9 जून 2026

62.नागपुर तीन : ज़िन्दा तिलिस्मात’ और ‘ खड़क्या नाग तेल’

लीला मौसी के साथ एक तस्वीर 
लीला मौसी के पास बातों का पिटारा था । नागपुर शहर में कौनसी टाकीज में कौनसी पिक्चर चल रही है, उसमे किस एक्टर एक्ट्रेस ने कैसी एक्टिंग की है , यहाँ से लेकर पाकिस्तान में मार्शल ला क्यों लगाया गया है इन तमाम बातों पर वे बेबाक टिप्पणी किया करतीं । रात में वे बाँदा, फैज़ाबाद और झाँसी के किस्से भी सुनाया करतीं थीं माँ उनकी तुलना में कम ही बातें करती थीं । 

चाचाजी अपनी रेल्वे की ड्यूटी में अक्सर बाहर रहा करते थे, इसलिए घर की रेल चलाने की ज़िम्मेदारी मौसी की होती । फिर दिनभर के कामों से फुर्सत पाकर शाम को वे हम बच्चों को घुमाने के लिए बाज़ार ले जाया करती थीं मैं, प्रभात ,संध्या और निशा । प्रणय का जन्म कुछ समय बाद हुआ । कभी कभी मुंबई से लाल दादा या मंजू दीदी भी आ जातीं थीं ।  

नागपुर की भीड़ और रौशनियों के आकर्षण में मैं एक बड़े शहर को पहचानने की कोशिश कर रहा था । 

लोग,वेशभूषा,भाषायें,बोलियाँ,रंग,ढंग,वस्तुएँ,रौशनी,आवाजें,कहकहे,शोर,गीत,संगीत,स्वाद,गंध हर एक की जाने कितनी किस्में । सच कहूँ तो मैंने इसी तरह भीड़ भरे बाज़ारों में ज़िंदगी को महसूसना शुरू किया ।

इतवारी के इस एरिये में  इतनी घनी बसाहट है कि आप राह चलते लोगों के जिस्म की गंध भी महसूस कर सकते हैं । यहाँ दुकानों के बीच मकान हैं और मकानों के बीच दुकाने हैं । तंग गलियाँ, भीड़ से भरे बाज़ार, मिर्ची बाज़ार में मिर्ची की धौंस, लकड़गंज में आरा मशीनों की कतारें, गांधीबाग में फटाका एंड फटाका कंपनी, तंग गलियों के छोटे छोटे मकानों के सामने सुबह सुबह नल से पानी भरती औरतें, रिक्शे पर पंद्रह बीस बच्चों को बिठाकर उमस भरी सड़कों पर रिक्शा खींचते पसीने से तरबतर रिक्शेवाले,मंगलवार और शनिवार को मारुति के मंदिर के सामने भक्तों की भीड़,मिसल,भेल और लीची के ठेले,सड़क के किनारे बैठी सब्जी वालियाँ । मेहनतकश लोगों के जीवन के इन खूबसूरत दृश्यों ने मुझे न कभी सुविधाजीवी होने दिया और न कभी शुद्धतावादी । 

बच्चों के अवचेतन में जो अनुभूतियाँ सर्वप्रथम दर्ज होती हैं उनमे मनोरंजन से अधिक खाने-पीने की स्मृतियाँ होती हैं । उन दिनों जब पाँवों को स्वतन्त्र रूप से भटकने की सुविधा प्राप्त नहीं हुई थी मौसी सबसे पहले हमें कीर्ति रेस्टारेंट ले गई थी जहाँ के दोसे का स्वाद अभी भी रसना पर है । कीर्ति रेस्टारेंट उन दिनों का पॉश होटल था, वहाँ वे लोग ही आ सकते थे जिनकी जेबें कुछ भारी होती थीं । चीज़ें तो बहुत सी खाई यहाँ लेकिन स्मृति में केवल दोसा ही है । उसी तरह आइसक्रीम के लिए वहाँ दिनशा की दुकान प्रसिद्ध थी । भंडारा की मटका छाप कुल्फी के बाद मशीन द्वारा बनाई गई आइसक्रीम का स्वाद पहली बार यहीं चखा था । कीर्ति  रेस्टारेंट तो अब नहीं है लेकिन दिनशा आइसक्रीम का कारोबार कुछ ऐसा बढ़ा कि अब तो देश विदेश में भी उसकी शाखाएँ हो गई हैं ।

