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| देशबंधु वार्ड की गली मे हमारा मकान |
यद्यपि पौराणिक पात्रों के नामों पर बच्चों के नाम तो अभी भी रखे जाते हैं लेकिन इन पात्रों में भी ऐसे अनेक नाम हैं जो कहीं सुनने को नहीं मिलते जैसे रावण, कंस या दुर्योधन ৷ लड़कियों में शूर्पणखा,ताड़का या हिडिम्बा यह नाम मिलना तो असम्भव है ৷ द्रौपदी नाम भी बहुत कम मिलता है ৷
ऐसा ही कुछ था उस बच्चे का नाम ৷ वह रामकिशन के घर के बाद वाली गली में रहता था ৷ उसके घर में एक स्त्री थी जिसका रंग साँवला था, इतना साँवला कि माँ उसे काली कहती थी । माँ पड़ोस की सभी स्त्रियों से बात करती थी लेकिन उससे नहीं ৷ वह स्त्री अक्सर हमारे घर के सामने से निकलती थी और कनखियों से हमारे घर की ओर देख लेती थी ৷ माँ अगर दरवाज़े पर खड़ी हो तब भी कभी वह उनसे आँख नहीं मिलाती थी ৷
मैंने एक दिन माँ से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया “ तुम्हारे पहले जन्मदिन पर हमने तुम्हे सोने की एक पतली सी चैन पहनाई थी । जब तुम आंगन में खेल रहे थे तब यह स्त्री घर में आई थी और चुपचाप तुम्हारे गले से चैन उतारकर ले गई ৷ फिर जब पुलिस में रिपोर्ट की गई और मोहल्ले वालों को पता चल गया तो वह स्त्री जाने कब घर में आई और चुपचाप वह चैन बगीचे में फेंक कर चली गई । चैन मिल गई तो फिर आगे कोई कार्यवाही नहीं की गई । “
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| हमारे घर वाली गली |
उस के घर तो मैं वैसे भी कभी नहीं गया लेकिन उसके बाद वाले रमाबाई के घर ज़रूर जाता था । रमाबाई विधवा थी और बर्तन माँजकर अपना गुजारा करती थी । छोटी बहन सीमा जब नन्ही सी थी तो रमा बाई उसका बहुत लाड़ किया करती थी । रमाबाई का एक बेटा था जिसका नाम सुधाकर था । उसे जब महाराष्ट्र राज्य परिवहन यानि एस टी में कंडक्टर की नौकरी मिल गई थी तो रमाबाई ने बर्तन माँजना बन्द कर दिया । इनका सरनेम अम्बाडारे था ।
रमाबाई के घर के सामने एक बड़े से अहाते वाला मकान था जिनके यहाँ गायें थी और हमारे दूधवाले के न आने पर मैं उसके यहाँ से दस पैसे में एक गिलास का दूध लाया करता था । रमाबाई के मकान से लगा हुआ भरतलाल का मकान था ৷ भरतलाल जी वैसे तो अच्छे आदमी थे लेकिन कभी कभी तरंग में रहते तो पूरे मोहल्ले में उधम मचा देते थे । लेकिन कोकास गुरूजी का वे बहुत सम्मान करते थे इसलिए कि उन्हें शांत भी बाबूजी ही करते थे ৷ उनके बेटे का नाम सुभाष था । उसके घर के सामने उन्ही के भाई नागपुरे का मकान था ।
| नागपुरे का मकान |
यह तमाम बस्ती गरीबों की बस्ती थी जिनके मकान की दीवारें मिट्टी की थीं और उनके ज़ख्मों की तरह रिसती रहती थीं ৷ ओलावृष्टि से अथवा बंदरों के प्रकोप से अक्सर खपरे टूट जाते थे और मूसलाधार बरसात के दिनों में घर के भीतर पानी टपकता रहता था ৷ इतनी आय किसी की नहीं थी कि बार बार मरम्मत करवा सकें ৷ अभाव इनके घर में सदा अपना डेरा डाले रहते थे और किसी की आर्थिक क्षमता इतनी नहीं थी कि अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें । गली के इन दोनों अंतिम मकानों के बाद रिंग रोड थी ।
