22 मई 2026

40.उन लकीरों के जाल में निःशब्द अक्षर सो गए


हिन्दी साहित्य के इतिहास की एक प्रमुख घटना है नयी कविता आन्दोलन के प्रमुख कवियों द्वारा सन  उन्नीस सौ चौवन में इलाहाबाद से अर्ध वार्षिक पत्रिका ‘नयी कविता’ का प्रकाशन । इसकी योजना डॉ.धर्मवीर भारती, रघुवंश, ब्रजेश्वर वर्मा, विजय देव नारायण साही ने बनाई थी ।  ‘नयी कविता’ के प्रारम्भिक अंकों में जब अज्ञेय,कीर्ति चौधरी, कुँवर नारायण, जानकी वल्लभ शास्त्री, गिरिजा कुमार माथुर, शमशेर, पन्त, भवानी प्रसाद मिश्र, परमानन्द श्रीवास्तव, अजित कुमार, भारत भूषण अग्रवाल, साही जैसे कवियों की पारम्परिक शिल्प और प्रयोगवादी कविताओं से अलग नये शिल्प में नयी कविताएँ प्रकाशित हुईं तो साहित्य जगत में अनेक प्रकार की सकारात्मक व नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ हुईं । यद्यपि आठ अंकों के बाद नयी कविता का प्रकाशन बंद हो गया लेकिन इस पत्रिका ने एक नयी क्रांति का सूत्रपात किया । ‘नयी कविता’ इस पत्रिका के प्रारम्भिक अंकों के संपादक थे रामस्वरूप चतुर्वेदी और जगदीश गुप्त । जगदीश गुप्त स्वयं नयी कविता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं ।

मैं जब भी मनुष्य द्वारा भाषा की खोज के पश्चात गीली मिट्टी की पाटी पर सरकंडे की कलम से आकृतियों के माध्यम से अक्षर उकेरने के उसके प्रयास के बारे में सोचता हूँ तो मुझे जगदीश गुप्त की एक कविता ‘अक्षर और आकृति’ याद आ जाती है  ... 

क्षणभर रुका पेन / और फिर कुछ अधबने अक्षर सँवारे / पाइयों के शीश को ऊपर उठाया / मात्राओं के अनुपूर चरण अनुरंजित किये / नूपुर पिन्हाए / सभी सीमाएँ मिलाईं / नई रेखाएं बनाईं / यहाँ तक / वे नाम सारे खो गए/ 

मनुष्यता के विकास के सोपान चढ़ते हुए हम होमोसेपियंस सरकंडे की कलम से आगे बढ़ते हुए फाउंटेन पेन तक आ पहुँचे थे । उन दिनों स्याही वाला पेन बच्चों को तुरत फुरत में नहीं मिल जाता था । शुरुआत तो स्लेट पर खड़िया से लिखने से होती थी । शाम को दिया बाती के उपरांत  माँ मेरे हाथों में खड़िया की कलम पकड़ा देती और मेरा हाथ पकड़कर स्लेट पर लिखना सिखाती थी “ अच्छा अब ‘अ’ लिखो सबसे पहले ऊपर एक चूल्हा, उसके नीचे दूसरा चूल्हा फिर दोनों के बीच से एक आड़ी डंडी जो खड़ी डंडी के पेट तक पहुँचती है, फिर ऊपर टोपी पहनाना है । “ लिपि में पेट और चूल्हे का अंतर्संबंध मुझे माँ द्वारा अक्षर ज्ञान करवाए जाने के दौरान हुआ । आश्चर्य यह कि माँ ‘अ’ कुछ अलग ढंग से लिखती थी, जिसमे ‘प’ अक्षर से बाहर की ओर जाती तीन डंडियाँ होती थीं ।


खड़िया कलम के बाद अगली पायदान पर पीतल की निब वाला होल्डर मेरी प्रतीक्षा कर रहा था । शिवहरे गुरूजी सारे बच्चों की हैण्ड राइटिंग पर बहुत ध्यान देते थे । उनका कहना था कि होल्डर से थोड़ा ठहर ठहर कर लिखने  से राइटिंग अच्छी आती है । होल्डर लकड़ी का बना हुआ एक कलम होता था जिसमें अलग से निब और जीभ लगाई जाती थी फिर उसे स्याही की दवात में डुबो डुबो कर लिखा जाता था । फाउंटेन पेन इसी होल्डर का विकसित स्वरूप है । घर से आते जाते बस्ते में स्याही की दवात उलट न जाए इसका भी एक हल उन्होंने निकाल रखा था । घर जाते हुए हम सब अपनी अपनी दवातें उनकी आलमारी में अपने नाम की चिट लगाकर रख देते थे और सुबह आकर निकाल लेते थे । घर के लिये अलग दवात थी जो  घर में ही रहती थी ।  

भंडारा में मेन रोड पर उन दिनों स्टेशनरी की एक प्रसिद्ध दुकान थी विजय बुक डेपो, जिसके संचालक थे गभने गुरूजी । स्याही बनाने के लिये गभने गुरूजी की स्टेशनरी की दुकान में नीली व लाल स्याही की गोल गोल टिकिया मिलती थी जिसे पानी में घोलकर हम लोग स्याही बनाते थे । 


