एक दिन बीच वाले कमरे की खिड़की से बाहर झाँका तो देखा शरद का चाँद खुले आसमान में अपनी मसें भीगने की उम्र तक आ चुका है और ओस में नहाती हुई चाँदनी को छुप छुप कर देख रहा है । मैंने मेले से लाये अपने कागज़ के साँप से कहा ‘जा, चाँदनी की देह से लिपट जा, चंदन की खुशबू तो उसकी देह से भी आ रही है ।‘ साँप ने कहा ‘ना, वह तो मस्तमगन के फूल की खुशबू है, जो बाबूजी कल किसी के घर से लाए हैं ।‘
मेरे यथार्थ के धरातल पर पहुँचते ही मेले से लाए खिलौनों के साथ लाई गई भुलोबा और भुलाबाई की मिट्टी की मूरत बोल उठी “ओ सांप वाले बाबू ..हमें कब बिठाओगे ?” “ओह, मैं तो भूल ही गया था ।“ मैंने मन ही मन कहा और फटाफट तैयारी करने लगा ।पहले टेबल पर एक कपड़ा बिछाया, माँ और छोटी बहन सीमा मेरी मदद के लिए आ गई और हमने उस पर भुलाबाई और भुलोबा की स्थापना कर दी ।
आप सोच रहे होंगे कौन है यह भुलाबाई और भुलोबा ? अरे, यह कोई और नहीं अपने शंकर पार्वती हैं। जैसे कि हर साल बेटियाँ अपने मायके आती हैं वैसे ही लोक परम्पराओं की हमारी यह भुलाबाई अर्थात गौरी भी अनंत चतुर्दशी से अपने मायके आई हुई है और भुलोबा यानि अपने शंकर जी दशहरे के दिन उसे लेने आये हैं। अब वे ठाठ से अगले पाँच दिन यानी शरद पूर्णिमा तक अपनी ससुराल में रहेंगे और फिर अपनी पार्वती को लेकर वापस चले जाएंगे ।
पुराणों में वर्णित गौरी के अपने पीहर आने का यह मिथक महाराष्ट्र में एक पर्व के रूप में मनाया जाता है जिसमें लड़कियां दशहरे के दिन अपने घर में भुलाबाई की स्थापना करती हैं । पांच दिनों तक हर शाम दिया बाती के बाद लड़कियों की टोली निकलती है, वे बारी बारी से अपनी सखियों के घर जाती हैं और उनके घर बिठाई गई भुलाबाई की पूजा कर बहुत सुन्दर गीत गाती हैं, फिर प्रसाद खाती हैं और घर लौट आती हैं ।
मुझे बचपन से ही हम बच्चों की टीम लीडर लीलाताई की टीम में शामिल होकर सखियों के घर जाने और भुलाबाई के गाने गाने का मौका मिल गया था । हर साल गाते रहने के कारण पांच छह साल की उम्र तक तो पूरे गाने याद हो गए थे जो आज भी याद हैं । जनपदीय मराठी भाषा में गाए जाने वाले भुलाबाई के यह गीत वस्तुतः हमारे लोक जीवन में गाये जाने वाले लोकगीत ही हैं जिनके शब्दों में तत्कालीन संस्कृति की झलक दिखाई देती है । एक बानगी देखिए ..
भाद्रपदे च महिना आला आम्हा मुलींना आनंद झाला
पार्वती म्हणे शंकराला चला हो माझ्या माहेराला
गेल्या बरोबर पाट बसायला विनंती करू यशोदेला
सर्व मुली गोळा झाल्या टिपर्या मध्ये गुंग झाल्या
गाणे गायिले खेळ केला प्रसाद घेऊनि घरी गेल्या ।
इसका आशय कुछ इस प्रकार है कि भाद्रपद का महीना आ गया है और पार्वती शंकर से कह रही हैं “ए, चलो न मेरे पीहर, वहां तुम्हे पाटे पर बैठाया जायेगा और खेलते हुए , तालियों से स्वागत किया जायेगा। मेरी सखियाँ तुम्हारी राह देख रही हैं, वे तुम्हारे स्वागत में गीत गायेंगी और प्रसाद खाकर घर जायेंगी ।
विशेष बात यह है कि इन गीतों में शिव पार्वती कोई देवता नहीं हैं । यहाँ वे सामान्य लोगों की भांति ही आचरण करते हैं, कहीं कहीं उन्हें भील भीलनी भी माना जाता है । यद्यपि इसके पीछे भी एक कथा है कि एक बार द्यूतक्रीड़ा में पार्वती से सब कुछ हार जाने के पश्चात शिवजी जंगल की ओर निकल गए और अपना देवत्व भूल कर भुलोबा नामक भील बन गए । तब पार्वती उन्हें मनाने के लिए भीलनी का रूप धारण कर उन्हें मनाने गईं। इसलिए उनके स्वागत में गाये इन गीतों में भी भजन या आरती जैसा कोई भाव नहीं है ।
