9 जून 2026

64.मेरे बचपन का मुंबई ऐसा नहीं था



मशहूर लेखक कृष्ण चंदर का एक उपन्यास है ‘ दादर पुल के बच्चे ‘ । कृष्ण चंदर अपने उपन्यास में सामाजिक विसंगतियों और पूंजीवाद, औद्योगीकरण के दुष्परिणाम जैसे विषयों को कथा सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत करते रहे हैं । इस उपन्यास में लेखक स्वयं की कल्पना एक ग़रीब बच्चे के रूप में करते हैं जो मुंबई के फुटपाथ पर रहता है । उपन्यास में एक ऐसी फैंटेसी बुनी गई है जिसमे ईश्वर, धर्म आदि पर गहरा व्यंग्य है ।  
दादर पुल के बच्चे 
कथा के अनुसार एक दिन भगवान का मन होता है कि वे धरती पर जाकर लोगों के हाल चाल जानें सो वे एक बच्चे का रूप धारण करते हैं और इस बच्चे से मिलते हैं । उसके बाद जैसे कि कृष्ण चंदर की विशेषता है वे मुंबई की सैर करवाते हैं और बच्चों को पकड़कर भीख मंगवाने वाले गिरोह की दास्ताँ सुनाते हैं । उपन्यास का अंत बहुत रोचक है जहाँ भगवान बच्चा पकड़ने वाले गिरोह द्वारा पकड़ लिए जाते हैं और फिर एक दिन वे अंधे बच्चे के रूप में दादर पुल पर भीख माँगते हुए दिखाई देते हैं ।
2009 मे दादर पुल 
बैतूल से गर्मियाँ बिताकर लौटने के पश्चात दिवाली की छुट्टियों में मुंबई जाने का प्रोग्राम बन गया । मैंने पहली दूसरी दोनों कक्षाओं की परीक्षा एक साथ दी थी इसलिए मैं सीधे तीसरी कक्षा में पहुँच चुका था । पहली कक्षा के सभी साथी,जैनेन्द्र, जितेन्द्र भी मुझसे एक साल पीछे हो गए । कुछ दिनों तक तो मुझे अपने दोस्तों से बिछड़ने का दुख सताता रहा और नई क्लास में बुरा लगता रहा लेकिन फिर इसकी आदत हो गई । तीसरी कक्षा में शीघ्र ही मेरे नये साथी बन गए जिनमे नईम और घनश्याम मेरे प्रिय मित्रों में थे । 

भीगा हुआ बस्ता लेकर घर लौटने का मौसम खत्म हो गया था और धूप सेंकने के दिन आ गए थे । बाबूजी ने कहा इस बार दिवाली में बैतूल की बजाय मुंबई चलते हैं । बड़े मामा श्री दयानंद शर्मा कुछ दिन पूर्व  ही रेल्वे की अपनी नौकरी में तबादले पर झाँसी से बम्बई आये थे । एक साल पहले जब  वे झाँसी में थे तब एक बार माँ के साथ मेरा झाँसी जाना हुआ था । 

झाँसी में नाना के बड़ें से तिमंजिला मकान था ।

नाना के झांसी के मकान की छत 
नाना का निधन तो माँ के विवाह से पूर्व ही हो चुका था लेकिन उनके बेटे उस मकान में रहा करते थे l दयानंद मामा ने अपनी रेल्वे की नौकरी की शुरुआत झाँसी से की थी । उस मकान की मुझे इतनी ही स्मृति है कि उसकी छत पर मैं अपने दो बड़े ममेरे भाइयों लाल दादा और मणि दादा के साथ खेला करता था । हम लोग साड़ी में चावल का माड़ लगाकर उसे कड़क करते थे और छत पर उसका तम्बू बनाया करते थे । मकान के ऊँचे चबूतरे पर बैठकर नीचे एक गढ्ढे से जिसे मैं कुआँ कहता था ,रस्सी में बन्धी एक छोटी सी बाल्टी से पानी भरना मेरा प्रिय खेल था ।
माँ और सर्वदानंद मामा के साथ झांसी मे 
नाना के घर के पास ही श्री विष्णुदत्त भारद्वाज रहते थे , उन्हें मैं मामा कहता था । बाद में उनकी बेटी शशि  से नागपुर के बच्चन भैया का विवाह हुआ ।  

बंबई की उस पहली यात्रा में एक मज़ेदार बात यह हुई थी कि बाबूजी ने वहाँ जाने से पहले मार्ग में आनेवाले शहरों में रहने वाले अपने अनेक भूतपूर्व छात्रों को पत्र लिख दिये थे । हर स्टेशन पर कोई न कोई मिलने आ ही जाता था । कोई मिठाई लेकर आता, तो कोई किताबें और कोई पटाखे । बाबूजी के एक छात्र श्री हरगुणानी की मुझे याद है वे मेरे लिये कहानी की किताबें लेकर आये थे  । 