हमारी गली की पूर्व से होने वाली शुरुआत में घर से निकलते ही बाईं ओर डाकरे का बाड़ा आता था लेकिन उसका दरवाज़ा गली में न खुल कर मुख्य सड़क पर खुलता था । गली से बाहर निकलो तो दाहिनी ओर यह सड़क आगे बाज़ार तक जाती थी ৷ बाईं ओर कुछ दूर जाकर यही सड़क रिंग रोड से मिल जाती थी जहाँ त्रिकोण का एक कोण बनता था । गली के ठीक सामने सड़के के दूसरी ओर एक बिजली का खम्भा था जिसकी बाईं ओर मटन वाले भेदरे काका रहते थे, उनके दाईं ओर येवले, फिर सामने दादा हलमारे जिनके घर के सामने सीमेंट की दो बेंचें बनी थी ।
| भैयालाल पटले का मकान |
डाकरे के बाड़े में अनेक किरायेदार रहते थे ৷ आगे बढ़ने पर एक ऊंची इमारत थी ৷ यह कांग्रेस के नेता भैयालाल पटले का अस्थायी आवास था ৷ पटले जी बाद में जिला पंचायत के अध्यक्ष बने । उस घर में जाने के लिये हमारे घर के पीछे से भी एक रास्ता था । जब मैं नौ-दस साल का था तब कभी कभार शौकिया तौर पर उनके यहाँ चाय बनाने के लिए जाया करता था । मैने वहीं उनके रसोइये से चाय बनाना सीखा । मेहनताने में मुझे एक कप चाय मिला करती थी, बाल्यावस्था में यह मेरा प्रथम पारिश्रमिक था ।
डाकरे और पटले के मकान के बीच एक झोपड़ीनुमा मकान था जिसके पिछवाड़े में हम लोगों के घर के लिविंग रूम की खिड़की खुलती थी । पटले के घर के सामने जाम्भुलकर का मकान था, जहाँ लीला रहती थी । लीला हम सब बच्चों से बड़ी थी और हम सब की बॉस थी । रंगोली बनाना, भुलाबाई के गाने गाना और लड़कियों वाले तमाम खेल जैसे लघोरी यानि कवेलू के टुकड़े एक के ऊपर एक रखकर उन पर गेंद से निशाना लगाना, नदी पहाड़, डबा आइस पाइस , बिल्लस यानि बिट्टी,सागर गोटी, पत्थर के टुकड़ों या चूड़ी उछालकर खेलने वाला खेल , पुराने कपड़े का सोटा बनाकर वृत में बैठे बच्चों की पीठ पर मरने वाला खेल ‘आईचा पत्र हरवला’ , आंखमिचौली यानि आंधळी कोशिंबीर जैसे अनेक खेल मैंने लीला की मंडली में ही सीखे थे ৷ कपड़े की गुड़िया व गुड्डे वाला खेल नानी की नातिन अन्नू के साथ खेलता था ৷
| लीला ताई |
लीला के मकान की दाहिनी ओर किराना वाले नन्दू काका यानि नंदलाल बैस ने अपना मकान बनाया था जिस पर ‘जलाराम निवास‘ लिखा था । नंदू काका स्वयं अपने खामतालाव वाले मकान में रहा करते थे और यह मकान उन्होंने किराये पर दे दिया था ৷ इस मकान में बाद में श्री महेश पाण्डेय रहने आये थे वे स्थानीय जे.एम.पटेल कॉलेज में प्रोफेसर थे और उनकी दो नन्ही नन्ही बेटियाँ थीं । महेश पाण्डेय के भाई मधुप पाण्डेय नागपुर में रहते थे और मंचों के सुप्रसिद्ध कवि थे ।