विशेष बात यह कि यह भक्ति गीत नहीं हैं, इन लोकगीतों में स्त्री की व्यथा है , परदेस में ब्याही गई बेटी के सुख दुःख के समाचार हैं । वह इन गीतों के माध्यम से अपने उन दुखों का बखान करती है जो उसे ससुराल में मिले होते हैं । प्रसव पीड़ा के समय उसे क्या महसूस होता है , पति,सास,ससुर द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर वह कैसा महसूस करती है इन बातों का सूक्ष्म चित्रण इन गीतों में है ।
इन गीतों को सुनते हुए इस बात का अनुभव होता है कि अपने दुखों को अभिव्यक्त करने के लिए मनुष्य सदा गीतों का सहारा लेता रहा है । स्त्रियों के पास भी अपने शोषण और उत्पीडन को दर्ज करने के लिए इसी लोक का आलम्बन है । दुःख तो दुःख है, एक दिन फूट पड़ेगा, चाहे आंसुओं में ,चाहे गीतों या कविताओं में और जब दुःख की इन्तहा हो जाएगी वह आक्रोश बन जायेगा, प्रतिरोध के लिए ताकत बन जायेगा ।
एक गीत है जिसमे भुलाबाई गर्भवती है, वह मायके जाना चाहती है और सास से कहती है “सासूबाई सासूबाई मला मूळ आल आता तरी धाडाना धाडाना “ लेकिन उसकी सास उसे जाने नहीं दे रही है । वह बहाना बनाते हुए उससे कहती है “ऐसा करो पहले बाड़ी में करेले के बीज बो दो तब चले जाना।“ बहू बीज बो देती है । फिर सास कहती है “ऐसा करो उसकी बेल उग जाने दो फिर अपने मायके चले जाना । “ जब बेल बढ़ जाती है तो कहती है अब उसमे फूल आने दो, फिर कहती है बेल में करेले लग जाने दो। अंततः जब तक बहू करेले की सब्जी बनाकर सास को खिला नहीं देती और जूठन समेट नहीं लेती, उसे मायके जाने की अनुमति नहीं प्राप्त होती ।
फिर कुछ गीतों में मायके में उसके सहेलियों के साथ खेले गए खेल और शरारतों का वर्णन है । भुलाबाई यहाँ प्रसव के लिए आई है । अभी अभी उसे संतान प्राप्ति हुई है । यह संतान बेटा भी हो सकता है और बेटी भी, समस्या तो यह है कि उसका नाम क्या रखा जाए । लड़कियाँ गाती हैं ..
इड़कित जाऊ खिड़कित जाऊ खिड़कित होता बत्ता
भुलोजी ला मुलगा झाला नाव ठेवा दत्ता
मतलब हमारे सामने नाम रखने की समस्या थी तो यूँही सोचते सोचते हम खिड़की के पास चले गए, वहां एक बत्ता रखा था, वही खलबत्ते वाला बत्ता, तो बस बत्ता की तुकबंदी में हमें नाम मिल गया ‘दत्ता’ । अब मान लो अगर लड़की हुई हो तो उसके लिए फिर गाना है
इड़कित जाऊ खिड़कित जाऊ खिड़कित होती वांगी
भुलोजी ला मुलगी झाली नाव ठेवा हिमांगी
यानी इस बार जब हम खिड़की के निकट गए तो वहां वांगी यानी बैंगन रखे थे बस वांगी की तुक में हमें नाम मिल गया हिमांगी । लड़कियां ऐसे ही ‘इड़कित जाऊ खिड़कित जाऊ’ गाती जातीं और गागर की तुक में सागर, धोती की तुक में मोती, डोरी की तुक में गौरी, झाकन की तुक में माखन जैसे नाम रखती जातीं । ( आप भी सोचिये कि अगर आप का नाम भी ऐसे ही रखा जाता तो खिड़की में क्या रखा मिलता ?)
सबसे ज़्यादा मुश्किल तो तब होती है जब मायके आई हुई ससुराल वालों द्वारा सताई हुई भुलाबाई अपनी ससुराल जाने से मना कर देती है । अब बड़ी मुश्किल है, उसे वापस ससुराल जाने के लिए मनाये कैसे ? ससुराल के लोग एक के बाद उसे मनाने के लिए उसके पीहर जाते हैं और उसे भांति भांति के प्रलोभन देते हैं । सबसे पहले सास जाती है अपनी सून यानी बहू को समझाने ..
