की यात्रा करते हुए चलते हैं आपने बचपन के दिनों की ओर लेकिन उससे पहले बात करते हैं शरद बिल्लौरे की
उन दिनों कवि,लेखकों,बुद्धिजीवियों की ख़ास पहचान हुआ करती थी खादी का कुरता, कन्धे पर झोला ,बढ़ी हुई दाढ़ी,बेतरतीब बाल और मुँह में सुलगती बीड़ी ।
हिन्दी के भूले बिसरे कवि शरद बिल्लौरे की पसंद थी तीस छाप बीड़ी जिसे वे कभी कभी विल्स थर्टी कहा करते थे । स्टूडेंट लाइफ में वैसे भी जेब में पैसे कहाँ होते थे लेकिन जब भी कुछ पैसे होते तो वे सिगरेट ख़रीद लेते । जाने कितनी कविताएँ उन्होंने सिगरेट पर लिखीं, कुछ गंभीर, कुछ व्यंग्य । दुबले पतले तो थे ही उस पर से बीड़ी सिगरेट । टी बी हुई और उससे लड़कर वे ठीक भी हो गये और सिगरेट छूट गई । टी बी की बीमारी के दिनों में उन्होंने एक कविता लिखी थी ।
वह टी.बी.का मरीज़ /
रात साढ़े ग्यारह बजे/
टी.बी. हॉस्पिटल के सामने से /
सिगरेट पीता गुजरता है /
सिगरेट रात भर उसके खोखले सीने में लगातार जलती है /
सुबह/
वह फिर सिगरेट पीता है/
खाँसता है/
गोली खाता है/
उसे यह सब /
प्यार करने जैसा लगता है ।
शरद बिल्लौरे का गाँव रहटगांव मध्यप्रदेश के इटारसी शहर के निकट था । वे चाहते थे घर के आसपास रहना लेकिन उन्हें नौकरी मिली घर से बहुत दूर अरुणाचल प्रदेश में । घर की याद वे अक्सर किया करते जो शब्द बनकर उनकी कविताओं में उतर आती ।
हम दूर देश की यात्रा पर निकलते हैं/
घूमने नहीं/
नौकरी करने/
हम निकलते हैं /
पने शहर से बाहर /
और/
किसी की पूरी ज़िंदगी से बाहर निकल जाते हैं/
एकदम जीवित/
कल/
जब हमें अपने शहर में नौकरी मिल जायेगी/
हम लौटेंगे/
छुट्टियाँ बिताने नहीं/
शहर में हमेशा हमेशा को बस जाने के लिए/
तब/ क्या हम उस संसार में/
उतने ही जीवित लौट पाएंगे/
जहाँ से एक दिन हम/
दूर देश की यात्रा पर निकले थे/
नौकरी करने के लिए भी/
और अपने शहर/
हमेशा हमेशा को लौटने के लिए भी
शरद बिल्लौरे लेकिन कभी अपने शहर नहीं लौट पाए । उनका घर इतनी दूर था कि गर्मी की छुट्टियों से पहले वे आ नहीं सकते थे । उस साल गर्मी की छुट्टियों में जब वे अरुणाचल प्रदेश से अपने शहर लौट रहे थे रास्ते में उन्हें लू लग गई और उनके निधन हो गया ।
घर से दूर रहकर नौकरी करने वाले लोगों की यही त्रासदी है । बाबूजी भी घर से दूर नहीं जाना चाहते थे लेकिन रोजी रोटी की मज़बूरी उन्हें घर से दूर ले गई । वे बेसब्री से गर्मी की दो माह की छुट्टियों की राह देखा करते थे । उनका जन्मस्थल बैतूल उन्हें आवाज़ देता था ।
