मैं जब भी मनुष्य द्वारा भाषा की खोज के पश्चात गीली मिट्टी की पाटी पर सरकंडे की कलम से आकृतियों के माध्यम से अक्षर उकेरने के उसके प्रयास के बारे में सोचता हूँ तो मुझे जगदीश गुप्त की एक कविता ‘अक्षर और आकृति’ याद आ जाती है ...
क्षणभर रुका पेन / और फिर कुछ अधबने अक्षर सँवारे / पाइयों के शीश को ऊपर उठाया / मात्राओं के अनुपूर चरण अनुरंजित किये / नूपुर पिन्हाए / सभी सीमाएँ मिलाईं / नई रेखाएं बनाईं / यहाँ तक / वे नाम सारे खो गए/
मनुष्यता के विकास के सोपान चढ़ते हुए हम होमोसेपियंस सरकंडे की कलम से आगे बढ़ते हुए फाउंटेन पेन तक आ पहुँचे थे । उन दिनों स्याही वाला पेन बच्चों को तुरत फुरत में नहीं मिल जाता था । शुरुआत तो स्लेट पर खड़िया से लिखने से होती थी । शाम को दिया बाती के उपरांत माँ मेरे हाथों में खड़िया की कलम पकड़ा देती और मेरा हाथ पकड़कर स्लेट पर लिखना सिखाती थी “ अच्छा अब ‘अ’ लिखो सबसे पहले ऊपर एक चूल्हा, उसके नीचे दूसरा चूल्हा फिर दोनों के बीच से एक आड़ी डंडी जो खड़ी डंडी के पेट तक पहुँचती है, फिर ऊपर टोपी पहनाना है । “ लिपि में पेट और चूल्हे का अंतर्संबंध मुझे माँ द्वारा अक्षर ज्ञान करवाए जाने के दौरान हुआ । आश्चर्य यह कि माँ ‘अ’ कुछ अलग ढंग से लिखती थी, जिसमे ‘प’ अक्षर से बाहर की ओर जाती तीन डंडियाँ होती थीं ।
खड़िया कलम के बाद अगली पायदान पर पीतल की निब वाला होल्डर मेरी प्रतीक्षा कर रहा था । शिवहरे गुरूजी सारे बच्चों की हैण्ड राइटिंग पर बहुत ध्यान देते थे । उनका कहना था कि होल्डर से थोड़ा ठहर ठहर कर लिखने से राइटिंग अच्छी आती है । होल्डर लकड़ी का बना हुआ एक कलम होता था जिसमें अलग से निब और जीभ लगाई जाती थी फिर उसे स्याही की दवात में डुबो डुबो कर लिखा जाता था । फाउंटेन पेन इसी होल्डर का विकसित स्वरूप है । घर से आते जाते बस्ते में स्याही की दवात उलट न जाए इसका भी एक हल उन्होंने निकाल रखा था । घर जाते हुए हम सब अपनी अपनी दवातें उनकी आलमारी में अपने नाम की चिट लगाकर रख देते थे और सुबह आकर निकाल लेते थे । घर के लिये अलग दवात थी जो घर में ही रहती थी ।
भंडारा में मेन रोड पर उन दिनों स्टेशनरी की एक प्रसिद्ध दुकान थी विजय बुक डेपो, जिसके संचालक थे गभने गुरूजी । स्याही बनाने के लिये गभने गुरूजी की स्टेशनरी की दुकान में नीली व लाल स्याही की गोल गोल टिकिया मिलती थी जिसे पानी में घोलकर हम लोग स्याही बनाते थे ।
जगदीश गुप्त की कविता की तरह हम लोग कॉपी पर अधबने अक्षर संवारते, पाइयों के सर ऊपर उठाते और मात्राओं के चरणों में नुपुर पहनाते । आज सोचता हूँ गुरूजी ने होल्डर पकड़ाकर अच्छा ही किया वर्ना इतनी अच्छी राइटिंग हम लोगों की नहीं होती । वैसे बाबूजी की भी हैंडराइटिंग बहुत अच्छी थी और उन्होंने भी मुझे इस दिशा में काफी प्रोत्साहित किया । वे मेरे शुद्धलेखन पर भी ध्यान दिया करते थे और अक्सर ‘धर्मयुग’ या ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ का कोई पन्ना मुझे कागज़ पर उतारने के लिये दे दिया करते थे , बाद में जिसे चेक कर वे मेरी ग़लतियाँ बताया करते थे ।
मुझे भी उन दिनों अख़बारों से ‘अनमोल वचन’ और ‘दादी माँ के नुस्खे या ‘फ़कीरी नुस्खे’ उतारने का शौक लगा था जिन्हें मैं बाकायदा अलग अलग कॉपी में उतारता था । अनमोल वचन वाली मेरी कॉपी तो गुम हो गई लेकिन फ़कीरी नुस्खे वाली कॉपी अभी भी मेरे पास है । उन दिनों प्रायमरी स्कूल में शुद्धलेखन का भी एक पीरियड हुआ करता था जिसमें शिक्षक मुँह से बोलकर कोई गद्यांश लिखवाया करते थे और बाद में उसे जाँचकर वर्तनी की शुद्धता पर नम्बर दिया करते । कलम दवात की यह जुगलबंदी चौथी प्रायमरी तक ही चली, पाँचवी कक्षा में पहुँचते ही बाबूजी ने मुझे एक डेल्टा पेन खरीदकर दे दिया ।
आजकल शुद्धलेखन और मनगणित जैसी प्रथाएँ लुप्तप्राय हैं । हैण्ड राइटिंग अच्छी होने का भी अब कोई महत्त्व नहीं है । अब सब कुछ कंप्यूटर या मोबाइल पर सीधे टाइप किया जाता है । लेकिन मुझे कागज़ पर कलम से लिखना हमेशा अच्छा लगता रहा । स्याही की गंध मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती है । अभी कुछ साल पहले तक मैं अपनी तमाम कविताएँ हाथ से लिख कर ही संपादकों को भेजा करता था । कविताओं की पांच छः ड्राफ्टिंग होने के बाद ही वह फाइनल होती है । हाथ से लिखने के शौक की वज़ह से मैं तरह तरह के फाउंटेन पेन खरीदता रहा । कुछ साल पहले जब मैं चेन्नई गया था तो वहाँ से एक जम्बो फाउंटेन पेन खरीदकर लाया था जिसमे अन्य पेन की अपेक्षा दुगनी स्याही आती थी । यह पेन अभी तक मेरे पास चालू हालत में है और मेरी अधिकांश कविताएँ इसी पेन से लिखी गई हैं । आज मैं अपने आप को शिवहरे गुरुजी का कृतज्ञ पाता हूँ । अच्छी राइटिंग का होना मेरे भीतर आत्मविश्वास उत्पन्न करता है ।
शरद कोकास





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