देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों के दृश्य मैं असल ज़िंदगी में ढूँढा करता था ৷ पैसेंजर ट्रेन में अक्सर मैं खिड़की के पास बैठता था और रास्ते में आनेवाले नदी,नालों, तालाबों और जंगलों को देखकर सोचता अगर ट्रेन यहाँ रुक जाए तो कितना मज़ा आए, मैं यहीं उतर जाऊं और जंगल के भीतर निकल जाऊं ৷ कभी कभी जंगल में दिखाई देने वाली कोई सुरंग मुझे किसी गुफा की तरह दिखाई देती जो अपनी ओर मुझे बुलाती ৷
बैतूल में घर के पास ही सोनाघाटी की पहाडी थी ৷ घर के लोग अक्सर वहाँ पिकनिक मनाने जाया करते थे ৷ मेरे मन में यह बात आती थी कि ज़रूर कभी इस घाटी में सोना मिलता होगा इसलिए इसका नाम सोनाघाटी पड़ा ৷ जब सारे लोग हनुमान जी के मंदिर में बैठे आराम कर रहे होते मैं आसपास भटकने निकल जाता और सोना ढूँढने की कोशिश करता ৷
बैतूल के दौरे में अक्सर होशंगाबाद का भी एक दौरा शामिल रहता था ৷ बाबूजी की दो सगी बहनें दयावती और पुष्पावती वहाँ दो सगे भाइयों से ब्याही गई थीं । ‘होशंगाबाद’ यह शब्द मुझे बहुत अच्छा लगता था ৷ इस शब्द में मुझे इलाहाबाद, हैदराबाद, मुरादाबाद,फिरोज़ाबाद जैसे शब्दों की ध्वनि सुनाई देती थी ৷ मैं सोचता था यह सब शहर एक जैसे ही होंगे, वहाँ भी नर्मदा जैसी कोई नदी बहती होगी जिसके किनारे खूबसूरत घाट होंगे जिन पर ढेर सारे मंदिर होंगे ৷
एक दिन मुझे फूफाजी ने बताया कि होशंगाबाद का यह नाम सोलहवीं शताब्दी में मांडू के पठान सूबेदार हुशंगशाह गोरी ने रखा था ৷ मैं मोहम्मद गोरी को जानता था वह हमारे कोर्स में था लेकिन हुशंगशाह गोरी को नहीं ৷ एक जैसा सरनेम होने के कारण मैंने सोच लिया वे एक ही जाति के होंगे ৷ मुझे यह देखकर आश्चर्य होता कि एक मुसलमान ने इतने सारे मंदिर घाट पर बनवाए लेकिन मस्जिद क्यों नहीं बनवाई ৷
भरा पूरा परिवार था दोनों बुआओं का होशंगाबाद में ৷ दया बुआ का विवाह नन्दकिशोर शर्मा से और पुष्पा बुआ का बृजकिशोर शर्मा हुआ था । होशंगाबाद में उन्हें सब लोग बड़े भाई, छोटे भाई के नाम से ही जानते थे । दया बुआ का निधन काफी पहले हो गया था इसलिए बड़े फूफाजी अपने इकलौते बेटे ललित के साथ वहाँ रहा करते थे ৷ छोटे फूफाजी का उड़ावनी मशीन बनाने का कारखाना था । ‘उड़ावनी मशीन’ से मुझे लगता था यह कोई उड़ने वाली मशीन होगी लेकिन बाद में पता चला यह गेहूँ से भूसा अलग कर उसे उड़ा देने वाले मशीन थी ৷
पुष्पा बुआ की बड़ी बेटी हैं नीलम यानि नीलू दीदी,फिर संतोष भैया, उनसे छोटी पूनम थी जिनका बाद में कैंसर से निधन हो गया था । उसके बाद शबनम, रेशम और बज्जो थीं जो बाद में बृह्मकुमारियाँ बन गई । सबसे छोटी लवली है । इसके अलावा आशुतोष, इन्दर और मुन्ना तीन बेटे और हैं । आशुतोष होशंगाबाद में एक शिक्षण संस्थान का संचालन करते हैं ৷
अक्सर सारे बच्चे गर्मी की छुट्टियों में बैतूल आ जाया करते थे फिर हम लोग उनके साथ होशंगाबाद चले जाया करते थे । एक बार बाबूजी के अभिन्न मित्र, गोंडवाना फोटो स्टूडियो वाले कमल जायसवाल चाचा के साथ भी हम लोग कार से होशंगाबाद गये थे । वह मेरा कार में बैठने का पहला अवसर था ।
होशंगाबाद में रोज़ सुबह हम बच्चे नर्मदा में नहाने जाते । मुझे तैरना नहीं आता था , मेरे भाइयों बहनों ने मुझे तैरना सिखाने की बहुत कोशिश की । वे डालडे का एक सील किया हुआ डिब्बा मेरे पेट पर बान्ध देते और मुझे पानी में छोड़ देते लेकिन मैं घबराकर तुरंत पानी से बाहर आ जाता था । इसके बाद मैं हमेशा किनारे पर बैठकर या उथले पानी में ही नहाता रहा गहरे पाने में उतरकर कभी तैरना नहीं सीख पाया । हालाँकि हर बरस होशंगाबाद जाने का यह सिलसिला बरसों जारी रहा ৷
होशंगाबाद से ही एक बार हम लोग संतोष भैया के चाचा नवल किशोर शर्मा की बारात में जबलपुर गये थे । वह मेरा बारात में जाने का पहला अवसर था । शायद उस वक़्त मैं चौथी कक्षा में पढ़ता था । बारात बस द्वारा जबलपुर गई थी । वहाँ हम लोगों को एक स्कूल की बिल्डिंग में ठहराया गया था । उस विवाह की मुझे ज़्यादा याद नहीं है लेकिन वहाँ हमें दुर्गा चाची के भाई यानि सुरेश मामा मिले थे जो मुझे जबलपुर घुमाने ले गये थे ।
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