| फिल्म मंज़िल मे अमिताभ मौसमी |
फिल्म मंज़िल का अमिताभ बच्चन और मौसमी चटर्जी पर फिल्माया यह गीत हम सहज रूप से गीत गुनगुनाते हैं लेकिन क्या कभी ख्याल आता है कि गायन की इस कला तक पहुँचने के लिए हमारे पुरखों ने कितनी लम्बी यात्रा की है ৷ पहली पहली बार कोई भी काम करते हुए कभी भी हमारे मन में यह ख्याल नहीं आता कि इसे पहली बार किसने किया होगा ?
![]() |
| कार्ल वान ड्राइस |
बचपन में पहली बार जब मैंने साइकिल का हैंडल पकड़कर उसके पायडल पर पांव रखा था तो मुझे भी यह ख्याल कहाँ आया था कि पहली बार साईकिल किस इंसान ने चलाई होगी या साइकिल का आविष्कार किसने किया होगा ৷ बरसों बाद पता चला कि वह एक फारेस्ट ऑफिसर कार्ल वान ड्राइस था जो सन अठारह सौ सत्रह में जर्मनी के जंगलों में काम करता था ৷ जंगल के भीतर दूर दूर तक जाने के लिए उसके पांव नाकाफ़ी थे इसलिए उसे एक ऐसी सवारी की आवश्यकता थी जो उसे तुरंत उन घने पेड़ों और झाड़ियों के बीच से अपने गंतव्य तक पहुँचा सके ৷
फिर जाने कितने असफल प्रयोगों के बाद, जाने कितने कलपुर्जे बनाने और बदलने के बाद जर्मनी के एक जंगल अधिकारी ने आखिर दुनिया की पहली साइकिल बना ही ली थी ৷ कई बार गिरने पड़ने के बाद आखिर वह साइकिल चलने में भी सफल हो गया था ৷ सीखने में मैं उसका वंशज था । उम्र के शुरुआती वर्षों में साइकिल चलाने का यह हुनर मुझमे पैदा करने का श्रेय मैं अपने दो मित्रों शरद और प्रमोद भोयर को देता हूँ ৷
![]() |
| भोयर काका इसी घर मे आए थे |
शरद और प्रमोद उर्फ़ प्रवीण के पिता श्री वामन पुंडलीक भोयर की पोस्टिंग भंडारा के निकट बेला स्थित बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में हुई थी ৷ बाबूजी भी उसी कॉलेज में थे । बाबूजी ने उन्हें अपने ही पड़ोस में एक किराए का मकान दिलवा दिया ৷ यह मकान जोगीतलाव में खुलने वाली गली के बाद वाली चाल में दूसरे नंबर पर था ৷ वे बाबूजी के मित्र थे इसलिए हम उन्हें भोयर काका कहने लगे । उनके दोनों बेटे शरद और प्रमोद से मेरी मित्रता प्रारंभ हुई और यह मित्रता भोयर काका के भंडारा से तबादला हो जाने के बाद भी जारी रही ।
हमारी दोस्ती की शुरुआत बरसात की उन शामों में हुई जब ज़मीन थोड़ी नर्म हो जाती है और लोहे का लम्बा सूजा गाड़ कर खेलने वाला खेल शुरू हो जाता है । घर के भीतर जाने वाली पायरी और बाहरी दीवार के बीच वाले कोने में हमारा कंचे का अड्डा हुआ करता था । आँगन में घेरा बनाकर भौरा खेलना भी हमारा प्रिय खेल था । भौरे में लोहे की नोक लगाने के लिए हम लोग लोहार के पास जाया करते थे और गाहे बगाहे उस नोक को फर्शी पर घिस घिस कर धार दिया करते थे ताकि प्रतिद्वंद्वी का लकड़ी का भौरा एक चोट में ही तोडा जा सके ।
शरद के घर का पिछला दरवाज़ा जोगीतलाव के मैदान में खुलता था । वह हम लोगों के लिए खेल का एक विस्तृत मैदान था । जब बारिश होती तो हम लोग सूजे वाला खेल खेलते और बारिश बंद होने पर गिल्ली डंडा । फिर धीरे धीरे और भी दोस्त आने लगे और हमारा यह खेल क्रिकेट में बदल गया । क्रिकेट यह गिल्ली डंडे के खेल का अपडेटेड वर्शन था । मैदान में अपनी आरक्षित पिच पर हम लोग प्रतिदिन देर शाम तक क्रिकेट खेला करते थे ৷ हमारी टीम में शरद और प्रमोद के एक मामा भी रहते थे जिन्हें हम केशव मामा कहते थे और वे हमारे हम उम्र थे । उनके अलावा शंकर सव्वालाखे और नरेश तिवारी भी हमारी टीम के सदस्य थे । नरेश उर्फ़ गुल्लू शरद के घर के सामने ही एक झोपड़ीनुमा कच्चे मकान में रहता था ।