मुम्बई में पहली बार मैंने लोगों को फुटपाथ पर ज़िंदगी बिताते हुए देखा । हालाँकि मामा के घर में रहते हुए इस बात का अहसास ही नहीं होता था कि मुंबई में जगह की इतनी कमी है । मामा  पश्चिम रेल्वे में फोरमैन थे और माटुंगा में वेंडन एवेन्यू रोड पर उन्हें रेल्वे का एक बहुत बड़ा बंगला मिला था जिसमें तीन या चार बाथरूम थे और सामने एक बहुत बड़ा लान जिसमें  एक फ़ौवारा भी था । बंगले के आसपास बहुत सारी जगह थी जिसमें अनेक पेड़ लगे हुए थे । 

C 97 wenden Avenue Matunga 

साठ के दशक का बम्बई अपने ब्लैक एंड वाइट से रंगीन होते हुए दृश्यों के साथ  मेरे अवचेतन की फ़िल्म में दर्ज हो गया  था । इस फिल्म में मामाजी के घर के पास की दादर चौपाटी थी,


एक अजायबघर,

मछलीघर,

जुहू चौपाटी,

रानीबाग का ज़ू,

गेट वे ऑफ इंडिया

मैरिन ड्राइव

और हैंगिंग गार्डन में बने जूते के दृश्य थे । 

चौड़ी चौड़ी सड़कें मेरी नन्ही आँखों में नहीं समाती थीं और लोकल ट्रेन पकड़ने के लिए पाँव  उतने तेज़ दौड़ नहीं पाते थे । मुझे लोकल ट्रेन की बजाय बी ई एस टी की डबल डेकर बस


और धीरे धीरे रेंगती हुई ट्राम ज़्यादा अच्छी लगी । 1964 में यात्रियों की कम संख्या और आधुनिक बसों की तुलना में धीमी गति होने के कारण 'बेस्ट' (BEST) द्वारा ट्राम को बंद कर दिया गया।


“ए भाय तुम क्या करेला, कायकू खाली पीली बूम मारता” जैसे वाक्य कानों के लिए नए थे । मुझे नहीं पता था ‘करेला’ एक सब्ज़ी के अलावा ‘क्या कर रहे हो’ का भी शॉर्ट फॉर्म है ।  

मामाजी के पाँच बच्चों में चार मुझसे बड़े हैं और एक मेरे बराबर । आनंद यानि लाल दा ,अनूप यानि मणि दा, मंजू दीदी और मीना यानि बेबी दी, मुझसे छोटा अनिल यानि पप्पू । जिस दिन हम लोग कहीं नहीं जाते घर में ही खेला करते थे । 

हमारे रिश्तेदारों में सबसे पहले मामाजी ने ही मुम्बई में कदम रखा था । उसके बाद 1975 में वीरेन्द्र चाचा वहाँ गये,

फिर उषा बुआ,

छाया बुआ

और मधु जीजी

का विवाह वहाँ हुआ । इस तरह मुम्बई आना जाना लगा रहा । हालाँकि पैतृक परिवार में दादाजी के एक चचेरे भाई रामप्रसाद शर्मा भी वहाँ जाकर बस गए थे ।

मुम्बई उन दिनों भारत के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए विदेश से कम नहीं था । भारत से जाने के बाद अंग्रेज़ अपनी अंग्रेज़ियत की जितनी निशानियाँ छोड़ गये थे वे सब भारत के महानगरों दिल्ली, कलकत्ता, मुम्बई और मद्रास में दिखाई देती थीं । फिर भी इन महानगरों में आधुनिकता के बावजूद उनकी अपनी स्थानीयता एवं संस्कृति बरक़रार थी । पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच अक्सर अंग्रेज़ों के शासन की अच्छाइयों बुराइयों को लेकर बहस हुआ करती थी । औद्योगीकरण की राह पर कदम रख चुके मुंबई में कपड़ा मिलें जितनी जगह घेर रही थीं


उससे अधिक बड़ी जगहों पर फिल्म स्टूडियो खुलने लगे थे ।

फलते फूलते सिनेमा उद्योग ने  उसे मायानगरी नाम दिया । मुंबई में बच्चे उतने जन्म नहीं ले रहे थे लेकिन अपने सपनो की तलाश में यहाँ आनेवाले लोगों की वज़ह से मुंबई की जनसँख्या लगातार बढती ही जा रही थी ।

आनेवाले वर्षों में भी मेरे बड़े होते हुए पाँव मुंबई की सड़कों को नापते रहे । फुटपाथ पर रहने वालों को देख कर मेरे कदम ठिठक जाते  । इतनी कम जगह में इतनी कम सुविधाओं के साथ लोगों का रह लेना मेरे लिए आश्चर्य से कम न था । मामाजी का बंगला काफी बड़ा था इसलिए हम लोग वहाँ बहुत मज़े में रहते थे लेकिन मुंबई के आम लोगों की हालत बहुत ख़राब थी । बाबूजी के काका यानि हमारे रामप्रसाद बाबा भी कुर्ला में एक चाल में एक कमरे में रहा करते थे l उनके घर जाने पर ही मुझे पता चला कि चाल और खोली किसे कहते हैं और इनमे मुंबई में लोग किस तरह समाते  हैं ।




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