10 जून 2026

118 हमारी माँ को मराठी नहीं आती थी उनकी माँ को हिन्दी



पैरों में सादी सी चमड़े की चप्पल, मामूली सी ढीली ढाली पेंट उस पर बिना इन की हुई मामूली सी बिना इस्तरी की हुई, सूती सफेद शर्ट ৷ माथे पर कुंकुम का एक तिलक ৷ साठ के दशक की मराठी फ़िल्मों में आपने इस तरह के टिपिकल महाराष्ट्रियन ब्राह्मण युवाओं की छवि देखी होगी, जोशी काका बस वैसे ही दिखते थे ৷ जोशी काका का पूरा नाम सुधाकर कृष्णराव जोशी था । वे वहाँ के शासकीय जिला ग्रंथालय में श्री केदार के स्थान पर जिला ग्रंथपाल के रूप मे आये थे ।  


जोशी काका अविवाहित थे ৷ रोज सुबह आठ-दस देवी देवताओं की तस्वीरों के सामने बैठकर एक घंटा पूजा- पाठ किया करते और रोज़ ही विवाह के लिए भगवान के पास अर्जी लगा देते  । फिर वे  साइकिल उठाते और लायब्रेरी चले जाते,फिर दोपहर में आकर सिगड़ी पर खाना बनाते और शाम को फिर लायब्रेरी चले जाते लौटकर फिर खाना बनाते, खाते और सो जाते ৷ सपाटबयानी वाली कविता की तरह सीधी सपाट ज़िंदगी, कोई उतार चढ़ाव नहीं ৷ 


जोशी काका जब भंडारा आये मैं नाइंथ में था ৷ वे भी उन दिनों प्राइवेट बी ए की परीक्षा देने की तैयारी कर रहे थे ৷ मुझे पढ़ता हुआ देखकर उनकी भी पढ़ने की इच्छा होने लगती थी ৷ हम दोनों कई बार आंगन में साथ बैठकर पढ़ाई किया करते थे । परीक्षा से एक माह पहले मैं पूरी तरह पढ़ाई में डूब गया था ৷ पढ़ने के अलावा मुझे किसी बात का ख्याल नहीं रहता था । लगभग सोलह सत्रह घंटे मैं पढ़ाई किया करता था । रात में दस बजे के लगभग मैं सो जाता था और सुबह तीन बजे पढ़ने के लिये उठ जाता था । 


बाबूजी मेरी पढ़ाई देखकर हैरान रह गये । एक दिन हमारे स्कूल के प्रधानाध्यापक श्री वर्घणे हमारे घर पधारे, बाबूजी ने जब उन्हें बताया कि मैं सोलह सत्रह घंटे पढ़ता हूँ तो वे भी हैरान रह गये और कहा कि इतना मत पढ़ा करो स्वास्थ्य खराब हो जायेगा ৷ लेकिन मुझ पर उनकी बात का कोई प्रभाव नहीं हुआ और मेरी पढ़ने की गति बदस्तूर जारी रही । मुझे मेरी मेहनत का फल मिला और उस साल भी कक्षा में मैं प्रथम आया । किसी स्कूल का प्रिंसिपल अपने स्कूल के छात्र से कहे कि कम पढ़ा करो, ऐसा तो मैंने आज तक सुना भी नहीं ৷


जोशी काका तीन चार साल हमारे आँगन में बने उन तीन कमरों में रहे ৷ कभी कभी उनके माता पिता भी वहाँ रहने आ जाया करते थे । उनकी माँ की हमारी माँ के साथ बहुत पटती थी । वे मराठी में बातें करती थीं और हमारी माँ हिन्दी में ৷ माँ को मराठी नहीं आती थी और उन्हें हिन्दी, लेकिन किसी को कोई परेशानी नहीं होती थी, वे अपने सारे दुःख-सुख एक दूसरे से कह देतीं ৷ उस समय मैंने पहली बार महसूस किया कि संवेदनाओं के आदान प्रदान में भाषा कहीं आड़े नहीं आती ৷ 


मैट्रिक के बाद फिर मैं पढ़ने के लिए बाहर चला गया, जोशी काका की भी अर्जी कुबूल हो गई और वे कहीं और रहने लगे ৷ बरसों बाद किशोर कुमार का एक गाना आया था जिसमे बोल थे “जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले हम तो कूछ नहीं बोलेगा ..हम बोलेगा तो बोलेगा के बोलता है” .. मजाक नहीं, इस लाइन को सुनते ही मुझे जोशी काका की याद आ जाती थी ..वही जुंग का फ्री असोसिएशन वाला नियम ৷



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