उन दिनों बच्चों की गर्मी की छुट्टियाँ होम वर्क और ट्यूशन के आतंक से मुक्त हुआ करती थीं ৷ इधर परीक्षा समाप्त होती और बैतूल में बिताई छुट्टियों के दृश्य स्वप्न में आकर दस्तक देने लगते ৷ सुबह सुबह उठकर टॉवेल और अंतर्वस्त्र लेकर खेत जाना, वहीं खेत में कुएँ की बोरिंग के मोटी धार वाले पाइप के नीचे खड़े होकर नहाना, लौटते हुए रास्ते के दोनों ओर खड़े आम के पेड़ों पर पत्थर चलाना, दोपहर में घर के सामने वाले नीम के नीचे पड़ी खाट पर उधमबाज़ी, या अड्डा जमाकर बच्चों की पत्रिकाएँ पढ़ना और गिल्ली डंडा खेलना । कुछ और दृश्यों में शामिल था शाम को दोस्तों के साथ रेस टीप खेलना या दोस्तों के साथ गले में बाहें डालकर यूँही बाज़ार में भटकना या फिर घर के पीछे वाली रघुबीर टाकीज़ में गेटकीपर को “भैया दो मिनट देखने दो ना” कहकर मुफ्त में फिल्मों के सीन देखना ।
जिस प्रेम की आँच में दोस्तियाँ जवान होती हैं उसमें भंडारा के अपने मोहल्ले और स्कूल के दोस्तों के अलावा बैतूल के अपने दोस्तों का प्रेम भी शामिल है ৷ बैतूल में मेरा जन्म हुआ था इसलिए वहाँ के दोस्तों के साथ पैदायशी शब्द तो जोड़ा ही जा सकता था ৷ इनमे छोटे बड़े सभी मित्र थे ৷ बाजपेयी के यहाँ के पप्पू भैया और टीटू, गुंडे बाबू के यहाँ से सुधीर भाई, दिलीप और बाबा, यशवंत भावसार, अरुण कावले ,माहोरे के यहाँ का विशेष और उदासी के यहाँ के राजू और रमेश और पापा दुबे जी के यहाँ के बच्चे । इतने मित्र तो स्थायी थे ही लेकिन इनमे जुड़ जाते थे गर्मी की छुट्टियों में सबके घर आने वाले काका, मामा, बुआ आदि के बच्चे ৷ इनमे पप्पू टूटू की बहनें थीं, होशंगाबाद से नागपुर से हमारी बुआओं के बच्चे संतोष व लल्ली भैया, बच्चन, कंचन भैया, गुड्डा, पप्पू, पूनम, भुसावल से राजू भैया और हमारे परिवार के जाने कितने बच्चे ৷
ऐसे खेल जिन्हें लड़के लडकियाँ साथ साथ खेल सकते हैं उनमे रेसटीप,छुपम छुपाई या आंखमिचौली लिस्ट में टॉप पर था ৷ शाम अँधेरा हो जाने के बाद यह खेल खेलने में मज़ा आता था ৷ एक बार छुपने की जगह उजागर हो जाने के बाद जगह बार बार बदलनी पड़ती थी ৷ इस तरह हमने जाने कितनी जगहें एक्सप्लोर कीं ৷ यह कभी हमारे पुराने घर की गली होती, कभी बाजपेयी प्रिंटिंग प्रेस का अहाता,या पटेल के निर्माणाधीन मकान की नींव ৷
जाने कितने अँधेरे कोनों में, कितनी फुसफुसाहटों और बाल सुलभ जिज्ञासा भरे स्पर्शों के बीच रेसटीप का यह खेल जो बचपन में शुरू हुआ था जीवन भर चलता रहा ৷ पहले छुपने छुपाने वाले हमउम्र दोस्त हुआ करते थे फिर जैसे जैसे उम्र बढ़ती गई सुख,दुख,खुशी,गम,आंसू,वफ़ा,बेवफ़ाई ,आंसू ,आहें जैसे नए दोस्त बन गए ৷ इन सबसे दोस्ती तो आज भी चल रही है ৷
खेलते खेलते हम बड़े हो रहे हैं यह अहसास तो उन्हीं दिनों हो गया था ৷ जो साथी बड़े होते गए उन्होंने खेलना सबसे पहले बंद किया ৷ जब लड़कियों ने साथ खेलना बंद किया तब पहली बार यह अहसास हुआ कि लडकियाँ लड़कों की अपेक्षा जल्दी बड़ी होती हैं ৷ लड़कियों के साथ खेलने को लेकर टूटू की मम्मी ने एक बार जब हम लोगों को डाँट लगाई तब यह अहसास और गहरा हुआ । उस समय फ्राइड को भी नहीं पढ़ा था मैंने ৷
