कविता में अगर मैं आपसे कहूँ कि ‘ख़ुद से रोज़ बातें किया कीजे तो’ आप कहेंगे वाह क्या पंक्ति है लेकिन कोई किसी के बारे में आपसे कहे कि उसे जाने क्या हो गया है वह जाने क्या क्या बड़बड़ाया करता है, मानो अपने आप से बातें किया करता है तो आप कहेंगे अवश्य उसके मस्तिष्क में कोई विकार उत्पन्न हो गया है ।
वस्तुतः अपने आप से बातें करना यह कोई मानसिक विकृति नहीं है बल्कि एक सामान्य प्रक्रिया है, जब भी हम कोई विचार करते हैं या कोई बात हमारे मन में चलती रहती है हम अपने आप से बातें ही तो करते हैं बस उसमे आवाज़ नहीं होती । जब अमीर ख़ुसरो लिखते हैं ‘गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस , चल ख़ुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस’ तब वे अपने आप ही से तो बात करते हैं ।
दिवाली की छुट्टियों के बाद कुछ दिनों तक मेरा मन पढ़ने में नहीं लगा ।
यह 1964 की बात होगी । मैं अपने आप से जाने क्या क्या बातें किया करता था, कक्षा में भी अजीब सा लगता था । सभी छात्र छात्राएँ न केवल उम्र में बल्कि डील डौल में भी मुझसे बड़े थे । कोर्स भी थोड़ा ज़्यादा था । उस साल की शामें खेल के मैदान में नहीं बल्कि पढ़ने की टेबल पर झुके झुके बीतीं । वार्षिक परीक्षा संपन्न हुई, पर्चे भी अच्छे हुए लेकिन वार्षिक परीक्षा का परिणाम मुझे मुँह चिढ़ा रहा था ..चौथा नंबर... क्लास में चौथा नंबर । तीन लोग मुझसे एक एक नम्बर से आगे थे । हालाँकि अंकों का प्रतिशत कम नहीं था लेकिन बचपन से मेरे कच्चे मस्तिष्क में यह बात डाल दी गई थी कि तुम्हे नंबर वन रहना है ।
उन दिनों के माँ बाप से लेकर आज के दिनों के माँ बाप तक अपने बच्चों के दिमाग में यही भरते हैं कि तुम्हें नंबर वन पर रहना है, टॉप पर रहना है क्लास में, धंधे में, खूबसूरती में, सम्पन्नता में,परिवार में समाज में । माँ बाप के बाद फिर काका मामा और यह ज़माने भर के मोटिवेशनल प्रोफेशनल्स और बेस्ट सेलर किताबे , सफल बनो, धन कमाओ,अमीर बनो,नंबर वन पर बने रहने का रहस्य, बड़ी सोच बड़ा चमत्कार आदि आदि , सब हमारे पीछे पड़े रहते हैं ।
मैं भी बरसों तक इसी फेर में पड़ा रहा, फिर एक दिन मेरी समझ में आया कि अगर हर व्यक्ति पहले नंबर पर रहेगा तो दूसरे नंबर पर कौन रहेगा ? हर जगह पहले नंबर पर रहने की ज़िद के बजाय हम एक अच्छे विद्यार्थी, अच्छी संतान, अच्छे इंसान बनने के बारे में क्यों नहीं सोचते ?