इस मकान के दायीं ओर एक सँकरी सी गली थी जो बमुश्किल तीस फिट लम्बी थी ৷ यह गली जोगीतालाव के मैदान में खुलती थी । इस मैदान में जकातदार कन्या शाला थी जिसके सामने से एक रास्ता अन्धविद्यालय और महिला समाज बालक मन्दिर की ओर जाता था । अन्धविद्यालय के सामने एक टेकड़ी थी जिसके खत्म होते ही मनरो हाइस्कूल था । जकातदार कन्या शाला की बाईं ओर बी. एड. कॉलेज था ৷ बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज बेला से सन सडसठ में बाबूजी इसी बी एड कॉलेज में प्रोफ़ेसर बनकर आ गए थे । इस सँकरी गली के ठीक सामने सड़क की दूसरी ओर पटले के घर की बाईं ओर एक गली और थी जिसमें हमारे मकान का पीछे का दरवाज़ा खुलता था ।
| जकातदार कन्या शाला |
जोगी तलाव की ओर जाने वाली इस सँकरी गली के बाद कुछ मकान और थे । पहला मकान एक बाड़ेनुमा या चालनुमा मकान था, जिसमें अनेक किरायेदार रहा करते थे । पहले नबर के ब्लॉक में हमेशा नये लोग आते थे । एक बार इस ब्लॉक में एक नया जोड़ा रहने के लिये आया । इस ब्लॉक की एक खिड़की संकरी गली में खुलती थी ৷ मोहल्ले के बड़ी उम्र के बदमाश लड़के सूनी दोपहरियों में उस खिड़की की दरारों से ताक झाँक किया करते थे । एक दिन उचक उचक कर दरार से झाँककर देखने के प्रयास में एक लड़का हड़बड़ाहट में खिड़की से टकरा गया । शोर मचा तो उस घर में रहने वाले सज्जन घर से बाहर आये और लड़कों को गालियाँ देनी शुरू कर दी । कुछ समझ आने के बाद अपने समवयस्कों से उनकी बदमाशियों के किस्से सुनते हुए मुझे मालूम हुआ कि वे झाँककर क्या देखते थे ৷
अभी के बच्चों को मोबाइल में गेम खेलते हुए देखता हूँ तो याद आता है हम लोग स्कूल से आने के बाद घर में टिकते ही नहीं थे बस्ता पटक कर सीधे जोगीतालाव के मैदान निकल जाते और गिल्ली डंडा , भौरा , घुप्पस ( जमीन में लोहे की डंडी गाड़ने वाला खेल ) और एक लकड़ी उछलने वाला खेल खेलते थे
पटले के घर के सामने जाम्भुलकर का मकान था, जहाँ लीला रहती थी । लीला हम सब बच्चों से बड़ी थी और हम सब की बॉस थी । लड़कियों वाले सारे खेल मैंने लीला ताई से ही सीखे |
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| टायर के खेल |
इन खेलों में रंगोली बनाना, भुलाबाई के गाने गाना और लड़कियों वाले तमाम खेल जैसे लघोरी यानि कवेलू के टुकड़े एक के ऊपर एक रखकर उन पर गेंद से निशाना लगाना, नदी पहाड़, डबा आइस पाइस , बिल्लस यानि बिट्टी,सागर गोटी, पत्थर के टुकड़ों या चूड़ी उछालकर खेलने वाला खेल , पुराने कपड़े का सोटा बनाकर वृत में बैठे बच्चों की पीठ पर मरने वाला खेल ‘आईचा पत्र हरवला’ , आंखमिचौली यानि आंधळी कोशिंबीर जैसे अनेक खेल मैंने लीला की मंडली में ही सीखे थे ৷ कपड़े की गुड़िया व गुड्डे वाला खेल नानी की नातिन अन्नू के साथ खेलता था ৷
आप लोगों ने बचपन में इनमे से कौन से खेल खेले हैं ?
( पुस्तक " बैतूल से भंडारा : एक जन इतिहास से एक अंश



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