यह कोई स्वप्न दृश्य नहीं है । हिन्दी कविता के हमारे सुधी पाठक प्रारंभ की आधी पंक्ति से ही जान गए होंगे कि इन पंक्तियों में हिंदी के हमारे पुरखे कवि मुक्तिबोध की स्मृति है ।
मुक्तिबोध का एक प्रसिद्ध चित्र है जिसमे वे बीड़ी सुलगा रहे हैं । भीतर धँसे हुए गालों की गहराई में उभरते उनके होठों के बीच एक बीड़ी है जिसे उन्होंने बाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा उंगली के बीच पकड़ रखा है । दायें हाथ में माचिस की जलती हुई एक तीली है जिसकी लौ बीड़ी की नोक से स्पर्श कर रही है । उनकी पलकें नीचे की ओर झुकी हैं और वे उस लौ में मनुष्य द्वारा पहली बार चकमक पत्थर से जलाई गई आग का अक्स देख रहे हैं ।
कला एवं साहित्य के मित्रों को यह चित्र कुछ रूमानियत से भरा हुआ लग सकता है लेकिन जब भी मैं बीड़ी पीते हुए मुक्तिबोध के इस चित्र को देखता हूँ तो मुझे बचपन के दिनों में भंडारा के अपने पड़ोस के घर में रहने वाले बुध्या की माँ और दादी की याद आ जाती है, याद आती हैं कंदील की मद्धम रौशनी में बीड़ी बनाते हुए झुकी हुई उनकी पीठ और तेंदू पत्ते व तम्बाकू से भरी ट्रे में गुम हो चुकी उनकी ऑंखें । मोहल्ले की अनेक महिलाओं की तरह पांडुरंग ठाकरे के घर में उनकी पत्नी और माँ बीड़ी बनाया करती थीं । मैं अक्सर उनके पास बैठकर उनका बीड़ी बनाना देखा करता था ।
वे टीन से बनी एक ट्रे में तम्बाकू, धागा और पत्तों को रखतीं । इस तरह की चौकोर या सूप के आकार की ट्रे महाराष्ट्र में ‘पत्तर’ कहलाती है । पत्तर सज जाने के बाद वे फिर पत्तों को पान काटने वाली एक कैंची से सिगरेट के पैकेट से कुछ छोटे आकार में काटतीं, एक ओर थोड़ा अधिक चौड़ा व दूसरी ओर उससे कुछ कम । फिर बीड़ी के एक बण्डल लायक पत्ते गिनकर उनकी गड्डी बनातीं । यह पत्ते नर्म रहें इसलिए जूट की बोरी के एक टुकड़े जिसे ‘फारी’ कहते थे उसे गीला कर उसमे पत्ते लपेटकर रखतीं ।
बीड़ी बनाने की शुरुआत करते हुए सर्वप्रथम वे उस गड्डी से एक आयताकार पत्ता लेकर उसपर बीच में थोड़ी सी तम्बाकू भरतीं और एक कोने से सामने के विकर्ण कोने तक तिरछे चलते हुए,तम्बाकू को थोड़ा थोड़ा सिरों की ओर फैलाते हुए उँगलियों के एक निश्चित दबाव के साथ उसे गोल गोल लपेट देतीं । तम्बाकू भरकर पत्ते को लपेटते हुए इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी होता था कि बीड़ी का जो सिरा होठों के भीतर होता है उसे थोड़ा सा दबाकर चपटा कर दिया जाए । फिर उसे धागे से बांधना भी ज़रूरी होता है ताकि वह खुल न जाये । फिर लोहे की तीन इंच लम्बी आधा इंच चौड़ी पतली सी एक आयताकार पट्टी की नोक से बीड़ी के जलाये जाने वाले सिरे को भीतर की ओर दबाते हुए कोंच कोंच कर उसका मुँह बन्द कर देतीं ताकि तम्बाकू वहाँ से बाहर न निकले । इस तरह चोवीस या पच्चीस बीड़ियाँ हो जाने पर वे उसका एक बण्डल बना देतीं ।