जब हमारा खेल शुरू होता तो घड़ियों के कांटे हमारे लिए रुक जाते । स्कूल की पाठ्यपुस्तकों से बाहर आकर हमें डराने वाले अभ्यास के भयावह दैत्य मैदान के बाहर ही खड़े रहते । फिर जैसे ही अँधेरा होने लगता शरद व प्रमोद के घर में सांध्य दीप जलते दिखाई देने । इससे पहले कि काकू के डाँटने की आवाज़ हम तक पहुँचे हम लोग अपने घरेलू जुगाड़ से बनाये स्टम्प, गेंद और बल्ला उठाकर घर लौट आते ৷ भोयर काका और काकू की आवाज़ दूर तक मेरा पीछा करती .. जय देव जय देव जय आनंद रूपा ..जय देव जय देव जय मंगल मूर्ती .. दर्शन मात्रे मनोकामना पूर्ति.. ।
![]() |
| इसे कहते हैं कैंची साइकिल |
शरद और प्रमोद के साथ किया जाने वाला सबसे एडवेंचरस काम था साइकिल चलाना सीखना । यह काम हम लोग पिताओं की छुट्टी के दिन या उनके नौकरी से आने के बाद किया करते थे इसलिए कि उन दिनों घर में केवल एक ही साइकिल होती थी। शरद मुझसे पहले साइकिल चलाना सीख गया था । एक दिन उसने मुझे अपने साइकिल थमाई और कहा “उल्टा पांव इस पाइडल पर रखो और दूसरा बीच से निकालकर दूसरे पाइडल पर रखो ।” फिर उसने पीछे कैरियर से साइकिल पकड़ी और कहा “ अब चढ़ जाओ और आधा आधा पाइडल मारो, मैं पकडे हूँ । मैंने पहले ही दिन सफलता पूर्वक यह लेसन पूर्ण कर लिया ।
इस तरह मैं ‘आधी कैंची’ में प्रवीण हो गया । फिर दो दिन आधी कैंची की प्रैक्टिस के बाद उसने मुझे फुल कैंची सिखाई मतलब पूरा पाइडल मार कर साइकिल चलाना। आखिरी लेसन तब मिला जब मैं हैंडल पर नज़र रखने के चक्कर में शरद के घर के सामने वाले बिजली के खम्भे से टकराया “ अरे अरे .. हैंडल पर नहीं ..रोड पर नज़र रखो ।“ बचपन के इस आनंद की कल्पना वही कर सकता है जिसने उस उम्र में साइकिल सीखी हो । सीट पर बैठकर चलाने का समय तो तब आया जब हमारी हाईट साइकिल के बराबर हो गई ৷ जीवन का सफ़र भी साइकिल के सफ़र की तरह होता है । बहुत से लोग सीट पर बैठकर साइकिल चला ही नहीं पाते , उनका कद , उनकी योग्यता और स्थिति सफ़र सिर्फ हाफ़ कैंची से फुल कैंची तक ही रहता है
![]() |
| पीछे शरद सामने प्रमोद माताजी और बहूएं यवतमाल |
यह वे दिन थे जब हम अपनी पतंगों को उड़ाते हुए उनके साथ अपनी खुशियों और उमंगों को भी आसमान तक पहुंचता हुआ देखते थे । लट्टू के साथ हमारा मन भी झूमता था और दूर जाती गेंद के साथ हम दूर जाती दुश्चिंताओं को देखते थे । मैंने साइकिल सिखाने का श्रेय तो शरद को दिया लेकिन इस सवारी के आविष्कार का श्रेय मैं बचपन के उस बालसुलभ अहं और अपनी नासमझी वाली समझ में सभ्यता के बचपन में जन्म लेने वाले उस आदिम मनुष्य को ही देता रहा जिसने पेड़ के गोल तने को लुढ़काकर पहिये का अविष्कार किया था ৷
हम सब आज भी यही करते हैं । विज्ञान के आधार पर हमें आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने हेतु किये गए अविष्कारों का श्रेय वैज्ञानिकों या अविष्कारकों को न देकर हम अपनी गौरवशाली संस्कृति का गुणगान करते हुए उन पौराणिक कथा लेखकों को देते हैं जिन्होंने इसकी कल्पना मात्र की थी ৷ यद्यपि अतीत से लेकर अद्यतन प्रत्येक अविष्कार में प्रत्येक व्यक्ति का योगदान प्रशंसनीय है चाहे वह कल्पना क्यों न हो । यह ठीक उस तरह है जैसे कि हमारे व्यक्तित्व निर्माण में बचपन से लेकर अब तक के हर पल का योगदान है ৷




कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें