5 जून 2026

45.बैतूल के हमारे घर में पिछवाड़े सुनाई आते थे सिनेमा के डायलाग

बैतूल का मेरा जन्मगृह 

छत्तीसगढ़ के एक छोटे से जनपद बागबाहरा में रहने वाले युवा कवि रजत कृष्ण की एक कविता है 

छतीस जनों वाला /

हमारा घर/ 

नब्बे वर्षीय दादी की / 

साँसों से लेकर / 

डेढ़ वर्षीय बिटिया / ‘

ख़ुशी’ की आँखों में बसता / 

और खुश होता है / 

कि यहाँ आने जाने को / 

एक नहीं, दो नहीं /  

तीन नहीं / 

चार दरवाज़े हैं.. / 

और एक घर का एक छोर / 

एक रास्ते पर / 

तो दूसरा / 

दूसरे रास्ते पर खुलता है 

  बैतूल का हमारा घर भी कुछ ऐसा ही था । सामने का मुख्य दरवाज़ा इतवारी बाज़ार वाली सड़क पर खुलता था । एक दरवाज़ा बीच के आंगन से निकलने वाली गली से होता हुआ सामने वाली उसी सड़क पर निकलता था। वह गाय और बकरियों के आने जाने का रास्ता था हालाँकि मनुष्य भी उससे आना जाना कर सकते थे । 

एक दरवाज़ा  कुंदनलाल दादाजी की कोठरी से बाहर की ओर इसी सड़क पर निकलता था । इसी सड़क पर एक दरवाज़ा और था जो गाय के गोठे से आगे सुन्दरलाल दादा वाले हिस्से से बाहर की ओर फर्नीचर की दुकान में निकलता था और फिर वहाँ से बाहर उसी सड़क पर । इस तरह हमारे घर में सामने की ओर से इन चार दरवाज़ों से आया जाया सकता था । 


मकान के पीछे की ओर सिर्फ एक बड़ा दरवाज़ा था जो एक बड़े से आंगन में खुलता था । उसके बाद एक छोटी सी बाड़ी थी जिसमे मक्के या गन्ने की खेती होती थी । आंगन के एक सिरे पर चार शौचालय थे और उसके बाद था रघुबीर टाकीज़ का परिसर । सुरेश काका शौचालय को सुविधा कक्ष कहा करते थे । 

शौचालय वाला हिस्सा सिनेमा के परदे के पीछे वाले हिस्से से लगभग सटा हुआ ही था इसलिए वहाँ सिनेमा के संवाद साफ़ साफ़ सुनाई देते थे । शाम के समय इस सुविधा का लाभ लेने वाले भीतर जाने के बाद अक्सर भूल जाते थे कि वे किस काम से आये हैं । वह तो अच्छा था कि उन दिनों सुबह का शो नहीं हुआ करता था वर्ना दरवाज़ा पीट पीट कर लोगों को बाहर निकालना पड़ता । 

एक शौचालय में भीतर से साँकल नहीं थी, वह सुन्दरलाल दादाजी के लिए आरक्षित था । वे जितनी देर भीतर रहते थे, वहाँ से पहले जोर लगाने की ऊं..ऊं... की आवाज़ आती फिर फारिग होते ही राम राम राम राम ... की आवाज़ सुनाई देती । हम लोग जान जाते थे कि दादाजी का त्याग कार्यक्रम संपन्न हो चुका है  ।

हमारा परदादा विश्वेश्वर प्रसाद जी का यह परिवार अपने आप में एक बहुत बड़ा कुनबा था जिसमें  हर उम्र के सदस्य हुआ करते थे । गाय बांधने के दो गोठों, दो रसोईघर, चार चूल्हों, दो स्नानगृह और चार शौचालयों वाले इस मकान में मेरे दादा  बाबूलाल तथा दादी राजरानी उर्फ़ सुन्दरबाई के परिवार के अलावा दादाजी के चार छोटे भाइयों ब्रजलाल, कुंदनलाल, सुन्दरलाल और चंदनलाल का परिवार भी रहा करता था । 

बाबूलाल जी को चार पुत्र और चार पुत्रियों का आशीर्वाद मिला था । बेटों में सबसे बड़े मनमोहन उनसे छोटे मदनमोहन फिर मेरे पिता जगमोहन और सबसे छोटे श्याममोहन । फिर चार बेटियाँ विद्या,दया,पुष्पा और प्रकाश । बेटियों की शादी हो चुकी थी जो सपरिवार छुट्टियों में आया करती थीं । उनकी तरह बाबूजी की उपस्थिति भी बस छुट्टियों में ही दर्ज होती थी । 