छुट्टियाँ प्रारंभ होने से पूर्व ही हमारे यहाँ ‘घर की ओर प्रयाण’ नामक उत्सव प्रारंभ हो जाता था । बाहर बिखरा सब सामान भीतर रखना होता था । आँगन से जुड़ी हुई छपरी थी जिसमे कोई दरवाज़ा नहीं था इसलिए वहाँ रखा हुआ सारा सामान भीतर के कमरे में रखने की मज़बूरी थी । सागौन की दोनों कुर्सियां, टेबल, स्टूल और दीवार पर लगी फ्रेम की हुई तस्वीरें सभी भीतर के कमरे में रखना होता था । बाबूजी यह काम बहुत धैर्य पूर्वक दो तीन दिनों में पूरा कर लेते ।
यात्रा के दिन घर जाने का उत्साह सुबह से ही हम लोगों की सेवा में उपस्थित हो जाता ,सामान पैक करवाता, ताले लगवाता । भंडारा से बैतूल के लिए कोई सीधी रेल नहीं थी ।
नागपुर से शाम छह बजे करीब नागपुर झाँसी पैसेंजर निकलती थी जो रात एक बजे करीब बैतूल पहुँचती थी । उसीसे हम लोग यात्रा करते थे । उसके लिए हम लोग दोपहर में बस से भंडारा से निकलते दो घंटे में नागपुर पहुँच जाते । स्टेशन के सामने ही बस रुकती थी । हम लोग ट्रेन की राह देखते हुए दरी बिछाकर प्लेटफ़ॉर्म पर बैठ जाते । मुझे टीन की पेटी पर बैठना अच्छा लगता था । इतने देर में बाबूजी टिकट खरीद लाते, वाटर बैग में पानी भर लाते । ट्रेन आने से पहले स्टेशन की चाय के आनंद से भी हम लोग सराबोर हो जाते ।
ट्रेन में उन दिनों थर्ड क्लास का डिब्बा हुआ करता था जिसे हम लोग गाँधी क्लास कहते थे । जैसे ही ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर लगती, बाबूजी दौड़कर भीतर जाते और गमछा बिछाकर जगह पर कब्ज़ा कर लेते । उन दिनों पैसेंजर ट्रेन में आरक्षण करने का यही तरीका था । उसके बाद हम लोग शान से भीतर प्रवेश करते । भक भक करते हुए कोयले के इंजन वाली ट्रेन धीरे धीरे रेंगते हुए नागपुर के प्लेटफ़ॉर्म से रवाना होती । आज हम लोग एक्सप्रेस ट्रेनों से यात्राये करते हैं इसलिए राह में आनेवाले पैसेंजर ट्रेनों के स्टेशन और उनके नाम हमें पता नहीं होते हैं, एक्सप्रेस गाड़ियाँ वहाँ ठहरती भी नहीं, लेकिन उन दिनों हमारी छुक छुक गाडी हर स्टेशन पर रुकती थी और हम उसका मज़ा लेते थे ।
सबस पहले आता था गोधनी, फिर कलमेश्वर,
जिसके बारे में मैं बहुत दिनों तक यह सोचता रहा कि यह हिन्दी के कथाकार कमलेश्वर के नाम पर रहा होगा जो किसी की गलती से उल्टा लिखा गया होगा ।
उसके बाद आता था मेटपांजरा और काटोल, फिर कलम्भा, तिनखेड़ा और नरखेड, फिर दरीमेटा, पांढुरना और तीगांव ।
तीगांव के बाद चढ़ाई प्रारंभ होती थी सो धक्का देने के लिए एक अतिरिक्त स्टीम इंजन रेल के पीछे भी लगता था । फिर चिचोंडा और मुलताई के बाद जौलखेड़ा आता था ।
जौलखेड़ा हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि चंद्रकांत देवताले का गाँव है यहीं उनका जन्म हुआ था ।
उसके बाद आता आमला स्टेशन जो एयर फ़ोर्स के कारण प्रसिद्ध था, फिर एक छोटा सा स्टेशन बरसाली और फिर बैतूल ।
रात के लगभग एक बजे यह ट्रेन बैतूल पहुँचती ।