लेकिन वह बचपन का कच्चा मन था जिसमे यह बात कहीं घर कर गई कि दो कक्षायें एक साथ पास कर लेने के कारण और सबसे कम उम्र का होने के कारण मुझे जानबूझ कर कम नम्बर दिये गये हैं । परीक्षाफल लेकर घर लौटा तो माँ खाना बना रही थी । मैंने बहुत डरते डरते उन्हें अपना परीक्षा परिणाम बताया । उन्होंने कहा “जाओ जाकर नहाओ और खाना खा लो ।“ जब घर के भीतर की हवा तक ने यह बात सुन ली तो बाबूजी को तो ज्ञात होना ही था । बाबूजी मार्कशीट देख रहे थे और मैं उन्हें । उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था मुझे पहली बार उनका चेहरा देखकर डर सा लगा । मेरे मन में यह बात चुभती रही कि मुझे इस बात के लिए किसी ने डांटा क्यों नहीं कि क्लास में मेरी रैंक प्रथम क्यों नहीं आई ।
उधर जवाहर नगर जाने वाली रेल पटरियों के उस पार सूरज डूब रहा था और इधर मैं अपने आप में । डूबता सूरज मानो अपनी तपन मुझे सौंप गया । माँ ने माथा छुआ तो चौंक गई । बाबूजी के पास लकड़ी का एक बक्सा था जिसमे डॉ.शुश्लर की कुछ बायोकेमिक दवाएँ थीं । उनमे से कोई दवा उन्होंने मुझे दी लेकिन राहत नहीं मिली , बुखार था कि बढ़ता ही जा रहा था । माँ ने ठंडे पानी की पट्टियाँ रखीं, बुखार कुछ कम हुआ लेकिन रात में फिर बढ़ गया ।
बुखार में जैसे मैं इस दुनिया में नहीं था । रगों के भीतर रक्त के स्थान पर मानो गर्म लावा बह रहा था। मेरे अवचेतन से भय के भयावह दैत्य बाहर निकलकर मुझे डरा रहे थे । कुछ दिन पहले ही हमारे पड़ोस में भेदरे बाबू की बेटी लता की अत्यधिक बुखार के कारण मृत्यु हो गई थी । लता मेरी सखी थी और उसके इस असामयिक निधन से मुझे बहुत आघात पहुँचा था । माँ रात भर मेरे सिरहाने बैठी रही और मैं बुखार में बड़बड़ाता रहा “ माँ मुझे कहीं लता की तरह तो नहीं हो जायेगा ...मैं मर तो नहीं जाउँगा माँ ...“ इस बड़बड़ाहट में न कोई प्रश्नचिन्ह था न कोई पूर्णविराम ।
बरसों बाद जब मैंने अपने मृत्युभय के कारण या वयस्क होने के बाद भी बार बार स्वयं को असुरक्षित महसूस करने के कारणों के बारे में सोचा तो मुझे अहसास हुआ, मेरा भय इसी ट्रॉमा के कारण था । ट्रॉमा का अर्थ होता है बचपन में घटित कोई दुर्घटना, कोई भयप्रद प्रसंग, शारीरिक विकलांगता, तेज़ बुखार,अथवा किसी भावनात्मक प्रसंग की वज़ह से होने वाला मानसिक आघात ।
इस तरह के असुरक्षा बोध की शुरुआत अक्सर बचपन में ही हो जाती है l अनजाने में ही यह भय हमारे अवचेतन में समा जाता है और फिर हम जीवन भर मृत्यु से डरते रहते हैं । इसी भय को दूर करने के लिए मानसिक चिकित्सा की जाती है जिसके अंतर्गत साइको थेरेपी अथवा हिप्नोथेरेपी द्वारा ऐसे व्यक्ति को उसके अतीत में ले जाकर उसके मन से असुरक्षा का भाव दूर किया जाता है ।
मेरा बुखार ठीक नहीं हो पा रहा था, हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी फिर एक दिन बाबूजी एक डॉक्टर को लेकर आए, उसने जाँच की और बताया कि बच्चे को टाइफाइड है । ‘टाइफाइड’ यह शब्द उन दिनों के इस अविकसित देश के जनमानस में एक बम की तरह फटा करता था ।लेकिन बाबूजी पढ़े लिखे थे और ज़ाहिर है ऐसी बातों से घबराने वाले नहीं थे । एंटीबायोटिक आदि से मेरे टाइफाइड का उपचार प्रारंभ हो गया ।
गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी थीं, भंडारा के रेलवे स्टेशन पर कुछ कार्ड नुमा टिकटें जिन पर ‘भंडारा रोड से बैतूल’ ऐसा छपा था, ख़ुद पर किसी तारीख के पंच होने की राह देख रही थीं । डाक का लाल डिब्बा अपने ठसाठस भरे होने के बावजूद दादाजी को लिखा बाबूजी का पोस्टकार्ड स्वीकार कर चुका था यद्यपि उसमे मेरी बीमारी की सूचना नहीं थी ।
अगले ही दिन सुबह नौ बजे के लगभग आँगन का टीन का दरवाज़ा जोरों से चीखा । वह मेरे दादा जी श्री बाबूलाल जी वैद्य का स्वागत कर रहा था । बाबूजी द्वारा उनके चरण स्पर्श करने के बाद आशीर्वाद की जगह उनके मुख से निकला “ कैसी है शरद की तबियत ? “ बाबूजी को उनके आश्चर्य में उलझा हुआ छोड़ कर वे मेरी नाड़ी देखने लगे । उनके मुँह से निकली हल्की सी बुदबुदाहट में मैंने सुना ‘विषम ज्वर’ । यह टाइफाइड का देसी नाम है । बापू ने तुरंत आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से मेरा उपचार प्रारंभ कर दिया ।
सबसे पहले उन्होंने एक बाल्टी ठंडा पानी मंगवाया और उसमे एक मोटा कम्बल भिगोकर उसे फर्श पर बिछा दिया । फिर मुस्कुराते हुए अपने कुरते की जेब से कुछ चिल्लर पैसे निकाले और मेरी नन्ही हथेली पर रख दिए फिर पुचकारते हुए मेरे कपड़े उतारने शुरू कर दिए । मैं समझ गया, वे पैसे मुझे नंगा होने के लिए प्रोत्साहन स्वरूप दिए गए थे । उन्होंने मुझे उस गीले कम्बल पर मुझे लिटा दिया ।
फिर उन्होंने एक सूती चादर को गीला कर उसे अच्छी तरह निचोड़ा और मुझे उढ़ा दिया । फिर हाथों से दबा दबा कर उन्होंने मेरे शरीर का एक एक अंग उस गीली चादर से चिपका दिया । मेरा शरीर इतना गर्म था कि कुछ ही देर में चादर सूख जाती थी । ऐसा उन्होंने तीन या चार बार किया । आश्चर्य कुछ ही देर में मेरा बुखार उतर गया । उसके बाद उन्होने कुछ और चिल्लर पैसे अपनी जेब से निकाले और मुझे दे दिये । मैं मुस्कुराने लगा । यह कपड़े पहन लेने के लिए प्रोत्साहन था ।
इसके बाद उन्होंने अपने बैग से कुछ पुडिया निकाली और वह दवा मुझे खिलाई और एक गिलास पानी फूँक कर मुझे पिला दिया । उन्होंने बाबूजी से कहा ..” बस यह अब ठीक हो गया समझो, अब इसे कल बुखार नहीं आएगा और इसे जीवन में कभी टाइफाइड भी नहीं होगा । “ आश्चर्य, दूसरे दिन मुझे बुखार नहीं आया । तीसरे दिन उन्होंने कहा “चलो, बैतूल चलने की तैयारी करो । फिर अगले ही दिन हम लोग बैतूल के लिये रवाना हो गये ।
नागपुर स्टेशन पर स्टेशन के बाहर से गुलाबी रंग के प्लास्टिक के वाटरबैग में पानी लाते हुए, एक हाथ से धोती को तनिक ऊपर की ओर उठाये दादाजी की वह आकृति अभी भी मेरे जेहन में है ।यह भी याद है कि प्लेटफ़ॉर्म पर सामान के निकट बैठे बाबूजी के पास पहुँचते ही बाबूजी ने उनसे पूछा था “ बापू, इस वाटर बैग का ढक्कन कहाँ भूल आये ?” दादाजी ने बोतल का ढक्कन लगा दिया था लेकिन उसके ऊपर का वह प्याले नुमा ढक्कन चाय की दुकान पर छोड़ आये थे जो उनके दोबारा वहाँ जाने तक किसी और के साथ चला गया था ।
दादाजी द्वारा मुझे दिया गया सजेशन, मनोविज्ञान के लॉ ऑफ़ सजेशन के मुताबिक काम कर रहा है और मुझे उसके बाद अब तक तो टाइफाइड नहीं हुआ है । कोविड के बारे में मैं सेल्फ हिप्नोटिज्म की प्रोसेस में खुद को यह सजेशन दे ही चुका हूँ कि अब मुझे दोबारा कोविड नहीं होगा लेकिन केवल मनोविज्ञान के भरोसे खुद को पूरी तरह नहीं छोड़ा है, विज्ञान की सलाह से मास्क भी पहनता हूँ और व्यायाम के साथ साथ इम्युनिटी बढ़ाने के सभी उपाय भी करता हूँ ।

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