बाबूलाल जी की सबसे बड़ी बेटी विद्यावती का विवाह नागपुर में शिवनाथ जी कोकास के साथ हुआ था । वे नागपुर के सुप्रसिद्ध अखबार ‘हितवाद’ में कार्यरत थे और धंतोली में अपने अन्य तीन भाइयों के साथ रहा करते थे।


उनकी वह स्ट्रीट ही ‘कोकास स्ट्रीट’ कहलाती थी । उन्ही के सरनेम से यह सरनेम हमारे परिवार में आया था । बाबूलाल जी और उनके भाइयों का कोई सरनेम नहीं था । बाबूलाल जी मुनि समाज के अध्यक्ष थे और पेशे से वैद्य थे इसलिए उनका नाम लिखा जाता था मुनि बाबूलाल जी वैद्य । वैसे भी उन दिनों नाम के साथ पिता का नाम और पेशा लगाना काफी होता था ।

 शिवनाथ फूफाजी और विद्या बुआ के बच्चों के नाम हैं जगदीश, श्यामा, रमा, सतीश यानि बच्चन भैया, निर्मल, प्रमिला, प्रदीप यानि कंचन भैया  और सबसे छोटे दीपक जो मुझसे भी छोटे हैं रमा जीजी का विवाह बरेली में भगवान दास जी से ,निर्मल जीजी का दिल्ली में त्रिभुवन जी से और प्रमिला जीजी का सागर में प्रहलाद जी शर्मा के साथ हुआ था । श्यामा जीजी का विवाह नागपुर में ही हीरालाल जी के साथ हुआ था । । जगदीश भैया श्यामा व रमा जीजी तो अब नहीं रहे ।

बाबूलाल जी की दूसरी और तीसरी बेटी दयावती और पुष्पावती का विवाह होशंगाबाद में बड़े भाई और छोटे भाई के नाम से प्रसिद्ध दो सगे भाइयों नन्द किशोर शर्मा और ब्रजकिशोर शर्मा से हुआ था । बड़े भाई पत्रकार थे और छोटे भाई का गेहूँ से भूसा अलग करने वाली मशीन अर्थात ‘उड़ावनी मशीन’ बनाने का कारखाना था । उनके बच्चोंके नाम हैं  संतोष, नीलम, पूनम, शबनम, रेशम । फिर आशुतोष, इन्दर,विकी, शैल और लवी भी हुए । बड़े फूफाजी के एक ही पुत्र है ललित । 

दया बुआ का निधन बेटे को जन्म देने के कुछ समय पश्चात ही हो गया था । बाबूलाल दादा जी की सबसे छोटी बेटी प्रकाशवती का विवाह नागपुर में रामदास जी शर्मा के साथ हुआ था जो इनकम टैक्स विभाग में कार्यरत थे और बाद में आगे चलकर इनकम टैक्स कमिश्नर बने । उनके बच्चों के नाम हैं राजेंद्र, रजनी और राकेश ।

बैतूल में उन दिनों मुझसे उम्र में बड़े मेरे दो भाई थे, मदन मोहन ताउजी के बेटे विजय उर्फ़ मुल्लू भैया और विनय यानि बिन्नू भैया । मधु जीजी भी मुझसे उम्र में बड़ी हैं । मनमोहन ताउजी के दो विवाह पूर्व में हो चुके थे लेकिन उन्हें भार्या सुख प्राप्त नहीं हुआ था अतः उनका तीसरा विवाह कामठी की हेमलता देवी से सन सत्तावन में हुआ । फिर उनकी संतानें हुईं भारती,मनोज, सुधीर,पवन और भावना । 

मदनमोहन ताउजी और बड़ी माँ यानि कमला देवी की अन्य संतानों के नाम थे संजय, संदीप और सूरज । श्याममोहन चाचा जी का विवाह जबलपुर में दुर्गा देवी से हुआ था और उनकी संतानों के नाम थे राकेश , अलका, अनीता और सन्देश । 

यह वह दौर था जब लोगों के सामाजिक जीवन में परिवार शब्द अपनी परिभाषा के बाहर भी उपस्थित था । परिवार नियोजन जैसा शब्द बमुश्किल उनके शब्दकोश में शामिल किया जा रहा था । आपसी प्रेम,भाईचारा, सौहार्द्र जैसे बहुत से अलिखित शब्द अपने आप घटित होते थे ।  बाबुलालजी अपने भाइयों में सबसे बड़े थे इसलिए उनकी संताने भी अपने चचेरे भाई बहनों में बड़ी थीं लेकिन अब उनकी पीढी में मौसम बदल रहा था और बसंत अपनी नई पीढ़ी में मेरे पिता की पीढ़ी में आ गया था ।  

शरद कोकास 

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