सासू गेली समजावयाला
चला चला सुनबाई अपुल्या घराला
पाटल्याचा च जोड़ देते तुम्हाला
यानी, ओ बहूरानी अपने घर चलो न, तुम्हे चाँदी की एक जोड़ पायल दूंगी । लेकिन बहू साफ मना कर देती है “पाटल्या च जोड़ नको आम्हाला, मी नाही यायची तुमच्या घरा ला “ .. ना ना सासू माँ, अपनी पायलें अपने पास रखो, मैं नहीं आनेवाली तुम्हारे घर ।
फिर तो ननद आती है, जेठ आते हैं, देवर आते हैं और जरी की साड़ी, चांदी के कमरबंद से लेकर घर की चाबियों तक का प्रलोभन देते है लेकिन बहू जाने को तैयार नहीं है । अंत में जब पति आते हैं और कहते हैं तुझे खूब सारा प्यार दूंगा और अपना प्रिय लाल चाबुक भी दूंगा । तब वह झट जाने को तैयार हो जाती है । ध्यातव्य है कि लाल चाबुक यहाँ सम्पूर्ण अधिकार का प्रतीक है ।
अब इधर भुलाबाई मायके आई है तो वहां उसकी भाभी भी है और भाई के बच्चे भी । इन गीतों में ननद भौजी की चुहल भी है, जैसे एक गीत में भौजाई सींके पर रखा हुआ मक्खन चुराकर खा जाती है तब ननद कहती है .. “तुम अपने आप को भैया के इतना करीब मत समझो, अभी मेरे भैया आयेंगे तो उनकी गोद में बैठकर तुम्हारी चुगली करूंगी .. कहूंगी “दादा तुमची बायको चोट्टी चोट्टी” दादा यानी भाई और बायको यानी पत्नी । भाभी कहती है “नहीं नहीं, ऐसा मत कहना ।“ फिर धीरे से भाभी उसे प्यार से मना भी लेती है ।
भुलाबाई के सारे गीत सुनने के बाद आप महसूस करेंगे कि इन गीतों में केवल घर परिवार की ही नहीं तत्कालीन ग्रामीण संस्कृति की झलक भी है, जैसे कृषि के कार्यों और पशुपालन में एक स्त्री की भूमिका, महाजन द्वारा सताए जाने पर उपजी मानसिक स्थिति, पति के पास काम न होने पर अभावों का जीवन , अन्य तीज त्यौहार और पर्वों का आनंद, सब कुछ ।
महाराष्ट्र में सावित्रीबाई फुले जैसी शिक्षिका रही हैं जिन्होंने सन अठारह सौ बावन में देश के सर्वप्रथम बालिका विद्यालय की स्थापना की थी । उसीका परिणाम है कि महाराष्ट्र की स्त्रियाँ स्त्री स्वातंत्र्य, स्वावलंबन और अध्ययन में बहुत आगे हैं । भुलाबाई उत्सव पर गाए गीत उनके संस्कारों में हैं जो उनके भीतर अपने शोषण के प्रतिकार की ताकत पैदा करते हैं ।
लड़कियों के साथ घर घर जाकर भुलाबाई के गीत गाने और प्रसाद खाने का बचपन का वह दौर बीत गया लेकिन आज भी मेरी स्मृतियों में सब कुछ जस का तस है, ताली बजाकर झूम झूम कर गाना और गाने का हमारा टाइम श्येडूल समाप्त के बाद घोषणा करना ..
बाना बाई बाणा सुरेख बाणा
गाने संपले खिरापत आणा
मतलब अब गाने ख़त्म हो गए जल्दी से प्रसाद लाओ , अगले घर भी जाना है । इतना सुनते ही उस घर की बिटिया एक बंद डिब्बे में प्रसाद लेकर आती और डिब्बे को हिलाकर सब सखियों से पूछती “ ओळखा काय ?” यानी बूझो क्या ? फिर सब बच्चे उस ध्वनि को सुनकर अपनी अक्ल भिड़ाते और प्रसाद का नाम बताते , चना मुर्रा, फल्ली दाना, चिरौंजी दाना, गुड़ पट्टी ऐसा ही कुछ , फिर उसे खाते हुए अगले घर के लिए रवाना हो जाते । इस तरह यह सिलसिला कोजागरी यानी शरद पूर्णिमा तक चलता रहता । शरद पूर्णिमा के दिन भुलाबाई भुलोजी अपने घर, हम अपने घर।
आप लोग देख क्या रहे हैं ? भुलाबाई के गाने की कहानी समाप्त हो गई है । अब आपको अगली पोस्ट पर भी तो जाना होगा ना ? हाँ यह पोस्ट आपको कैसी लगी और खिड़की में आपके नाम के तुक वाली कौनसी वस्तु होना चाहिए यह बताना मत भूलियेगा, आपके कमेन्ट की प्रतीक्षा रहेगी ।

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