जैसे ही पाँवों के जूते का साइज़ थोड़ा बड़ा हुआ, मौसी के साथ इतवारी का बाज़ार घूमने की बाध्यता समाप्त हो गई । फिर तो मैं रोज़ ही शाम के समय घूमने निकलता था और दूर दूर तक चला जाता था । रेल्वे का पुल पार करते ही मिर्ची बाज़ार आता था । उसके आगे बाज़ार ही बाज़ार थे और उन बाज़ारों में अलग अलग जिंसों की दुकानों की लाइनें थीं । मराठी में लाइन को ओली कहा जाता है इसलिए इन ओलियों के नाम कुछ इस तरह के थे जैसे किराना ओली, पोहा ओली, पीतल ओली, रेशम ओली, लोहा ओली,चांदी ओली,सोना ओली इत्यादि  । छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में भी मैंने ऐसी ओली देखीं वहां इन्हें लाइन कहते हैं जैसे गुड़ाखू लाइन ।

पुल के बाद आगे बढ़ने पर शहीद चौक पर अब्बुमियाँ की प्रसिद्ध जड़ी बूटियों की दुकान मिलती है । यह दुकान अब भी है । अब्बुमियाँ के पास हर बीमारी की दवा के अपने फार्मूले थे । वे मरीज़ की नाड़ी देखते और तुरंत दवा की पुड़िया बंधवा देते, साथ ही पथ्य परहेज भी बता देते । उन दिनों सर्दी ज़ुकाम खाँसी के लिए उनकी ‘ज़िन्दा तिलिस्मात’ और दर्द निवारण हेतु  ‘खड़क्या नाग तेल’  नामक दवाएँ  काफी मशहूर थी । अन्य बीमारियों के लिए वे एक ऐसी दवा दिया करते थे जो सूजी के हलवे की तरह दिखाई देती थी । आज तो अब्बुमियाँ की दुकान अब्बुमियाँ एंड कंपनी में बदल चुकी है और नागपुर में उसकी ढेर सारी शाखाएं हैं । 

शहीद चौक में ही एक चांदी ओली है जहाँ चांदी गलाने, व चांदी के आभूषण बनाने का काम होता है इस गली में देवी का एक मंदिर है जिसका नाम विदर्भ चंडिका मंदिर है । आपने ऐसी किसी देवी का नाम पौराणिक किताबों में नहीं पढ़ा होगा ।


ध्यातव्य है नागपुर और आसपास के आठ ज़िलों को मिलकर बने क्षेत्र को विदर्भ यह नाम दिया गया था ।  विदर्भ चंडिका नामक इस देवी की स्थापना विदर्भ को स्वतंत्र राज्य का दर्जा देने के लिए  आन्दोलन करने वाले विदर्भ वीर जाम्बुवंत राव धोटे ने की थी और स्थापना करते समय उन्होंने कहा था कि जब तक विदर्भ स्वतन्त्र राज्य नहीं बन जाता मैं इस देवी का विसर्जन नहीं करूँगा । जाम्बुवंत राव धोटे  के बारे में मैं पिछले पन्नों में विस्तार से लिख चुका हूँ । जाम्बुवंत राव धोटे दो हज़ार सत्रह में गुजर गए और विदर्भ भी स्वतन्त्र राज्य नहीं बन पाया लेकिन उनके द्वारा स्थापित विदर्भ चण्डिका का मंदिर आज भी है और यहाँ स्थापित देवी की पूजा उसी तरह से होती है जैसे कि अन्य देवियों की होती है । भारतमाता को देवी का दर्जा मिला हो या न मिला हो लेकिन विदर्भ चंडिका नामक यह देवी उस स्थान को प्राप्त कर चुकी है । 

इतवारी से लगा हुआ लकड़गंज है जो उन दिनों  लकड़ी के व्यापार के लिए काफी प्रसिद्ध था ।उन दिनों यह भारत में नंबर वन का इमारती लकड़ी का केंद्र माना जाता था । यहाँ बड़े बड़े भूखंडों पर दैत्याकार आरा मशीने थीं जिनके चलने पर भयानक आवाज़ें आती थीं । आरे के नीचे आते ही ज़रा सी देर में बड़े बड़े दरख़्त लम्बे लम्बे पटियों में बदल जाते थे  । मज़दूरों को बहुत ध्यान से काम करना होता था ज़रा नज़र चूकी और पेड़ के साथ हाथ भी गायब । आज यहाँ आरा मशीने नहीं हैं उनका  स्थान ऊँची ऊँची व्यावसायिक इमारतों ने ले लिया है । 


 

कीर्ती होटल के पीछे धारस्कर रोड है और उसके बाद गांधीबाग का एरिया प्रारंभ हो जाता है जिससे लगा हुआ महल एरिया है । यहीं कभी  चित्रा टाकीज थी



और उसके बगल में श्याम टाकीज । शहीद चौक के आगे एक तीन नल चौक था जहाँ वाटर सप्लाई के लिए तीन वाल्व थे जिनके कारण इस चौक का नाम ही तीन नल चौक हो गया था । पुराने नागपुर के इस क्षेत्र की अपनी विशेषताएँ हैं जो आज भी विद्यमान हैं । जाने कितनी विविधताओं से भरी संस्कृति है यहाँ की, हर रंग की अपनी एक अलग छटा है ।



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