हमारी पीढी में बचपन से आगे जवानी की देहरी पर कदम रखने का सिलसिला फ़िल्मी गीतों के आलंबन में शुरू होता था ৷ रूमानियत की झील में मजरूह साहब की कलम से तराशी एक लहर झिलमिलाती थी और प्रेमिका की सूरत में ज़िंदगी का फ़लसफ़ा ढूँढते हुए नज़र उसकी आँखों पर ठहर जाती थी ৷ राग झिंझोटी में रफ़ी साहब की आवाज़ मन के आंगन में उतरती और हम किसी काल्पनिक सूरत की ओर देखकर कहते “तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है.. ये उठे सुबह चले.. ये झुकें शाम ढले... मेरा जीना मेरा मरना इन्ही पलकों के तले ৷”
मेरे जीवन में रूमानियत की शुरुआत भी इसी तरह से हुई और मजरूह से होते हुए फैज़ अहमद फैज़ की एंटी मोहब्बत नज़्म तक पहुँची, जहाँ वे कहते हैं “मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग / तेरा ग़म है तो ग़म ए दहर का झगडा क्या है / तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात / तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है ৷” वही शब्द,वही भाव लेकिन जो “और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा” तक पहुँचते पहुँचते एक नए अर्थ में तब्दील हो जाते हैं ৷ इस तरह आँखों से शुरू हुई बचपन की कहानी फिर आँखों तक पहुँच गई ৷ लेकिन यहाँ उसे एक मक़ाम मिल गया और वह औरों के दुख पर आकर रुक गई ৷
बचपन के उन दिनों में मुझे इन सब बातों से कोई सरोकार न था ৷ मेरे लिए यह दुनिया औरों की तरह ही सामान्य थी ৷ मैं सोचता था जैसे मेरे पास आँखें हैं वैसे ही सभी के पास हैं ৷ फिर हर्ज़ क्या है ৷ मुझे पता नहीं था कि ज़िंदगी में आँखे न होने का दुःख क्या होता है , जब तक अशोक पिल्लेवान से मेरी दोस्ती नहीं हो गई ৷
एक दिन लायब्रेरी की ओर कदम बढ़ाते हुए मेरे कदम अंध विद्यालय के प्रांगण में ठहर गए ৷ वहां कुछ दृष्टिबाधित बच्चे कपड़े की एक गेंद से खेल रहे थे ৷ मैंने देखा वह गेंद रबर की एक गेन्द पर कपड़ों की चिन्दियाँ लपेटकर बनाई गई थी और उसमे कुछ पीतल के घुंघरू टांक दिये गये थे । एक बच्चा उस गेंद को ठोकर मारता, जैसे ही वह गेंद लुढ़कते हुए दूर जाने लगती दूसरा बच्चा घुंघरुओं की आवाज़ का पीछा करता हुआ उसके पीछे दौड़ लगा देता और फिर उसे थामकर पैर की ठोकर से फिर पहले बच्चे की ओर उछाल देता ৷
लायब्रेरी जाते हुए अक्सर मैं कुछ देर उनके पास ठहरकर उनका यह रोचक खेल देखता और फिर आगे बढ़ जाता ৷ एक दिन मैंने देखा कि पहले खिलाड़ी की ठोकर से बॉल कुछ दूर तक जाकर एक झाड़ी में चली गई ৷ दूसरा खिलाड़ी असावधानीवश घुंघरुओं की आवाज़ का पीछा नहीं कर पाया और रास्ते में ही ठिठक गया ৷ मैं समझ गया कि अब उसके लिए बॉल ढूँढना मुश्किल होगा ৷
मैं दौड़कर झाड़ी तक गया और बॉल उठाकर उनकी ओर उछाल दी ৷ वे समझ गए कि किसीने उनकी मदद की है .. “कौन है .. कौन है उधर ?” एक बालक ने पूछा .. मैं आगे बढ़ा और मैंने उससे कहा “मैं.. मैं.. शरद ৷ “ उसने अपने हाथ बढाकर मेरे दोनों हाथ पकडे फिर वह मेरी हथेलियों तक आया और उन्हें अच्छी तरह टटोला “अच्छा,शरद .. तू कुठे राहतोस ?” यानि तुम कहाँ रहते हो ..? मैंने उसे अपना पता बताया, फिर क्लास बताई और स्कूल बताया ৷ फिर तो हम दोनों की दोस्ती पक्की हो गई ৷ मेरे इस नए दोस्त का नाम था अशोक पिल्लेवान ৷