गहराते हुए इन अहसासों के साए में मेरी दोस्ती दिलीप से हो गई ৷ हम दोनों दो सखियों की भांति अपनी गूढ़ और अंतरंग बातें एक दूसरे से शेयर किया करते ৷ उस उम्र में बातें तो ऐसी कुछ विशेष गूढ़ नहीं होतीं थीं लेकिन लगता है कि उन्हें हमारे अलावा कोई और न जाने ৷
छुट्टियों के बाद मुझे भंडारा वापस लौटना था, हम लोगों ने तय किया कि अगली बार मिलने तक एक दूसरे को चिठ्ठी लिखेंगे ৷ मासूम बचपन की भोली आशंकाओं में एक आशंका यह भी थी कि कोई हमारी चिठ्ठी न पढ़ ले ৷ इसलिए हमने तय किया कि चिठ्ठी स्कूल के पते पर लिखेंगे ৷ लेकिन पढ़े जाने का ख़तरा तो फिर भी था इसलिए हम लोगों ने मेहनत करके एक कोड लैंग्वेज ईज़ाद की जिसमे हिन्दी के अक्षरों के लिए अलग अलग रोमन लिपि के शब्द रखे ৷ जिस अक्षर को आधा लिखना होता उसके ऊपर ‘आ’ लिख देते ৷
दिलीप की पहली चिठ्ठी जो उसने जुलाई में लिखनी प्रारंभ की थी अक्तूबर में जाकर पूरी हुई ৷ उसके बाद ही उसे लेटर बॉक्स में ठिकाना मिला ৷ यह चिठ्ठी एक अंतर्देशीय पत्र के रूप में थी जिस पर पते की जगह लिखा था ‘शरद कोकाश न.पा. विद्यालय भंडारा (महाराष्ट्र)’ आश्चर्य कि पते में स्कूल का पूरा नाम भी नहीं लिखा था फिर भी चिठ्ठी मुझे मिल गई৷ यह चिठ्ठी किताब में छुपा कर मैं घर ले आया ৷ छुप छुप कर चिठ्ठी को डिकोड कर पढ़ने में मुझे एक सप्ताह लगा ৷ इस एक चिठ्ठी में ही इतनी एक्सरसाइज हो गई कि उसके बाद हम लोगों ने इस साहसिक कार्य पर विराम लगा दिया ৷ यह मेरे जीवन का पहला पत्र था जिसे मैंने आज तक संभालकर रखा है ৷
बचपन की यह मासूम दोस्तियाँ साबुन के घोल में नली डुबाकर फूंक से उड़ाए जाने वाले गुब्बारे की तरह होती हैं, कुछ पल इन्द्रधनुष के सात रंगों में चमकती है फ़िर ज़रा सी बेरुखी की हवा लगी और ग़ायब ৷ बड़े होने के बाद तो खैर विचारों और जीवन शैली की भेंट चढ़ जाती हैं ৷ धीरे धीरे दिलीप से मिलना जुलना कम होता गया, हम लोग बचपन की उन रूमानी गलियों को भूलते गए ৷ फिर भीगती हुई मसों में धीरे धीरे यशवंत और अरुण की मित्रता की गंध समाती गई ৷ कॉलेज के दिनों में जब मैं बैतूल में रहकर पढ़ाई कर रहा था यशवंत और अरुण मेरे पक्के दोस्त बन गये । हम तीनों के तिकड़ी बहुत मशहूर थी ।
दिलीप के हाल मुझे बहुत दिनों से पता नहीं हैं, अरुण अब इस दुनिया में नहीं हैं ৷ हाँ यशवंत और उनकी पत्नी शोभा अब भी मेरे प्रिय मित्र हैं ৷ यशवंत अब रायपुर में रह रहे हैं और उनका मकान भी उन्होंने अमलेश्वर में बनाया है जो दुर्ग ज़िले में आता है ৷ बचपन में रेस टीप के दौरान बैतूल के इतवारी बाज़ार के किसी मकान की एक गली में साथ साथ छुपते हुए हमने कभी सोचा नहीं था कि बरसों बाद हम लोग किसी एक जिले में मकान बनाकर साथ साथ रहेंगे ৷ बचपन से जवानी तक सफ़र करने वाली इन दोस्तियों के बारे में विस्तार से फिर कभी ৷
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