“चुनार से दो कोस पश्चिम, गंगा के किनारे घने जंगल में पहाड़ी पर एक पुराना किला था..” यह पंक्तियाँ पढ़ते ही आपको देवकीनंदन खत्री के उपन्यास ‘चंद्रकांता’ और ‘चन्द्रकान्ता संतति’ की याद आ जायेगी ৷ सिनेमा जैसे मनोरंजन के सीमित साधनों वाले उन दिनों में अधिकांश लोगों के घर धर्मयुग, सारिका,साप्ताहिक हिंदुस्तान,मनोहर कहानियाँ, सत्यकथा, दीवाना तेज, पराग,नंदन चंदामामा जैसी पत्रिकाएँ आया करती थीं ৷ किताबें और पत्रिकाएँ पढ़ने का शौक अमूमन सभी को था ৷ जिनकी किताबें ख़रीदने की हैसियत नहीं थी उन्हें नुक्कड़ की पुस्तकों की दुकान से दस- बीस पैसे प्रतिदिन के किराए में सब तरह की किताबें व पत्रिकाएँ आसानी से मिल जाया करती थीं ৷
इसके अलावा हर मोहल्ले में कुछ ऐसे साधन संपन्न लोग भी होते थे जिन्हें लायब्रेरी से किताबें लाने के अलावा बाकायदा किताबें खरीदकर पढ़ने का शौक भी होता था ৷ ऐसे ही एक बुज़ुर्ग थे मोहल्ले में जिनके घर में ढेर सारी किताबें थीं ৷ वे अकेले रहते थे और दिनभर किताबों में डूबे रहते थे ৷ मुझे उनका घर बहुत अच्छा लगता था इसलिए कि वहाँ चोवीसों घंटे किताबों की गंध आया करती थी ৷
किताबें पढने का चस्का तो मुझे भंडारा में ठाकरे किराना दुकान में रद्दी में आनेवाली बच्चों की पत्रिका ‘चंदामामा’ पढ़ते हुए ही लग चुका था ৷ छुट्टियाँ थीं इसलिए थोड़ा बहुत पढ़ने से मन नहीं भरता था, अतः पढ़ने की अपनी भूख मिटाने के लिए मैं अक्सर उन बुज़ुर्गवार के यहाँ चला जाता और उनसे पढ़ने के लिए कोई किताब माँग लाता ৷
आश्चर्य यह कि इन दादाजी के पास देवकीनंदन खत्री,प्रेमचंद आदि के उपन्यासों के अलावा कई टाइप के जासूसी और सामाजिक उपन्यास भी थे ৷ मेरे लिए वे बच्चों की पत्रिकाएँ लाया करते ৷ मैं उनकी कांच वाली आलमारी में अक्सर झांकने की कोशिश करता जिसमे मुझे इन सामाजिक पारिवारिक टाइप की किताबों से अलग किस्सा हातिमताई, किस्सा अलिफ़ लैला,तोता मैना की कहानियाँ जैसी कई किताबें भी दिखाई देतीं ৷
मैं उनसे इन किताबों के बारे में बातें करना चाहता लेकिन वे मुझे गोल मोल जवाब देकर टरका देते ৷ वे पूरे टाइम किताबें पढ़ते रहते थे, यहाँ तक कि खाना पकाते हुए भी उनके हाथ में किताब होती ৷ एक दिन जब मैं उनके घर पहुँचा वे कोई किताब पढ़ रहे थे ৷ अचानक मुझे आया देख वे चौंक गए ৷ उन्होंने झट वह किताब तकिये के नीचे छुपा दी और ‘आओ आओ बैठो ’ कहते हुए आंगन में स्थित बाथरूम की ओर निकल गए ৷
मैंने उन्हें किताब छुपाते हुए देख लिया था ৷ सामान्यतः वे ऐसा करते नहीं थे इसलिए मेरे मन में इस बाल सुलभ जिज्ञासा ने जन्म लिया कि आखिर वे ऐसी कौनसी किताब पढ़ रहे थे जो उन्होंने तकिये के नीचे छुपा दी ? अब यह तो सहज मानव स्वभाव है कि जो बात जितनी अधिक छुपाई जाती है उसके बारे में जानने की उत्कंठा उतनी ही ज़्यादा होती है ৷ भले ही मैं बच्चा था लेकिन मानव स्वभाव के इस स्वाभाविक गुण से अछूता तो नहीं था ৷
जैसे ही बाथरूम का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ मेरे कानों तक आई, मैंने तकिया उठाकर धीरे से उसके नीचे से वह किताब निकाली ৷ वह एक पतली सी किताब थी ৷ किताब के मुखपृष्ठ पर एक नग्न स्त्री और नग्न पुरुष का रेखाचित्र बना था और नीचे लिखा था ‘सम्पूर्ण कोकशास्त्र सचित्र ৷’ मैंने बस अभी पन्ने पलटे ही थे कि दादाजी को सामने खड़े पाया ৷ वे अजीब सी मुस्कान में मुस्कुरा रहे थे ৷ उन्होंने धीरे से मेरे हाथ से वह किताब छीन ली और कहा “बेटा ..यह बच्चों के पढ़ने लायक किताब नहीं है ৷ तुम्हे मैं.. दूसरी किताब देता हूँ ৷ “
जितने भी पल वह किताब मेरे हाथों में थी और जितने भी शुरुआती अंश मैंने उसके देखे थे उससे यह तो समझ में आ गया था कि वह कोई कहानी की किताब थी, लेकिन फिर भी यह बात मेरी समझ में नहीं आई कि उसमे आखिर ऐसा क्या था जो बच्चों के पढ़ने लायक नहीं था ৷ यह तो मुझे पता था कि स्कूल में बच्चों की और कॉलेज के बड़े भैया लोगों की कोर्स की किताबें अलग अलग होती हैं लेकिन यह बात मेरी समझ से परे थी कि कहानी की कोई किताब बच्चों और बड़ों के लिए अलग अलग कैसे हो सकती है ৷
यह प्रश्न मुझे काफी दिनों तक परेशान करता रहा ৷ यह तो पता था कि उसमे ऐसा कुछ है जो रहस्यमय है, इसलिए बड़ों से पूछने की हिम्मत नहीं हुई ৷ चित्र देखकर कुछ लगा था लेकिन वह भी बहुत अस्पष्ट सा था ৷ जाने कितने दिनों तक मैं अपने दोस्तों से पूछता रहा “कोकशास्त्र की कहानी की किताब तुमने पढ़ी है ?“ जो भी सुनता वह अनभिज्ञता से सर हिला देता ৷
एक दिन मिडिल स्कूल के हमारे एक सीनियर ने मुझे अपने पास बुलाया और कहा “तुम्हे कोकशास्त्र के बारे में जानना है ना ? मुझे मालूम है, वो गंदी किताब है ৷ उसमे सब xxx की बातें हैं ৷” ‘गंदा’ शब्द से मेरा परिचय शैशवावस्था से था ৷ यह मैला,कुचैला, काला कलूटा,वर्ग का ही एक शब्द था लेकिन दूसरा शब्द ?
मैं बड़ा हो रहा था, नए नए शब्दों से मेरा परिचय हो रहा था ৷ मेरे अवचेतन के शब्दकोश में जाने कितने शब्द गड्ड मड्ड हो रहे थे ৷ कुछ शब्द जिनके अर्थों की इमारत मैं बुलंद समझता था अचानक भरभराकर ढहने लगी थी ৷ इन्ही में यह शब्द था ‘गंदा’ ৷ मेरे दिमाग़ में मानो मथानी चलती रहती थी ..गंदा क्या है ? अच्छा क्या है ? अगर अच्छे का विलोम बुरा है तो गंदे का विलोम साफ़ क्यों नहीं है ? जो काम अच्छे हैं वे गंदे कैसे हो गए ? अगर गंदे कपड़े साबुन से साफ़ हो सकते हैं तो गंदे काम कैसे साफ हो सकते हैं?