बाहर तांगेवाले खड़े इंतजार करते हुए मिलते । बाबूजी हम लोगों को लेकर बाहर निकलते और तांगा करते । गर्मी के दिनों में भी बैतूल में रात में ठंडी हवाएं बहती थीं। “कहाँ जाओगे बाबूजी ?’ तांगेवाला पूछता ।
बाबूजी जवाब देते “इतवारी बाज़ार, बाबूलालजी वैद्य के यहाँ ।“ उसके बैठिये कहते ही हम लोग तांगे में बैठ जाते । उन दिनों सवारी द्वारा गंतव्य तक का किराया पूछने का चलन नहीं था न ही कोई तांगेवाला ‘बेलापुर का दो रुपया और रामगढ़ का डेढ़ रुपया’ की शैली में किराया बताता था । अगर कोई पूछता तो कहा जाता “जो देना हो दे देना बाबूजी।”
ठीक से बैठ जाने के बाद घोड़ा हम लोगों के और सामान के वज़न के साथ एडजस्ट करता हुआ दौड़ लगा देता । गंज से होकर कालापाठा के घने पेड़ों के बीच की कोलतार की निर्जन सड़क से गुजरते हुए रात के सुनसान में केवल घोड़े की टापों की टप टप की आवाज़ आती थी ।
बाबूजी का सम्वाद तांगे वाले से मौसम के हाल पूछने के साथ शुरू होता “ दिन में तो गर्मी होती होगी यहाँ ? “ तांगेवाला जवाब देता “ हाँ बाबूजी, अभी तक तो उतनी नहीं होती, लेकिन ऐसे ही अगर जंगल कटते रहे तो पता नहीं आगे क्या होगा । “
उसके बाद दीपचंद गोठी, गोवेर्धन खंडेलवाल,डागा जी आदि नेताओं के बारे में बात होती । कांग्रेस के गोठी जी ने बासठ में और जनसंघ के खंडेलवाल जी ने सडसठ में बैतूल से विधायक का चुनाव जीता था । हर साल बाबूजी नेताओं को लेकर बात जरुर करते थे नेताओं के नाम ज़रूर बदल जाते थे । घर पहुँचने तक खेतीबाड़ी से लेकर रघुवीर टाकीज और ज्योति टाकीज में कौन कौन सी फिल्म लगी है यहाँ तक सारे समाचार जान लिए जाते ।
रात की उस नीरवता में तांगा जैसे ही घर के सामने नीम के पेड़ के नीचे तक पहुँचता घोड़े के पाँव थम जाते मानो उसे पता हो कि उसे यहीं रुकना है ।
दादी माँ तो जैसे बाट ही जोह रही होती थी कि उनका पोता आएगा बस तांगे की आहट सुनकर वे जाग जाती । बाहर खटिया पर सो रहे ताऊजी और ब्रजलाल दादा की भी आंख खुल जाती, बाबूजी माँ उनके पाँव छूते । रात दो बजे इससे आगे का दृश्य देखने लायक उर्जा मुझमे शेष नहीं होती थी सो मैं झट दादी माँ के बिस्तर में घुसता और सो जाता । दादी माँ कुछ देर बाद आती और मुझे अपने अंक में समेट लेती ।
मौसम के अनुसार बदलते हुए दृश्यों के साथ सालों साल यह सिलसिला चलता रहा । गर्मी की और दीवाली की छुट्टियाँ हम बच्चों के लिए वरदान बनकर आती रहीं । सभी चाचाओं और बुआओं के बच्चों के साथ प्रेम बढ़ता रहा । शादियों में अलग से आना होता ही था । बैतूल में बिताई यह छुट्टियाँ हम बच्चों के भीतर साल भर के लिए उर्जा, उत्साह और उमंग भर देती थीं ।
शरद कोकास

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