पूरा हो गया, लेकिन दूसरा भाग पूरा होना अभी शेष है ৷ हालाँकि ऐसा कभी होगा इस देश में इसकी संभावना तो नहीं के बराबर है ৷



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