जगदीश गुप्त की कविता की तरह हम लोग कॉपी पर अधबने अक्षर संवारते, पाइयों के सर ऊपर उठाते और मात्राओं के चरणों में नुपुर पहनाते । आज सोचता हूँ गुरूजी ने होल्डर पकड़ाकर अच्छा ही किया वर्ना इतनी अच्छी राइटिंग हम लोगों की नहीं होती । वैसे बाबूजी की भी हैंडराइटिंग बहुत अच्छी थी और उन्होंने भी मुझे इस दिशा में काफी प्रोत्साहित किया । वे मेरे शुद्धलेखन पर भी ध्यान दिया करते थे और अक्सर ‘धर्मयुग’ या ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’  का कोई पन्ना मुझे कागज़ पर उतारने के लिये दे दिया करते थे , बाद में जिसे चेक कर वे मेरी ग़लतियाँ बताया करते थे । 

मुझे भी उन दिनों अख़बारों से ‘अनमोल वचन’ और ‘दादी माँ के नुस्खे या ‘फ़कीरी नुस्खे’ उतारने का शौक लगा था जिन्हें मैं बाकायदा अलग अलग कॉपी में उतारता था । अनमोल वचन वाली मेरी कॉपी तो गुम हो गई लेकिन फ़कीरी नुस्खे वाली कॉपी अभी भी मेरे पास है । उन दिनों प्रायमरी स्कूल में शुद्धलेखन का भी एक पीरियड हुआ करता था जिसमें शिक्षक मुँह से बोलकर कोई गद्यांश लिखवाया करते थे और बाद में उसे जाँचकर वर्तनी की शुद्धता पर  नम्बर दिया करते । कलम दवात की यह जुगलबंदी चौथी प्रायमरी तक ही चली, पाँचवी कक्षा में पहुँचते ही बाबूजी ने मुझे एक डेल्टा पेन खरीदकर दे दिया ।


आजकल शुद्धलेखन और मनगणित जैसी प्रथाएँ लुप्तप्राय हैं । हैण्ड राइटिंग अच्छी होने का भी अब कोई महत्त्व नहीं है । अब सब कुछ कंप्यूटर या मोबाइल पर सीधे टाइप किया जाता है । लेकिन मुझे कागज़ पर कलम से लिखना हमेशा अच्छा लगता रहा । स्याही की गंध मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती है । अभी कुछ साल पहले तक मैं अपनी तमाम कविताएँ  हाथ से लिख कर ही संपादकों को भेजा करता था । कविताओं की पांच छः ड्राफ्टिंग होने के बाद ही वह फाइनल होती है । हाथ से लिखने के शौक की वज़ह से मैं तरह तरह के फाउंटेन पेन खरीदता रहा । कुछ साल पहले जब मैं चेन्नई गया था तो वहाँ  से एक जम्बो फाउंटेन पेन खरीदकर लाया था जिसमे अन्य पेन की अपेक्षा दुगनी स्याही आती थी । यह पेन अभी तक मेरे पास चालू हालत में है और मेरी अधिकांश कविताएँ  इसी पेन से लिखी गई हैं । आज मैं अपने आप को शिवहरे गुरुजी का कृतज्ञ पाता हूँ । अच्छी राइटिंग का होना मेरे भीतर आत्मविश्वास उत्पन्न करता है ।


पहली कक्षा की तिमाही परीक्षा में कक्षा में मेरा पहला नम्बर आया था । वैसे भी सारी पुस्तकें मेरी रटी हुई थीं । मेरी पहली कक्षा की पढ़ाई के दौरान बाबूजी ने शिवहरे जी के साथ मिलकर विचार किया कि मुझे साथ साथ दूसरी कक्षा की भी तैयारी करनी चाहिये । बाबूजी का कहना था कि मैं पढ़ने- लिखने में बहुत होशियार हूँ इसलिये मुझे और लोगों से आगे होना चाहिये । सो स्कूल में पहली की पढ़ाई और घर पर दूसरी कक्षा की पढ़ाई प्रारंभ हो गई । बाबूजी घर में मुझे दूसरी कक्षा की किताबें पढ़ाते थे । मार्च अप्रेल में मैने पहले पहली की परीक्षा दी और फिर दूसरी की । परीक्षाफल आया तो मैं दोनों कक्षाओं में प्रथम था । हालाँकि यह सुविधा सिर्फ मुझे ही मिल पाई थी जिसकी वज़ह शिवहरे गुरूजी और बाबूजी की मित्रता थी । अन्य पालकों के लिए  इतना काफी था कि उनके बच्चे स्कूल में जा रहे हैं । फिर हमारे हिंदी मीडियम के स्कूल में अधिकतर व्यवसायियों के बच्चे थे जिन्हें बड़ा होकर अपना पैतृक व्यवसाय संभालना था । जबकि नौकरी पेशा पिताओं के बच्चों को यह बात बचपन से मालूम थी कि उन्हें रोजी रोटी का कोई काम विरासत में नहीं मिलेगा और उन्हें भी अपने पिता की तरह नौकरी करनी होगी, इसलिए वे अन्य बच्चों की तुलना में पढाई में भी गंभीर होते थे l अब जाकर  यह स्थिति बदल रही है और व्यवसायियों के बच्चों में से भी कुछ बच्चे डॉक्टर ,इंजिनीयर ,प्रोफ़ेसर आदि बन रहे हैं ।

शरद कोकास 



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