मुँह से शहनाई की आवाज़ निकालने वाले पावड़े काका के जाने के बाद छोटे छोटे तीन कमरों वाले हमारे आंगन में बने मकान में सुधाकर कृष्णराव जोशी रहने आ गए थे ৷ जोशी काका शासकीय जिला ग्रंथालय में लायब्रेरियन के पद पर आये थे ৷ वे बैचलर थे और उस साल वे बी ए की तैयारी कर रहे थे और मैं नाइंथ में पहुँच गया था ৷ जोशी काका को उतने बड़े घर की ज़रूरत नहीं थी इसलिए उन्होंने हमारी छपरी से लगा एक हिस्सा मुझे पढ़ने के लिए दे दिया ৷ वैसे पहले भी वह हिस्सा अखंड भारत की तरह हमारे हिस्से में ही था लेकिन बाद में मकान मालकिन नानी ने प्लाय वुड का एक पार्टीशन लगाकर उसे हमसे अलग कर तीन कमरों में रहनेवाले किरायेदार के सुपुर्द कर दिया था ৷
मैं इस बात से खुश था कि नवीं कक्षा में पहुँचने पर मुझे पढ़ने के लिये एक अलग जगह मिल गई थी । यद्यपि उस हिस्से में कोई दरवाज़ा नहीं था सो मैंने वहाँ एक पुरानी चादर का पर्दा लगा दिया था और गत्ते के एक टुकड़े पर एस.जे.कोकास लिखकर उस पर अपनी नेमप्लेट भी लगा दी । वहीं एक अलमारी भी रख ली जो टेबल का काम भी देती थी । उस वक़्त एक टेबल लैम्प भी मेरे पास था जिसमें लैम्प बेस पर धातु का एक खरगोश बना हुआ था । छोटी छोटी चीज़ें भी कितनी खुशियाँ देती थीं उस वक्त ৷
उस समय हमारे घर में शीशम का एक टेबल लैम्प भी था ৷ उसका लैम्प शेड टूट चुका था लेकिन आँखों पर रौशनी न पड़े इसलिए मैंने एक जुगाड़ किया और बल्ब के ऊपर खाली बल्ब का कागज़ का एक खोका लगा दिया ৷ लेकिन कुछ देर बाद वह खाली खोका गर्म हो जाता और कागज़ जलने की हल्की हल्की गन्ध उसमे से आने लगती थी ৷ कुछ दिनों में वह गन्ध मुझे इतनी अच्छी लगने लगी कि मैं उसका एडिक्ट हो गया । जब तक यह गंध आती मेरा पढ़ने में मन लगा रहता ৷ ৷
यह टेबल लैम्प कॉलेज के अलावा नौकरी लगने के बाद भी बहुत दिनों तक मैं उपयोग में लाता रहा । स्कूल के समय से टेबल लैम्प की आदत इस तरह पड़ी कि आज भी मैं बिना टेबल लैम्प के पढ़ाई नहीं कर सकता । 75 साल पुराना यह टेबल लैम्प आज भी मेरे पास है ৷ इसके अलावा उस कमरे की मिट्टी की दीवार में भी एक आलमारी भी थी लेकिन उसमें मैं दीमक के डर की वज़ह से किताबें नहीं रखता था ।
स्कूल से लौटकर आने के बाद कुछ देर मैं इस कमरे में पढ़ाई करता फिर कमरे के सामने ही दालान में निवार वाली खटिया डालकर उसपर अपना बिस्तर लगा लेता था । बैतूल से मैं एक स्पीकर बॉक्स लेता आया था जिसका कनेक्शन मैंने रेडियो से कर दिया था । रात में मैं उसे ऑन कर देता था ,रेडियो का स्पीकर बन्द हो जाता था और सिर्फ मेरे सर के ऊपर टंगे स्पीकर से आवाज़ आती थी । मुझे पुराने फ़िल्मी गीत भी अच्छे लगने लगे थे ৷
दोस्तों , सोच क्या रहे हैं कैशोर्य ऐसे ही आता है , छोटी छोटी मूर्खताओं के साथ, हँसी ठिठोली करते हुए ,थोड़ा पागलपन थोड़ा दीवानापन, थोड़ी बुद्धिमानी थोड़ी बेवकूफ़ी ৷ जब अकेला होना अच्छा लगता है, आईने में खुद को देखना अच्छा लगता है देर देर तक नहाना अच्छा लगता है और देर तक जागना अच्छा लगता है ৷
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