मुझे तम्बाकू और तेंदू पत्ते की कुँवारी गंध बहुत अच्छी लगती थी । बीड़ी बनाने की कला भी मेरे लिए किसी सृजनात्मक कला से कम नहीं थी । एक दिन मैंने उनसे कहा “मुझे भी बीड़ी बनाना सिखा दो न काकी “ वे बहुत देर तक हँसती रहीं और कहा ..”तू बड़े घर का लड़का है, तू क्या करेगा बीड़ी बनाना सीख कर, तू तो साहेब बनेगा साहेब । ” मुझे उस उम्र में उनकी बात समझ में नहीं आई थी कि किराये के छोटे से घर में रहने वाला मैं, बड़े घर का लड़का कैसे हो गया और इसका बीड़ी बनाना सीखने से क्या सम्बन्ध है ।
बीड़ी बनाने के बाद काकी उन बंडलों को एक टोकनी में रखकर, सर पर लादकर, बीड़ी कारखाने तक पहुँचाने जाती थी । उनका कोई ख़ास कारखाना रहा होगा लेकिन मुझे याद नहीं । वैसे भंडारा में उन दिनों अनेक बीड़ी कारखाने थे जिनमे बड़े बाज़ार में दादा धोटे उर्फ़ बारा भाई के घर के पास स्थित छोटाभाई जेठाभाई बीड़ी कारखाना सबसे मशहूर था । यह सन दो हज़ार चार में केंद्र सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री रह चुके कांग्रेस के लोकप्रिय नेता प्रफुल्ल पटेल के दादा और भंडारा ज़िले के शैक्षणिक विकास के प्रणेता मनोहर भाई पटेल के पिताजी का कारखाना था । यह लोग बंदरी बीड़ी बनाया करते थे जो बाद में मनोहर बीड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुई । स्टेशन जाने वाली रोड पर दिनकर राव रहाटे के घर के दाहिनी ओर खण्डहर सी दिखाई देने वाली अधूरी बनी एक इमारत में सेठ रावजी भाई अम्बालाल का बीड़ी कारखाना था जो ठक्कर अम्बालाल कारखाने के नाम से प्रसिद्ध था । इसका बड़ा सा खुला दरवाज़ा था जिस पर प्लास्टर नहीं था । कहते हैं कि वहाँ किसी ब्रह्मराक्षस का शाप था जिसकी वज़ह से इमारत का निर्माण कार्य कभी पूरा नहीं हो पाता था ।अंततः वह इमारत ढहा दी गई , वहां अब जो है उसे आप इस चित्र में देख सकते हैं ।
उस समय बीड़ी का कारोबार अधिकतर गुजरातियों के हाथ में था । उन्हीं में से एक मूलजी भाई का कारखाना था जो राममंदिर के पीछे कोष्टी मोहल्ले में था । एक बीड़ी कंपनी सी पी कंपनी के नाम से भी मशहूर थी । अनेक छोटे मोटे कारखानों के अलावा राजा गणपतराव पाण्डे के महल वाली सड़क पर उनके हाथीखाने के सामने हरगोविंद लाल मोहन लाल का बीड़ी कारखाना था । यह कारखाना बहुत बड़े एक परिसर में था जहाँ खूब सारे आम के पेड़ थे । मेरे साथ मिडिल स्कूल में पढ़ने वाले दोस्त रूपचंद ज्ञानी के पिता इस कारखाने में मुनीम थे । हाथीखाने के पीछे ही गाँधी विद्यालय था । मैं अक्सर दोपहर की लंच की छुट्टी में रूपचंद के साथ कारखाने चला जाया करता था और वहाँ मजदूरों को बीड़ी बनाते हुए देखने के अलावा अन्य गतिविधियाँ भी देखा करता था । इस चित्र मे जो गेट है उसके भीतर था यह कारखाना ।
कारखाने की इमारत में बीचों बीच एक बड़ा हाल था जो पुरुष मजदूरों के लिए था और एक छोटा हाल महिला कामगारों के लिए था । वे सुबह सुबह कारखाने आते एक वितरण खिड़की से अपनी ट्रे यानि पत्तर , तम्बाकू ,पत्ते, धागा और पट्टी लेते और हाल में बिछी दरी पर एक जगह पालथी मारकर बैठ जाते । हर कारखाने में बीड़ी में प्रयुक्त की जाने वाली तम्बाकू की किस्म अलग अलग होती थी । इसके अलावा अलग अलग कंपनियों का धागा भी अलग होता था । लाल,पीले,हरे,नारंगी आदि रंगों के धागों से ही अलग अलग कंपनियों की बीड़ियाँ पहचानी जाती थीं । जिन लोगों को कारखाने में बैठकर काम नहीं करना होता था वे अपना तम्बाकू,धागा और पत्ते आदि लेकर घर चले जाते थे । इनमें अधिकांश महिलाएँ होती थीं इसलिए कि उन्हें बीड़ी निर्माण के अलावा घर के काम भी करने होते थे । यह उन दिनों के वर्क फ्रॉम होम का प्रारंभिक संस्करण था । बीड़ी तैयार होने के बाद उसका बण्डल बनाया जाता और उसे कारखाने में उसी दिन या अगले दिन जमा किया जाता ।
शहरों की तरह गांवों में भी बड़े कारखानों की छोटी छोटी इकाइयाँ थीं । यहाँ एक दीवान जी नामक शख्स के माध्यम से सारा काम होता था । यह दीवान या उनका आदमी शहर के कारखाने से तेंदू पत्ता,तम्बाकू,धागा आदि लेकर आता और उसे हिसाब से गाँव के बीड़ी मजदूरों में बाँट देता । फिर बीड़ियाँ बन जाने के बाद एक बाँस के बने एक बड़े से टोकरे में जिसे ‘हारा’ या ‘झाल’ कहते थे उन बंडलों को इकठ्ठा किया जाता और दीवान या उनका आदमी उन्हें भरकर शहर के बड़े कारखाने में पहुँचा देता था ।
फिर दीवान सप्ताह में एक बार शहर के कारखाने जाता और वहाँ उन बंडलों के एवज में प्राप्त भुगतान राशि लेकर गाँव आता और उन्हें मजदूरों में बाँट देता था । मजदूरी का भुगतान सप्ताह में एक बार ही किया जाता था । मजदूर लगभग रोज ही उनके द्वारा बनाई हुई बीडियों के बण्डल दीवान के पास जमा करते और नए बण्डल बनाने के लिए अगले लाट का सामान ले जाते । हर मजदूर को दी गई तम्बाकू, तेंदू पत्ते की मात्रा का हिसाब बराबर रखा जाता । उसके ऐवज में प्राप्त बनी हुई बीडियों के बण्डल और उसे किये गए साप्ताहिक भुगतान का हिसाब भी एक कॉपी में लिखा जाता था । ऊपर से देखने में ऐसा ही लगेगा कि यह कितनी बढ़िया व्यवस्था है, कारखाने से कच्चा माल लो, आराम से घर बैठकर बीड़ियाँ बनाओ, उन्हें कारखाने में जमा कर अपना मेहनताना वसूल करो और ख़ुशी ख़ुशी जीवन बिताओ । लेकिन ऐसे दृश्य केवल गाँव का सेट बनाकर गाँव का सुखी जीवन दिखाने वाली हिंदी फिल्मों में मिलते हैं, वास्तविकता इसके बिलकुल विपरीत होती है ।
शरद कोकास









मित्रों बीड़ी कामगारों का जीवन कैसा होता है कितनी मुश्किल से वह जीवन जीते हैं बीड़ी कैसे बनाई जाती है फिर कैसे उनका शोषण होता है यह सब जानने के लिए इस श्रृंखला के यह तीन लख अवश्य पढ़ें
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