अच्छे, गंदे,साफ सुथरे जैसे शब्द, उनके अर्थ और उनके प्रयोग को लेकर आज भी हमारी धारणाएँ कहाँ बदली हैं ? कान, नाक, मुँह को हम अच्छी जगह कहते हैं लेकिन अपने ही शरीर के जननांगों को ‘गंदी जगह’ कहते हैं ৷ यहाँ तक कि बच्चों तक को उन्हें छूने से मना करते हैं, स्वाभाविक प्रेम की बात को ‘गन्दी बात’ कहते हैं और न केवल मूत्र विसर्जन व शौच को बल्कि मनुष्य की जैविक इच्छाओं में शामिल शारीरिक प्रणय को भी ‘गन्दा काम’ कह देते हैं ৷ अन्य धर्म के लोगों को हम ‘गंदे लोग’ कहते हैं ৷ विवशता में अपनी देह को अपने पेट भरने का साधन बनाने वाली स्त्री को ‘गंदी औरत’ कहते हैं ৷
हम अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं अपने भाषाई ज्ञान और शब्द सामर्थ्य पर अभिमान करते हैं,अपने आप को विश्व गुरु कहते हैं फिर भी ऐसे लोग हैं इस दुनिया में जो हत्या जैसे बुरे काम को ‘वध’ कहकर उसका महिमामंडन कहते हैं लेकिन सहज स्वाभाविक हस्तमैथुन को ‘गन्दा काम’ कह कर उसका विरोध करते हैं ৷
मेरा बचपन इसी तरह अनेक शब्द और उनके अर्थों के लिए मुक़दमा लड़ते हुए बीता ৷ बचपन के अनेक प्रश्नों के उत्तर मुझे बड़े होने के बाद मिले ৷ कुछ किताबों में मिले, कुछ मैंने खुद खोजे ৷ बड़े और छोटों के लिए अलग अलग साहित्य क्यों होता है विस्तार से इस प्रश्न का उत्तर भी मुझे साहित्य की दुनिया में प्रवेश करने के बाद ही ज्ञात हुआ ৷ मुझे यह भी पता चला कि हम पढ़े लिखे लोगों ने साहित्य को छोटे बड़ों का साहित्य ही नहीं बल्कि बाल साहित्य, स्त्री साहित्य, जासूसी साहित्य, वयस्क साहित्य, लुगदी साहित्य, गंभीर साहित्य, मनोरंजक साहित्य, प्राचीन साहित्य,समकालीन साहित्य ,डिजिटल साहित्य, व्हट्सएप साहित्य, फेस्बुकिया साहित्य,पोर्न साहित्य ऐसे अनेक खानों में बाँट रखा है ৷
गनीमत यह कि इन विशेषणों का प्रयोग लोग साहित्यकार के साथ जोड़कर नहीं करते वर्ना आप सोचकर देखिये कैसा लगता जब किसी के परिचय में कहा जाता “पहले आप वयस्क साहित्यकार थे, आजकल बाल साहित्यकार हो गए हैं, कभी कभी आप मनोरंजक और कभी स्त्री सहित्यकार भी हो जाते हैं ৷” हालाँकि साहित्यकार के साथ कनिष्ठ, वरिष्ठ, युवा, प्रबुद्ध,महत्वपूर्ण,राष्ट्रीय,अंतर्राष्ट्रीय, नारीवादी,प्रगतिवादी,जनवादी, जैसे शब्दों का प्रयोग तो लोग करते ही हैं ৷ ज़रा सोचकर देखिये आखिर इनका क्या औचित्य है ?
इतना सब आख्यान पढ़ लेने के बाद भी आप में से कई लोगों के मन में “कोकशास्त्र क्या होता है ?” यह प्रश्न अभी भी उमड़ घुमड़ रहा होगा ना ? यह सहज बात है ৷ संभव है इससे मिलते जुलते शब्द ‘कामशास्त्र’ के बारे में तो आपने सुना ही होगा , संभव है अनेकों ने देखा हो या पढ़ा भी हो ৷ महर्षि वात्सायन द्वारा रचित यौन शिक्षा प्रदान करने वाला हमारी संस्कृति का यह एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है ৷
लेकिन कोकशास्त्र क्या बला है ? यह बहुतों को पता नहीं होगा ৷ मुझे भी इस प्रश्न का उत्तर बरसों बाद मिला जब मैंने अज्ञेय का उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ पढ़ा ৷ आप भी सोच रहे होंगे यह कहाँ से कहाँ छलांग लगाता है ৷ आप ढूंढिए आपको भी मिल जाएगा ৷ सरस्वती प्रेस इलाहाबाद वाले एडिशन में पृष्ठ एक सौ पचपन पर यह किस्सा दिया हुआ है ৷
वह साठ के दशक का बचपन था जब “ दादाजी ने आखिर कौनसी किताब तकिये के नीचे छुपाई थी ?” जैसे प्रश्नों का उत्तर ढूँढने के लिए बरसों प्रतीक्षा करनी पड़ती थी ৷ आज के बच्चों को इतनी मेहनत और प्रतीक्षा करने की ज़रूरत नहीं है और न ही अब दादाजी को किताब छुपाने की ज़रूरत है, अब तो स्मार्ट फोन की शक्ल में वह किताब हर बच्चे के हाथ में है ৷ आप भले ही कुछ न जानें आपके बच्चे ‘सब कुछ’ जानते हैं ৷

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