अशोक और उसके यह पंद्रह बीस मित्र ब्लाइंड स्कूल के जिस परिसर में रहते थे वहाँ एक ओर कक्षाओं और कार्यालय के लिए कमरे बने थे वहीं दूसरी ओर एक बड़े हाल में बच्चों का हॉस्टल था ৷ उसीसे सटी हुई उनकी मेस थी ৷ शासन द्वारा भंडारा जिले के दूर दराज क्षेत्रों में रहने वाले दृष्टिबाधित बच्चों के लिए मिडिल स्कूल के स्तर तक शिक्षा की व्यवस्था इस शाला में की गई थी ৷
अशोक से मेरी इतनी दोस्ती इतनी प्रगाढ़ हुई कि मैं अक्सर अंध विद्यालय जाने लगा ৷ वह दूर से ही मुझे मेरी गन्ध से पहचान लेता था । जैसे ही मैं दरवाज़े पर पहुँचता वह “ आओ शरद “ कहकर मेरा स्वागत करता । उसके अन्य मित्र भी मेरी आवाज़ से या मेरे हाथों का स्पर्श कर मुझे पहचान लेते थे । यह बात बचपन में ही मुझे ज्ञात हो गई थी कि जिनके पास एक इन्द्रीय की शक्ति नहीं होती या कम होती है उनकी अन्य इन्द्रियों की क्षमता अपेक्षाकृत बढ़ जाती है ৷
अशोक और उसके इन दृष्टिबाधित मित्रों की दुनिया हमारी दुनिया से बिलकुल अलग थी ৷ हमारी दुनिया में रूप, रंग, आकार, रौशनी, चेहरे, सब कुछ था, उनके पास गहन अन्धकार के सिवा कुछ नहीं ৷ मैं आकाश की ओर उंगली उठाता और आदतन कह देता “वो देख अशोक, कितनी सुन्दर पतंग उड़ रही है ৷ फिर अचानक मुझे अपनी बात की व्यर्थता का बोध होता लेकिन अशोक आसमान की ओर देखकर ताली बजाता और कहता “व्वा ! बहुत सुन्दर है ৷” मैं जानता था वह ऐसा मेरा मन रखने के लिए कह रहा है ৷ मुझे उस दिन यह भी पता चला कि दोस्ती मन रखने का भी नाम है ৷
कभी कभी मैं उसे अपने घर के लोगों के बारे में बताता ৷ वह बहुत ध्यान से मेरी बातें सुनता जैसे हम अपनी ऑंखें बंद कर ध्यान से सुनते हैं ৷ जब मैं उससे अपनी माँ के बारे में कुछ कहता, तो वह कहता “मुझे तो मेरी माँ का चेहरा भी पता नहीं ..मेरी ऑंखें तो जन्म के बाद से ही नहीं हैं ৷” अशोक की यह बात सुनकर मैं चुप हो जाता, मेरी आँखें डबडबा जातीं । मुझे चुप देख वह धीरे से मेरा हाथ थामता और थपथपाते हुए कहता “मत रो शरद , हमारी किस्मत में यही लिखा है ৷”
आवाज़ से ही नहीं चुप्पी से भी किसी की मन:स्थिति कैसे जानी जा सकती है यह भी मैंने अपने इन्हीं मित्रों से जाना । उन्हें तो साँसों की आवाज़ से भी मनस्थिति जानने की कला आती थी ৷ मैं उन लोगों से बातें करते हुए अक्सर अपनी आँखें बन्द कर लिया करता था और कोशिश करता था कि केवल ध्वनि सुनकर उन्हीं की तरह इस दुनिया को महसूस करूँ । घर में उन्ही की तरह टटोल कर चीज़ें ढूँढता और कभी कभी माँ से नज़रें बचाकर आंखे बंद कर थाली में रोटी भी टटोल टटोल कर खाता ৷
हमारे घर के परिसर में ही आंगन से लगी एक गली थी जो सामने से पीछे तक जाती थी ৷ इस गली में मैं अक्सर दोनों हाथ फैलाकर, आँखें बन्द कर चलने की कोशिश किया करता था । एक दिन माँ ने ऐसा करते हुए मुझे देख लिया और पूछा “यह क्या कर रहे हो ?” मैंने माँ से कहा “ माँ, मैं देख रहा था ..अशोक बिना आँखों के कैसे चलता होगा, हम लोग तो आँख होते हुए भी कभी कभी ठोकर खा जाते हैं ,फिर उसके पास तो .. ।“ माँ ने कहा “ हाँ उनके लिए बिना आँखों के जीवन मुश्किल तो है लेकिन उन्हें सब कुछ आ ही जाता है ৷ कहते हैं न भगवान अगर कुछ छीनता है तो कुछ दे भी देता है৷ ”
मैं माँ से पूछना चाहता था “ लेकिन भगवान बच्चों से ही सब कुछ क्यों छीनता है ?” मगर उस वक़्त मैंने यह सवाल उनसे नहीं पूछा और फिर आँखे बंद कर उन लोगों की ज़िंदगी महसूसने लगा जिनके पास हमारी तरह आँखें नहीं हैं ৷
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